आदिकाव्य से लेकर रामचरितमानस तक विस्तृत रामकाव्य की आर्ष-परम्परा में हनुमान के महिमामय व्यक्तित्व और कृतितत्व का जैसा वर्णन प्राप्त होता है, उसी के साथ कुछ नयी विशेषताओं के समाहार से मानसीय हनुमान में हमें उनका नूतन उत्कर्ष परिलक्षित होता है। आर्ष परम्परा में हनुमान अपने गुण, कर्म और रूप की दृष्टि से बहुशास्त्रविद्, वर्णाश्रम धर्म के पालक, मर्यादावादी, अतुलित योद्धा, महावीर, नीतिकुशल, असम्भव कार्यों के सम्पादनकर्ता, शत्रुहंता, धैर्यशाली, ऋद्धियों-सिद्धियों के दाता, बालब्रह्मचारी, सेनापति, रामोपासक एवं रामसेवक वानर-पुरुष वर्णित हैं। एक पौराणिक तथा लौकिक देवता की स्थिति से न जाने कितने ही अतीतकालीन देव प्रतीकों और उनकी विशेषताओं के एकत्व से हनुमान का दिव्य व्यक्तित्व एवं चरित्र का निरन्तर विकास होता आया है। यही कारण है कि वे एक साथ केसरीनंदन, वायुपुत्र, शंकरसूनु आदि माने जाते हैं। यही नहीं, कतिपय विद्वान् एवं शास्त्रज्ञ इन्हें वैदिक वृषाकपि, सुपर्ण, पर्जन्य, वरुण, रुद्र से समीकृत करते हुए पौराणिक गरुड़ से उनकी तुलना कर उन्हें प्राचीन यक्ष-पूजा परम्परा में प्रतिष्ठित लोक देवताओं के अंश अथवा पूर्णांश से अवतरित सिद्ध करते हैं। अभिप्राय यह है कि प्राचीनकाल से ही भारतीय धर्म, संस्कृति और उपासना के लौकिक तथा वैदिक दोनों ही स्तरों पर हनुमान जी की जो प्रतिष्ठा रही है, उसका आदिकाव्य के अनन्तर रचित राम तथा हनुमान साहित्य में उसका यथेष्ठ अंकन हुआ है और उसी के सन्दर्भ में उनके दिव्य व्यक्तित्व और चरित्र में अनेकानेक तत्व जुड़ते रहे हैं, इसीलिए उनके व्यक्तित्व तथा चरित्र-नियामक गुणों में इतनी वृद्धि है।
रामकथा के प्रमुख पात्र की स्थिति से हनुमान के व्यक्तित्व के तीन आयाम दृष्टिगत होते हैं - रामसहायक हनुमान, जनरक्षक हनुमान और लोकरंजक हनुमान। व्यक्तित्व के इन तीनों ही आयामों के साथ वह अपने अद्भुत बल, अडिग निष्ठा और अलौकिक गुणों के कारण भारतीय आस्तिक जन-मन को चिरकाल से आकृष्ट करते रहे हैं। भारतीय इतिहास के मध्यकाल तक राष्ट्रीय वीरनायक की स्थिति से उनकी लोकरंजन के रूप में ही नहीं बल-बुद्धि प्रदायक और संकट निवारक, लोकरक्षक के रूप में भी सर्वमान्यता स्थापित तथा रामोपासना के साथ हनुमदुपासना भी लोकधर्म में पूर्णतः प्रतिष्ठित हो रही थी, उसी युग में गोस्वामी जी ने अपने चरितनायक श्रीराम के साथ काव्य तथा लोकधर्म की उपासना के क्षेत्र में हनुमान की महिमा का व्यवस्थापन इन दोनों ही रूपों में किया था, किन्तु गोस्वामी जी ने हनुमान के दिव्य व्यक्तित्व और गौरवपूर्ण चरित्र में जिस अलौकिक विशेषता का आधान किया था, वह इस रूप में पूर्व में नहीं रहा है। यह नयी विशेषता है दास्य भक्ति का। रामचरितमानस में उनके चरित्र की योजना इसी तत्व को ध्यान में रखकर की गयी है। हनुमान बाहुक में इसी के आधार पर गोस्वामी जी ने उनकी विरूदावली का वर्णन और अपने संकट का दैन्यपूर्ण वर्णन करते हुए प्रार्थना प्रस्तुत की है। तुलसीदास जी द्वारा स्थापित हनुमत् प्रतिमाओं की पूजा-उपासना की पद्धति भी दास्यभाव से ही संबलित होती आयी है।
गोस्वामी जी के काव्यों विशेषकर रामचरितमानस, कवितावली, गीतावली और हनुमानबाहुक में हनुमान के चरित्र के साथ जुड़ी परम्परागत विशेषताओं में दास्यपरक भक्ति का मेल होने से रामसहायक हनुमान, रामसेवक तथा रामदास बन गये। केवल इसी तत्व के सन्निवेश से हनुमान का बहुगुण समन्वित व्यक्तित्व तथा चरित्र नूतन गरिमा से अभिमंडित हो उठा है। यहाँ भक्त के रूप में हनुमान के व्यक्तित्व एवं चरित्र में पूर्वपिक्षा अधिक निखार आ गया है। तुलसी जी के इष्ट हनुमान रामभक्ति के परमादर्श, लोकमंगल, वैष्णवी निष्ठा, सेवकबुद्धि, आत्मविस्मृति, त्याग, बलिदान, समर्पण, प्रहंशून्यता जैसी उदात्त वृत्तियों और भावनाओं से अलंकृत हो उठे हैं। इस भूधरा पर हनुमान के तुलसी समर्थित एवं निर्मित भक्त-चरित्र का अध्ययन अपने आप में अध्ययन-अध्यापन का एक मौलिक पक्ष है। इस तथ्य को ध्यान में रखकर 'तुलसी साहित्य में हनुमद्-भक्ति' विषय पर लेखन का यह विनम्र प्रयास है।
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