गुप्तकाल प्राचीन भारतीय इतिहास में 'स्वर्ण युग' के नाम से जाना जाता है। महान प्रातापी राजाओं ने इस युग को चरम पर पहुँचाने में बड़ा योगदान दिया था। चंद्रगुप्त के राज्यारोहण से यह 320 ई. में आरम्भ हुआ। चंद्रगुप्त के दोनों पूर्वज केवल महाराज कहलाए, लेकिन स्वयं उसका उल्लेख महाराजाधिराज के रूप में हुआ उसने छोटे से राज्य को चारों ओर बढ़ाकर एक विशाल महत्त्वपूर्ण राज्य का स्वरूप प्रदान किया। उसने लिच्छवि वंश की राजकुमारी कुमारदेवी के साथ विवाह किया। उसके पुत्र एवं उत्तराधिकारी महान सम्राट समुद्रगुप्त ने लिच्छवियों में अपना बचपन व्यतीत करने का गौरव पाया। इस वैवाहिक सम्बन्ध ने गुप्तों को राजनीतिक महत्ता प्राप्त करने में बड़ा योगदान दिया। चन्द्रगुप्त के राज्य की कोई निश्चित सीमा की जानकारी नहीं होती, लेकिन बह पश्चिम में इलाहबाद तक फैला हुआ था उसकी मृत्यु लगभग 340 ई. में हुई और इसके बाद उसका उत्तराधिकारी उसका पुत्र समुद्रगुप्त हुआ। समुद्रगुप्त की गणना देश के महान और बहुमुखी प्रतिभा से पूर्ण सैनिकों में की जाती है। उसने अपने विस्तृत शासन काल में महान सैनिक अभियान किए। इस वीर सम्राट के सामने पूर्व से पश्चिमी तक के अभियान में सभी राज्यों ने बिना संघर्ष के ही उसकी आधीनता स्वीकार कर ली इसमें बंगाल, असम, और नेपाल, पूर्व के राज्य तथा मालबा, यौधेय, आर्जुनायन, भद्र और आभीर आदि, पंजाब और राजस्थान के पश्चिमी गणराज्य एवं मालवा और मध्यप्रदेश के अनेक छोटे-छोटे राज्य थे। अपनी राजनीतिक दूरदर्शिता के कारण ही उसने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की और उसके उत्तराधिकारियों ने लगभग 100 वर्षों से अधिक समय तक गुप्तकाल के गौरव को बढ़ाए रखा। इसके दो पुत्र रामगुप्त एवं चंद्रगुप्त द्वितीय थे। चंद्रगुप्त द्वितीय ने ही गुप्त साम्राज्य को पूर्ण किया। इस युग के अन्य प्रमुख राजाओं में कुमार गुप्त, स्कन्धगुप्त आदि थे। गुप्तकाल महान प्रतापी राजाओं के साथ-साथ सभी क्षेत्रों में विकास एवं उन्नति के लिए जाना जाता है। गुप्त युग में स्थापत्य कला, मृण्कता, वास्तुकता, चित्रकला, साहित्यिक क्षेत्र, शासन व्यवस्था, आर्थिक व्यवत्या का चहुँओर विकास हुआ। प्रास यह अंर्त है, अप गुप्त साम्राज्य में एक अत्यंत विशद और कुशल शासन प्राणाली की व्यवस्था थी। गुप्त युग में अधिक प्रचलित शासन-तंत्र राजतंत्र ही था, लेकिन साथ ही अनेक गणतंत्रात्मक राज्यों की जानकारी मिलती है। राजतंत्रात्मक शासन व्यवस्था भारत की सबसे लोकप्रिय शासन व्यस्या थी। शासन व्यस्था उच्चकोटि की थी। शासन को सुचारु रूप से चलाने के लिए इसे प्रान्तीय शासन, जिले का शासन, स्थानीय शासन तथा ग्राम की शासन व्यवस्था थी। ग्राम की व्यवस्था का कार्य ग्राम पंचायत द्वारा सम्पन्न होता था। ग्राम पंचायत स्वतंत्र रूप से केन्द्रीय शासन के अधीन न रहकर कार्य करती थी। ग्राम पंचायत के अध्यक्ष ग्रामपति या महत्तर कहलाते थे। ग्राम पंचायत के प्रमुख सदस्य 1. महत्तर, 2. आठ कुलाधिकारी आठ कुलों के मुखिया, 3. ग्रामिक-ग्राम के प्रमुख व्यक्ति तथा 4. कुटुम्बिन्-परिवार के मुख्य व्यक्ति होते थे। ग्राम पंचायत सुचारु रूप से चलाने के लिए महत्तर को स्थानीय जनता पर कर लागाने का भी अधिकार था। 3 वर्ष तक राजस्व अदा न करने वाले की भूमि को ग्राम-पंचायत को बेचने का अधिकार था। इस बेची हुई भूमि का 1/2 भाग राजकोष में जाता था। तथा शेष भाग ग्राम पंचायत को मिल जाता था। ग्राम पंचायत अपनी आमदनी का हिसाब ठीक ढंग से रखता था। एक सरकारी पदाधिकारी इसका निरीक्षण करता था। ग्राम पंचायत इस धन को सार्वजनिक कार्यों में खर्च करती थी। इस प्रकार यदि देखा जाए तो गुप्तकालीन ग्रामों की उत्तम व्यवस्था थी तथा लोगों का जीवन पूर्ण रूप से सुखी था।
यह पुस्तक गुप्त काल में ग्रामीण जीवन की झलक प्रदान करने हेतु लेखक के प्रयासों का परिणाम है। यह प्राचीन भारतीय इतिहास की प्रासंगिकता को आधुनिक काल में संरक्षित करने का प्रयत्न है। लेखक ने गूढात्मक अध्ययन द्वारा गुप्तकालीन ग्रामीण परिवेश में आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक और धार्मिक स्वरूप की व्याख्या की है। इस पुस्तक में समृद्ध पारंपरिक ज्ञान को प्रासंगिक शैली में प्रस्तुत किया गया है। यह पुस्तक भारतीय सभ्यता की अंर्तनिहित विशेषताओं पर प्रकाश डालती है, जो इसकी स्थापना के समय से ही विघमान थी और सहस्त्राब्दियों से अपरिवर्तित रही।
डॉ. मनोज कुमार हरियाणा सरकार में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। इतिहासकार के रूप में उनकी रुचि प्राचीन भारत के सांस्कृतिक और धार्मिक विकास में है। वे पिछले 20 वर्षों से भारतीय ज्ञान परंपराओं पर विशेष ध्यान केंद्रित करते हुए भारतीय इतिहास पढ़ा रहे है।
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