पुस्तक परिचय
ज्ञान ज्योति' पुस्तक में मैने अनेक देवी-देवताओं, महापुरुषों तथा ज्ञान से संबंधित अन्य प्रसंगों को कलमबद्ध किया है। इस पुस्तक में पाठकों को ज्ञानवर्द्धक प्रसंग अवश्य प्रभावित करेंगे और उनके चरित्र निर्माण में अहम् भूमिका निभाएँगे, ऐसा मेरा विश्वास है। इसमें मेरा कुछ भी नहीं हैं, इस पुस्तक की रचना के लिए मुझे अधिकांश सहायता समाचार-पत्र (नवभारत टाइम्स) द्वारा प्राप्त हुई है। जिन उपदेशात्मक प्रसंगों ने मेरे मन को अधिक प्रभावित किया, उन्हें आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ। इस पुनीत कार्य के लिए कृपा प्रभु की, दृढ़ संकल्प मेरा, आशीर्वाद मेरे माता-पिता एवं गुरुजनों का है और योत्साहन मेरे परिजनों एवं मित्रों का है। यह पुस्तक उस में पिरोए गए पुष्प की तरह है, जिसमें अनेक के पुष्प पिरोए गए हैं, लेकिन सभी एक समान हैं, में खिलकर भी पुष्प दुःखी नहीं होते और ये सदैव लत रहते हैं, उनकी खुशबू और सुंदरता कभी कम नहीं होती है। ये पुष्प हमें यह संदेश देते हैं कि हमारे जीवन में कितनी ही बाधाएँ क्यों न उत्पन्न हो, उनका धैर्यपूर्वक और हँसकर सामना करना चाहिए ।
लेखक परिचय
परिचय : हरीराम 'भारती' का जन्म 9 अप्रैल, 1965 में ग्राम भेला, पो. समोधपुर, जनपद, जौनुपर (उत्तर प्रदेश) के एक साधारण कृषक परिवार में हुआ था। आपने अधिकांश शिक्षा ग्रामीणांचल से ही प्राप्त की थी। आपके पिता श्री झिंगुरी कर्मठ, भैर्यशील एवं निष्ठावान व्यक्ति है। माता जी श्रीमती शनिचरा देवी अत्यंत परिश्रमी, सुमेल एवं कुशल गृहिणी हैं। अग्रज स्व. श्री रामधारी जी ने अपने जीवन काल में परिवार के प्रबल सहायक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। सन् 1990 में सिर्फ 32 वर्ष की अल्पायु में ही यकृत कैंसर से पीड़ित हो, उनकी असामयिक मृत्यु हो जाने से घर की आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई थी। अंत में प्रिय अनुज रामस्वारथ जी ने पारिवारिक उत्तरदायित्व संभालकर, परिजनों को दुःख के बोझ से उबारकर एक नई दिशा प्रदान की।
शैक्षिक योग्यता :
1. सी.पी.एड. श्री गांधी स्मारक शारीरिक शिक्षा प्रशिक्षण महाविद्यालय, समोधपुर, जौनपुर (उ.प्र.) 1985 2. बी.ए. गोरखरपुर विश्वविद्यालय गोरखपुर (उ.प्र.)-1987 3. एम.ए. (समाजशास्त्र) कानपुर विश्वविद्यालय, कानपुर (उ.प्र.) 1990 4. बी.एड. पूर्वाचल विश्वविद्यालय, जौनपुर (उ.प्र.) – 1992 5. एम.ए. (हिन्दी) पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर (उ.प्र .) 1998 6. शोध कार्य हिन्दी विषय में (जौनपुर जनपद के लोकगीतों का लोक तातित्वक अध्ययन) चौ. चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ (उ.प्र.) से शोधरत् । सम्प्रति : 1. सन् 1987-90 तक प्रादेशिक विकास दल, जौनपुर (उ.प्र.) में सहायक व्यायाम प्रशिक्षक के पद पर कार्य किया। 2. विद्या भवन महाविद्यालय, उच्चत्तम माध्यमिक विद्यालय, लोधी एस्टेट, नई दिल्ली-110003 में जुलाई, 1993 से सहायक अध्यापक से मार्च, 2005 में टी.जी.टी. हिन्दी के पद पर पदोन्नति हुई। 3. रूचि खेल-कूद तथा गायन-वादन । सामाजिक कार्य : 1. असहाय व्यक्तियों की सहायता करना । 2. निर्धन विद्यार्थियों को निःशुल्क शिक्षा देना । 3. दहेज प्रथा के विरुद्ध लोगों को जागृत करना । 4. बाल विवाह के विरुद्ध लोगों को जागृत करना । 5. विधवा महिलाओं की सहायता करना । 6. जातीयभेदभाव एवं असपृश्यता को समूल नष्ट करने के लिए लोगों को प्रेरित करना । 7. निर्धन एवं पिछड़े लोगों को शिक्षित होने के लिए प्रेरणा देना। लेखन कार्य : 1. "सवाल है, भारत के आदिजनों की मुक्ति का" प्रकरि जुलाई, सन् 2005 2. "भूमि, भूमिहीन तथा भूमि सुधार नीति" प्रकाशित दिदीकी, सन् 2005 3. "असंगठित क्षेत्र में दलित और आदिवासी मजदूर एक विशेः फीवर मई, सन् 2006 कविताएँ : 1. "मैं बेबस मजदूर हैं" प्रकाशित प्रमुख आलेख मई, सन् 2005 2. "कैसे होगा दलित उद्धार?" जनवरी, सन् 2006 पुरस्कार : भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा लेखन कार्य के लिए 12 दिसम्बर, 2005 में राष्ट्रीय पुरस्कार के रूप में 'डॉ० अम्बेडकर फेलोशिप' सम्मान से सम्मानित
