"धर्म मनुष्य को जानना सिखाता है। जब वह अपने आपको जान लेता है, तभी ईश्वर को जान सकता है। धर्म वह नहीं जो विभाजन करे, धर्म वह है जो जोड़ दे, जो सबको एक सूत्र में बाँधे।" श्री हंस जी महाराज का उपदेश था कि मनुष्य अपने अंदर झाँके क्योंकि सत्य बाहर नहीं, अपने अंदर है। वे अत्यंत सरल शब्दों में अध्यात्म के गूढ़ रहस्यों को कह दिया करते थे।
श्री हंस जी महाराज का जीवन युगदृष्टा का जीवन था। उन्होंने समाज के उत्थान के लिए सेवा को सर्वोपरि बताया। उनके अनुसार सेवा ही सच्ची उपासना है। जहाँ सेवा है, वहीं ईश्वर का वास है। वर्तमान में जब मानव भौतिक प्रगति के कारण मानसिक अशांति को प्राप्त हो रहा है, तब संघर्ष की परिस्थितियों में मानव को प्रेम, करुणा, दया जैसे मूल्यों की नितांत आवश्यकता है। यदि मानव मात्र में यह सद्भाव हो जाए कि हम अपने निजी हित से जनहित को ऊपर रखें तो राम-राज्य की परिकल्पना को साकार किया जा सकता है।
योगिराज परमसंत श्री हंस जी महाराज का जीवन अद्भुत त्याग, सेवा और अध्यात्म का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि अध्यात्म केवल ग्रंथों में नहीं, बल्कि व्यवहार, कर्म और प्रेम में निहित है। उनका सम्पूर्ण जीवन मानव के उत्थान, आत्मज्ञान के प्रचार और शांति के प्रसार में समर्पित रहा।
श्री सतपाल जी महाराज के जन्म वर्ष के अवसर पर वर्ष 1951 से हंसादेश नामक पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ किया गया था। इस पत्रिका के प्रकाशित वर्षों में से सन् 1951 से सन् 1954 तक के श्री हंस जी महाराज के वचनामृतों को "प्रथम भाग" के रूप में संकलित किया गया है। यह ग्रंथ उनके 125वें प्रकाट्य/अवतरण वर्ष पर श्रद्धांजलि के रूप में प्रस्तुत है।
"धन्य है वह युग, जिसमें अवतरित हुए योगिराज परमसंत श्री हंस जी महाराज-जिन्होंने मानव को सत्य, प्रेम, सेवा और अध्यात्म का वास्तविक मार्ग दिखाया।"
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