प्रस्तावना
कौटिल्य, चाणक्य या विष्णुगुप्त उस महान् विभूति का नाम है, जो राजा या राजवंश का न होकर भी प्राचीन भारत के महान् सम्राट, चंद्रगुप्त का निर्माता थे। वह यथार्थवादी विचारक, कूटनीतिज्ञ, व्यवहारवादी राजनीतिज्ञ, नीतिशास्त्र का सुविख्यात विद्वान था। बहुमुखी प्रतिभा वाले इस महान् विचारक और विख्यात विद्वान की देन महान् है। अपने प्रतिष्ठित ग्रन्थ अर्थशास्त्र के माध्यम से उन्होंने राजनीतिशास्त्र को जो व्यवस्थित और विकसित रूप प्रदान किया है, उस कारण उन्हें प्राचीन भारतीय राजनीतिशास्त्रियों में सर्वोच्च और सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। कौटिल्य को शासनकला और कूटनीति का व्यवस्थित प्रतिपादक माना जाता है। प्रसिद्ध विद्वान सालेटोर के अनुसार "प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतनधारा में सबसे महत्वपूर्ण स्थान कौटिल्य के विचारों को मिलना चाहिए। उन्होंने ही सर्वप्रथम राजनीतिशास्त्र को व्यवस्थित और धर्म से स्वतंत्र रूप प्रदान किया, उसे व्यावहारिक रूप प्रदान किया। कौटिल्य अपनी व्यवहारवादी राजनीति तथा कूटनीति के लिए जितना विख्यात हुए उससे कम अपने ग्रंथ "अर्थशास्त्र" के लिए नहीं हुए। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र, दर्शनशास्त्र, नीतिशास्त्र, समाजशास्त्र, शिक्षाशास्त्र, सैन्यशास्त्र इत्यादि विषयों पर प्रकाश डाला गया है।
नंदवंश का नाश, सिकंदर की पराजय, चंन्द्रगुप्त मौर्य का राजसिंहासन पर आसीन होना, मौर्य साम्राज्य की स्थापना, राक्षस का मौर्य साम्राज्य का महामंत्री बनना तथा बिंदुसार और अशोक जैसे उत्तराधिकारी का होना ये सभी अर्थशास्त्र की महान् सफलता के स्थायी प्रकाशपुंज हैं।
अर्थशास्त्र में राज्य सिद्धान्तों के साथ-साथ राज्य प्रबन्ध सम्बन्धी सूक्ष्म तत्वों को पिरोया गया है। इस ग्रंथ के विषय को देखकर संसार के बड़े-बड़े कूटनीतिज्ञ भी दाँतों तले ऊँगली दबाने को मजबूर हो जाते हैं। भारतीयों के राजनैतिक ज्ञान को प्रौढ़ता का लोहा मानते हैं। इस ग्रंथ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें सिद्धान्त और व्यवहार का आदर्श और यथार्थ का तथा ज्ञान और क्रिया का अद्भुत और सुन्दर समन्वय देखने को मिलता है इसलिए आज इस ग्रंथ का महत्व यूनान के महान् दार्शनिक अरस्तू और प्लेटो के ग्रंथों से कहीं अधिक महत्व प्रदान किया जाता है।
गुप्तचर व्यवस्था भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। वैदिक साहित्यों में गुप्तचरों का उल्लेख मिलता है। वरुण और अग्नि को अनेक गुप्तचर थे। रामायण और महाभारत में भी गुप्तचरों का वर्णन किया गया है।
हनुमान एक गुप्तचर के रूप में सीता की खोज में लंका गए थे। प्राचीनकाल में अनेक राजनीतिक समस्याओं का समाधान गुप्तचरों के माध्यम से किया जाता था। लेकिन कौटिल्य पहला दार्शनिक है, जिसने गुप्तचर व्यवस्था पर विस्तार से प्रकाश डाला, इसे राज्य प्रशासन का आवश्यक अंग माना गया। कौटिल्य ने अपने पुस्तक "अर्थशास्त्र" में गुप्तचरों की नियुक्ति, उसकी योग्यता और कार्यों पर विस्तारपूर्वक वर्णन किया है।
प्राचीनकाल से ही शासन कार्य में गुप्तचर व्यवस्था की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। गुप्तचरों का कार्यक्षेत्र केवल राज्य के बाहर ही सीमित नहीं था, वरन् राज्य के भीतर और बाहर दोनों स्थानों पर शान्ति एवं सुरक्षा की व्यवस्था और योगदान करना गुप्तचरों का कार्य था।
राजनीतिक क्षेत्र में गुप्तचरों के महत्त्व के अनेक उदाहरण देखने को मिलते हैं। युद्ध को जीतने में अस्त्र-शस्त्रों से भी अधिक गुप्तचरों की सूचनाएँ कारगर होती हैं। कौटिल्य का कथन है कि धुनर्धारी के धनुष से छोड़ा गया वाण संभव है किसी एक ही व्यक्ति को मारे या न भी मारे, किन्तु बुद्धिमान व्यक्ति के द्वारा किया गया प्रयोग गर्भस्थ प्राणियों को भी नष्ट कर देता है। इसलिए युद्ध की अपेक्षा बुद्धि को ही अधिक शक्ति सम्पन्न समझना चाहिए। यहाँ बुद्धि का संकेत गुप्तचरों की कार्यकुशलता की ओर है।
कौटिल्य ने राजनीतिक समस्याओं के समाधान के लिए गुप्तचर व्यवस्था को राज्य के लिए आवश्यक बताया है। कामन्दवीय नीतिसार में भी गुप्तचरों के महत्व का वर्णन किया गया है। उसके अनुसार गुप्तचरों, राजाओं को दूर तक पहुँचने वाली आँखें हैं। राजा को उन्हीं के द्वारा देखना चाहिए। जो राजा, गुप्तचरों की आँखों से नहीं देखता अज्ञान के कारण समतल भूमि पर भी ठोकर खाता है, क्योंकि ऐसा करने पर वह अंधा कहा जाता है। राजा जब सो जाता है तो भी उसके गुप्तचर रूपी आँख दूर और पास की सभी घटनाओं को देखते रहते हैं। राजनीतिशास्त्र के अधिकांश ग्रन्थों में गुप्तचरों की आवश्यकताओं और उनके महत्वों का वर्णन मिलता है।
महाभारत, मनुस्मृति आदि ग्रन्थों में राजकर्मचारियों से प्रजा की रक्षा में गुप्तचरों की महत्वपूर्ण भूमिका स्वीकार की गयी है। कौटिल्य के अनुसार राजपुरुषों का मन बराबर बदलता रहता है, अतः उन पर दृष्टि रखना आवश्यक है। कर्मचारियों के पवित्र और अपवित्र व्यवहार की सही जानकारी गुप्तचरों से ही प्राप्त होती है। कौटिल्य ने राज्य एवं युद्ध के सफल संचालन के लिए शत्रु पक्ष में गुप्तचरों के पहुँच को अत्यन्त महत्वपूर्ण माना है।
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