मनुष्य के तमाम गुणों अवगुणों के बारे में कुछ भी कहें, पर, मनुष्य की विचार शक्ति अपरम्पार है और उसे शब्दों में बुनना अद्भुत वरदान है। श्री दिलबर सिंह रावत जी द्वारा प्रकृति, पशु, मनुष्य, ईश्वर तथा धर्म के परस्पर संबंधों, अंतद्वंदों, उपयोगिताओं, शोषण व भटकाव की दार्शनिक व्याख्या व विचार-चिंतन का फल है यह पुस्तक। लेखक ने बहुत सहजता से. बहुत ही तार्किक ढंग से, यथासंभव उदाहरणों से और जरूरी साक्ष्य मढ़ कर यह अनोखी संरचना की है। इस मूल चिंतन को लेकर कि कैसे मानव अपनी तमाम अनैसर्गिक कमियों और दुष्कृत्यों से समाज और पर्यावरण के लिए अप्राकृतिक व हानिकारक बन गया, जबकि सम्पूर्ण रूप से प्राकृतिक जीवन जीने वाले पशु हमेशा प्रकृति का हिस्सा बने रहे ! लेखक डी. एस. रावत जी, कालेज के दिनों से ही मेरे अभिन्न मित्रा रहे हैं। इनके बारे में संक्षेप में वही कह सकता हूँ जो संत कबीर ने अपने बारे में कहा तू कहे कागद की लेखी, मैं कहूँ आंखिन की देखी! सामाज में व्याप्त कुरीतियाँ, अनाचार, भेदभाव, विभाजन, अशिक्षा और विषमताएं भोगकर इनके मन में क्षोभ भरता गया। शिकायत सबसे ज्यादा शिक्षित / बौद्धिक वर्ग से रही और कहना पड़ा "मूर्ख (अशिक्षित) यदि भूत भगाने के प्रपंच करता रहा तो बुद्धिमान (शिक्षित) भगवान को खोजने के प्रयोजन करता रहा ! अंतर क्या रहा दोनों में?" बलात्कारियों के कुकृत्यों को जब भी पशुवत व्यवहार कहा जाता तो मित्र उद्वेलित हो जाते और कहते कि पशु बलात्कार नहीं करते, व्यभिचार नहीं करते, अप्राकृतिक व अवांछित सेक्स नहीं करते, ऐय्याशी नहीं करते, पशु पाखंडी व मिथ्याचारी नहीं होते! फिर क्यों मनुष्यों के दुष्कर्मों का दोषारोपण पशुओं पर किया जाता है? पशुओं की विशुद्ध प्राकृतिक जीवन शैली और मानव की प्रदूषित, विकृत तथा अप्राकृतिक जीवन शैली का द्वंद जबसे लेखक के मन में घर किया, तभी इस पुस्तक की परिकल्पना का बीज प्रस्फुटित हुआ! फलतः घोर मेहनत, संकल्प, लगन तथा विस्तृत अनुसंधान के उपरांत, यह अनूठी सोच पुस्तक के रूप में परिणित हुई। लगभग 25 लाख वर्ष पूर्व जन्में आधुनिक मानव को Homo Sapiens नाम दिया गया! मानव को सिर्फ सैपियंस भी कह सकते हैं। Sapiens का शाब्दिक अर्थ ही बुद्धिमान है। फिर ऐसा क्या हुआ कि बुद्धिमत्ता के बावजूद आज का सैपियंस इतना पाखंडी, क्रूर, अकृतघ्न, विभाजनकारी, संवेदनहीन, स्वार्थ परायण और अप्राकृतिक जीव बन गया? एक तो - अत्यधिक बुद्धिमत्ता का उपयोग गलत दिशा में होने से मानव तथा पशुओं की प्राकृतिक जीवन शैली में दूरी बढ़ गई। इसी ज्वलंत प्रश्न का समुचित विश्लेषण इस पुस्तक में प्रबलता के साथ किया गया है। दूसरी बात अन्य प्राणियों की तरह मानव प्रजाति में भी Selfish Genes (स्वार्थ-परायण जीन्स) होते हैं जो उस प्रजाति की उत्तर जीविता (Survival) और नैसर्गिक वरण (Natural Selection) में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। रिचर्ड डॉकिन्स ने तो हर प्राणी को "Selfish मशीन" ही कह दिया! इस मशीन के स्वार्थ परायण जीन्स की प्रोग्रामिंग इस तरह से हुई है कि होता वही है जो उस प्राणी के हित में सबसे उत्तम होता है! यहां तक कि यही सैल्फिश जीन्स, छद्म भेष में कई परोपकारी कृत्यों (Altruistic baviour) को अंजाम देते हैं! इसीलिए, मनुष्य द्वारा की गई परोपकारी गतिविधियाँ भी उसके अपने स्वार्थ के लिए ही होती हैं। विज्ञान में पारंगत मनुष्य की असीमित शक्तियाँ व अंतर्निहित स्वार्थ परायणता प्रकृति पर कहर ढाने लगी। युवाल नोवा हरारी के अनुसार जब सैपियंस ने स्वरबद्ध भाषा सीखनी शुरू की तभी से मानव में विकृतियों की शुरूआत हो गई।
