पुस्तक परिचय
गुरु ग्रन्थ साहिब नाम सुनते ही एक ऐसी छवि हमारे मन मस्तिष्क पर बनती है, जिसके सम्मुख नत मस्तक होने के लिए हमारे मन के अंदर से आवाज़ आती है, अंतरात्मा से आवाज़ आती है। एक पवित्र ग्रन्थ, आस्था और विश्वास का प्रतीक, सम्माननीय ग्रन्थ, पूजनीय ग्रन्थ, जो अपने आप में एक बड़ा साक्ष्य है, अपनी शक्ति का। जिसने अपनी सीख से, सम्पूर्ण मानवता में विश्वास पैदा किया है, सेवा धर्म का, एक ईश्वर का। जिसकी सीख में मानवता, सेवा, समानता, कर्तव्य, उदारता और एक ईश्वर का सन्देश है, जिसकी सीख में कोई धार्मिक आडम्बर नहीं, अन्ध-विश्वास नहीं, समानता और उदारता है। अपने इन्हीं गुणों के कारण यह ग्रन्थ सर्व धर्मों के लिए श्रद्धेय ग्रन्थ और पवित्र ग्रन्थ है, क्योंकि यह ग्रन्थ सभी धर्मों, जातियों, पंथों का सम्मान करता है। इस ग्रन्थ में भेदभाव का स्थान नहीं है। इस ग्रन्थ में श्री गुरु नानक देव जी, गुरु तेग बहादुर जी व गुरु गोबिंद सिंह जी सिखों के दसों गुरुओं और उनकी वाणियों का जहाँ सम्मान है, वहीं जयदेव और परमानन्द जैसे ब्राह्मण भक्तों का सम्मान और स्थान है, तथा कबीर, रविदास और नामदेव तथा शेख फरीद भी उतने ही सम्माननीय है, यही इस ग्रन्थ की विशेषता है कि यह सर्व धर्म में आस्था का प्रतीक है, और जिसके लिए यह किसी परिचय का मोहताज नहीं है। यही गुरु ग्रन्थ साहिब की सुन्दरता है और इसकी विशेषता भी। अपनी इसी सुन्दरता और विशेषता के कारण गुरु ग्रन्थ साहिब मानव समाज को धार्मिक कुरीतियों से बाहर निकाल मानवीय एकता और समानता का संदेश देने वाला प्रमुख और पवित्र ग्रन्थ है।
लेखक परिचय
जन्म स्थानः मनाली, हिमाचल प्रदेश। शिक्षाः राजनीतिक शास्त्र में स्नातकोत्तर, एम.फिल., पीएच.डी.। पाठ्यक्रम पर आधारित प्रकाशित पुस्तकेंः Western Political Thought (Set of 2 Vols.) Indian Political Thought. अन्य प्रकाशित पुस्तकेंः Glimpse of Tribal Area of Lahaul. राष्ट्रवादी पत्रकारिता के पुरोधा पं. दीनदयाल उपाध्याय। इसके अतिरिक्त हिमाचल प्रदेश की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व्यवस्था पर तथा दीनदयाल उपाध्याय के सामाजिक और राजनीतिक चिंतन पर पुस्तक प्रकाशित। शोध पत्रः तेरह शोध पत्र प्रकाशित। इसके अतिरिक्त कई संपादित पुस्तकों में 7 से अधिक लेख प्रकाशित। संप्रतिः केंद्रीय विश्वविद्यालय, हिमाचल प्रदेश में दीनदयाल उपाध्याय अध्ययन केंद्र में सहायक आचार्य पद पर कार्यरत हैं। पताः धौलाधार परिसर II, केंद्रीय विश्व विद्यालय, धर्मशाला (क्रिकेट स्टेडियम के पास) हिमाचल प्रदेश। मोबाइल: 8219980281 ई-मेल: sunitabodh21@rediffmail.com
भूमिका
जिन दिनों सम्पूर्ण भारत, अरबों, तुर्कों, मुगल व मंगोलों के आक्रमणों से जूझ रहा था, उन दिनों भारत में जनचेतना के लिए भक्ति आन्दोलन ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्हीं दिनों सप्त सिन्धु क्षेत्र में दशगुरु परम्परा का उदय हुआ, जिसने देश के इतिहास को एक नई दिशा दी थी। भक्ति के माध्यम से जन-जन को 'निर्भय' की स्थिति तक पहुँचाने का अभियान इसी परम्परा ने सफलतापूर्वक चलाया। इस परम्परा के प्रणेता प्रथम गुरु श्री नानक देव जी थे। गुरुओं ने देश के कोने-कोने में जाकर नई चेतना की अलख जगाई। लेकिन गुरुओं का यह अभियान केवल शाब्दिक नहीं था। वे यथार्थ की ज़मीन पर मज़बूती से खड़े थे। यही कारण था कि भक्ति काल में जन्मे इस अभिनव प्रयोग में दो-दो गुरुओं श्री अर्जुन देव जी और श्री तेग बहादुर जी ने विदेशी शासकों से जूझते हुए आत्म बलिदान दे दिया। कहा जा सकता है कि दशगुरु परम्परा ने भक्ति आन्दोलन को अपने रक्त से सींच कर एक नई उर्जा पैदा की। इसी उर्जा में से खालसा पंथ निकला। इस परम्परा का एक और महत्त्वपूर्ण योगदान श्री गुरु ग्रन्थ साहिब के रूप में पूरे देश को युगानुकूल एक नया 'गुरु' देने का है। गुरु ग्रन्थ साहिब में दशगुरु परम्परा के छह गुरुओं (तीन गुरुओं श्री हरगोविन्द जी, श्री हरिराय जी व श्री हरिकृष्ण जी ने वाणी रचना नहीं की थी और दशम गुरु श्री गोविन्द सिंह जी ने अपनी वाणी को श्री ग्रन्थ साहिब में समाविष्ट नहीं किया था) की ही वाणी नहीं है, बल्कि इसके अतिरिक्त देश भर के साधकों की वाणी इसमें शामिल है।
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