भूमिका
हिन्दी साहित्य में विद्रोही और क्रांतिकारी तेवर से लैस अपराजेय महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' का सम्पूर्ण जीवन संघर्षों एवं तनावों भरा रहा लेकिन कभी गिड़गिड़ाए नहीं वरन् पूरी ताकत के साथ उससे लड़े और जीवन पथ पर आगे बढ़ते रहे। वे पूरे परिश्रम के साथ कविता-कर्म में प्रवृत्त होते थे। कविता लिखने का परिश्रम उनके मुख पर साफ झलक उठता था। रामविलास शर्मा लिखते हैं 'नारियल वाली गली में 'तुलसीदास' लिखते हुए मैंने उन्हें देखा है आठ-नौ बजे तक हीवेट रोड के पैरागॉन रेस्तराँ से चाय पीकर वह लौट आते थे। नीचे के कमरे में तीन-चार घंटों तक वह मोगल दलबल के जलदयान से युद्ध करते थे। बारह एक बजे अपने प्रयास के फलस्वरूप एक दो पने लिए हुए जब ऊपर आते थे, तब मालूम होता था, कोई मजदूर छह घंटे भट्टी के पास तपकर बाहर आया है। उनके चेहरे पर एक तनाव-सा होता था और आँखों में थकान के साथ संतोष की झलक भी।' इस प्रकार सचमुच काव्य-रचना उनके लिए एक घोर तपस्या थी। निरालाजी द्वारा प्रणीत 'राम की शक्तिपूजा' एक अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रबंधाभास प्रदीर्घ कविता है जो कवि के महाप्राणत्व को सिद्ध करती है। यह उस दौर की कविता है जब छायावाद अपने जीवन की अंतिम साँस ले रहा था। इसमें राम का मानवीय संशय, द्वन्द्व और अन्तर्बाह्य संघर्ष गहरी मार्मिकता के साथ व्यक्त हुआ है। यहाँ प्रकारान्तर से आधुनिक मानव का अन्तर्विरोध ही उभर कर बाहर आया है। राम की शक्तिपूजा' में निराला का अपना जीवन संघर्ष ही उभर कर सामने आया है चाहे उनका वैयक्तिक जीवन का संघर्ष रहा हो, चाहे रचनात्मक संघर्ष रहा हो। वस्तुतः 'राम की शक्तिपूजा' स्वयं कवि निराला की शक्तिपूजा है। शक्तिपूजा के प्रतीक निराला के जीवन सत्य का ही उद्घाटन करते हैं। अतः 'राम की शक्तिपूजा' के राम का व्यक्तित्व सभी युगों में प्रासंगिक रहेगा। मैं इस अवसर पर अपने परम पूजनीय पिता स्व. श्री फूलचन्द आर्य और ममतामयी माँ मेवा देवी के प्रति चिरकृतज्ञ हूँ जिनसे मुझे जीवन में निरन्तर संघर्षरत रहते हुए आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली। वे मेरे लिए जीवानादर्श हैं। मैं अपने बड़े भाईसाहब श्री शेरसिंह आर्य के प्रति चिरकृतज्ञ हूँ जिन्होंने मुझे हमेशा संघर्षों से जूझने की ताकत देकर समय-समय संबल प्रदान किया है। मैं उनके चिर-स्नेह का आकांक्षी हूँ। मैं अपनी जीवन-संगिनी 'संगीता आर्य' के प्रति अनुरागमय आभार महसूस करता हूँ जिन्होंने मेरे जीवन को एक नई दिशा दी। उन्हीं के त्याग एवं प्रदत्त दिशाबोध के कारण यह पुस्तक सजीव बन पायी है। अतः यह पुस्तक उन्हीं को समर्पित है। पुस्तक के स्वच्छ एवं समयबद्ध टंकण के लिए भाई मनोज कुमार शर्मा साधुवाद के पात्र हैं। अन्त में, मैं पुस्तक के प्रकाशक श्री रमेश वर्मा जी के प्रति विशेष आभार अनुभव करता हूँ जिन्होंने इस पुस्तक को बड़ी तत्परता और गहरी सुरुचि सम्पन्नता के साथ प्रकाशित कर आप तक पहुँचाने का श्रमसाध्य कार्य किया है। मैं आपके स्वस्थ जीवन एवं दीर्घायु की मंगल कामना करता हूँ।
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