हैवान, इंसान और भगवान" को मैने पाँच अध्यायों (बुद्धि, प्रकति और संस्कति, हैवान और इंसान, इंसान और भगवान, धर्म) में व्यवस्थित किया है। 'बुद्धि' के माध्यम से मेरी जिज्ञासा है कि इंसान बुद्धिमान और विवेकशील है तो मूर्ख और विवेकहीन कौन हैं? हैवान (पशु) है तो वह जाति, प्रजाति, मजहब, वण, वर्ग राष्ट्र आदि में क्यों नहीं बंटा है? 'प्रकति और संस्कति' के माध्यम से मुझे लगा कि हैवान (पशु) पूरी तरह प्राकृतिक, इंसान प्राकृतिक कम, सांस्कृतिक (अप्राकृतिक) ज्यादा है। भगवान पूरी तरह से सांस्कतिक (अप्राखतिक) है। 'हैवान और इंसान' में मेरी जिज्ञासा है कि हैवान पतित है तो उसके उत्थान के लिए भगवान अवतार क्यों नहीं लेता? डरपोक है तो वह भूत-प्रेत, भगवान, बुरी नजर आदि से क्यों नहीं डरता? राजा है तो उसके राज्य में रंक क्यों नहीं होते? रंग बदलता है तो वह जान बचाने के लिए ही रंग क्यों बदलता है? माल (सत्ता, संम्पत्ति और कीर्ति) को बचाने के लिए रंग क्यों नहीं बदलता? भौतिक है तो उसे आध्यात्मिक बनाने के लिए कोई क्यों नहीं आता? 'इंसान और भगवान' के माध्यम से मैने जानना चाहा कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो वह शैतान के सामने दुर्बल क्यों है? जैसे ही पापी दृश्य, गोचर, लभ्य और साकार होते हैं, वैसे ही वह अदृश्य, अगोचर, अलभ्य और निराकार क्यों हो जाता हैं? कण-कण में है तो वह जंगलों में क्यों नहीं है? क्या इसलिए, कि वहाँ पवित्र नहीं होते तो पापी भी नहीं होते, ऊँच नहीं होते तो नीच भी नहीं होते? 'धर्म' सत्य है तो फिर शेर धर्म (सत्य) है, शेर की सवारी करने वाली देवी मजहब (असत्य) है। बकरी धर्म (सत्य) है तो 'बकरीद' मनाने वाला मजहब (असत्य) है। जब विज्ञान कहता है सृष्टि सृष्टा ने नहीं बनाई, स्वतः बनी है, तब सृष्टा नहीं, धर्म नाराज होते हैं, जब डार्विन ने सिद्ध किया कि धरती में जीवन का विकास अपने आप हुआ है, तब डार्विन को असिद्ध करने के लिए ईश्वर नहीं, धर्म आये। अगर कहो राम भगवान का अवतार नहीं था तो भगवान को नहीं हिन्दुओं को चोट पहुँचेगी। कहो कि ईसा ईश्वर के पुत्र नहीं थे तो ईश्वर आग-बबूला नहीं होगा, ईसाई आग बबूले हो जायेंगे। यदि कहो ह. मोहम्मद आखिरी पैगम्बर नहीं हो सकते तो अल्लाह नहीं, मुसलमान खफा हो जायेंगे। जब उपरोक्त धर्म खतरे में होते हैं, तब भी ईश्वर-अल्लाह खतरे से बाहर होता है। ऐसा क्यों? इसी लिये कि ये सब भगवान के भक्त नहीं, अपने-अपने धमों के अन्ध भक्त होते हैं। पुस्तक का उद्देश्य न किसी को जमीन में उतारना है, न आसमान में चढ़ाना है, जो जैसा लगा, उसे वैसे ही बताना है।
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