पुस्तक परिचय
डॉ. बिक्रम सिंह सौंदर्यशास्त्र के गंभीर अध्येता हैं। उन्होंने आधुनिक हिंदी आलोचना और प्रमुख आलोचकों के सौंदर्य-चिंतन पर गहन अध्ययन किया है। जीवन के विकास के साथ कला का विकास जुड़ा हुआ है। डॉ. बिक्रम सिंह ने सौंदर्य जैसे जटिल तत्व के विषय में कई तरह की मान्यताएं सामने रखी हैं। उन्हीं के अनुसार "सौंदर्य मन की आंतरिक प्रक्रिया है अथवा बाह्य और वस्तुनिष्ठ तत्व। वह प्रकृति प्रदत्त सत्ता है अथवा निरपेक्ष भाव-सत्ता। वह विषयनिष्ठ है अथवा विषयीनिष्ठ। वह वीणा के तारों में विद्यमान होता है अथवा उसका वास मनुष्य के कानों में है। वह कर्म में मौजूद है अथवा परिणाम में। वह रचित है अथवा प्रदत्त। वह दृश्यमान वस्तु है अथवा अनुभूयमान स्थिति। वह मन की गति के अनुरूप है अथवा पदार्थ का गुण है। वह सत्य है अथवा निर्मिति।" इन सभी दृष्टियों को उन्होने भारतीय और पाश्चात्य सौंदर्य-चिंतन की परंपरा के आलोक में स्पष्ट करने का प्रयास किया है। वे बताते हैं कि जिस तरह सौंदर्य-बोध और सौंदर्य-चिंतन का सतत विकास होता चलता है, उसी तरह सौंदर्य के प्रतिमान भी बदलते चलते हैं। इस पुस्तक में भारतेंदु से लेकर मुक्तिबोध तक सौंदर्य के बदलते प्रतिमानों की पहचान की गई है। हिंदी के महत्वपूर्ण रचनाकार, आलोचक और चिंतक आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के सौंदर्य-चिंतन पर डॉ. बिक्रम सिंह का विशेष काम है। इसके पहले इस विषय पर उनकी पुस्तक 'सौंदर्यशास्त्रीय चिंतन और हजारीप्रसाद द्विवेदी' प्रकाशित हो चुकी है। प्रस्तुत पुस्तक में उन्होंने द्विवेदी जी के आलोचना कर्म में विद्यमान अनेक सौंदर्य प्रतिमानों की पहचान का महत्वपूर्ण कार्य किया है। ये प्रतिमान मुख्यतः द्विवेदी जी द्वारा की गई कालीदास के साहित्य की आलोचना में मिलते हैं। डॉ. बिक्रम सिंह बताते हैं कि द्विवेदी जी रचना से ही - सिसृक्षा, समष्टि चेतना, भावानुप्रवेश, समाधि, विनिवेशन, अन्यथाकरण, करण-विगम, विनायक धर्म, नर्म तत्व जैसे सौंदर्य प्रतिमान प्राप्त कर लेते हैं और उन्हें अवधारणात्मक स्तर पर विकसित करके उन्हीं के आधार पर रचना की व्यावहारिक आलोचना करते हैं। सौंदर्यशास्त्र और सौंदर्य-चिंतन में रुचि रखने वाले अध्येताओं के लिए यह एक जरूरी पुस्तक है।
लेखक परिचय
जन्म-23 जनवरी 1960, ग्राम-जिला-रोहतास, बिहार शिक्षा-एम. एम. (हिन्दी), एम. फिल. तथा पी-एच.डी., दिल्ली विश्वविद्यालय,दिल्ली। शैक्षणिक पुरस्कार- बी. ए. (ऑनर्स) तथा एम. ए. के लिए पुरस्कृत व सम्मानित मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार, दिल्ली विश्वद्यिालय प्रो. सावित्री सिन्हास्मृति स्वर्ण पदक, दिल्ली विश्वविद्यालय हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा सम्मानित रेड क्रॉस सोसाइटी ऑफ इण्डिया, दिल्ली द्वारा पुरस्कृत शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत हिन्दू कॉलेज तथा राजधानी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा सम्मानित शोध निर्देशन- दिल्ली विश्वविद्यालय तथा मदुरै कामराज विश्वविद्यालय से क्रमशः पी-एच.डी तथा एम. फिल. का सफल शोध-निर्देशन। हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय से 4 शोध छात्र पी-एच.डी. अपाधि हेतु पंजीकृत। प्रकाशन-एक समय की बात है (कहानी संग्रह)-1985 सौन्दर्यशास्त्रीय चिन्तन और हजारी प्रसाद द्विवेदी-2010 हजारी प्रसाद द्विवेदी का लालित्य विवेक स्वतंत्र शोध पत्र प्रकाशित -कविता और फजी सौन्दर्यशास्त्र की संकल्पना-शीघ्र प्रकाश्य समकालीन उर्दू गज़ल का फज़ी सौन्दर्य-लोक, फैज़ीकरण की प्रक्रिया और नवानुभवों के सीमांत, दलित विमर्श का सांस्कृति पाठः भिखारी ठाकुर, उपेक्षितों का काव्यान्दोलन 'पंकज गोष्ठी': पूर्वपीठिका और उपलबिध, सौन्दर्य-बोध का नया झोंका सहित कई अन्य शोध पत्र प्रकाशित। पुरस्कृत रचनाएं-'पंचर' कहानी साहित्य कला परिषद, दिल्ली द्वारा पुरस्कृत-जजिमनिका' कहानी 'प्रज्ञा', रोहतक द्वारा पुरस्कृत सम्प्रति-एसोसिएट प्रोफेसर, देशबन्धु कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली।
भूमिका
सर्वविदित है कि सौन्दर्यशास्त्र अनुशासन के रूप में दर्शनशास्त्र की एक शाखा है। पश्चिम में इसका विकास कलाओं के सार्वभौम सिद्धान्तों तथा उनके मानकीकरण के रूप में हुआ। जीवन और जगत् के विविध व्यापारों में सुन्दर तत्व की पहचान-एक विषय के रूप में उभरा। आरम्भमें पश्चिमी दार्शनिकों ने इसे यक्ष प्रश्न की तरह लिया। इस प्रश्न के बहुविध विश्लेषण के क्रम में मामला कुछ ज्यादा ही उलझ गया। सौन्दर्य को चिन्हित करने की जिज्ञासा ने इस यक्ष-प्रश्न को दो टुकड़ों में बाँट दिया- आन्तरिक सौन्दर्य तथा जगत् में व्याप्त और दृश्यमान सौन्दर्य ! सौन्दर्य के इन दोनों रूपों के समर्थक और विरोधी खेमे बन गये। दो प्रकार की दृष्टियां उभर कर आयीं। विवेचन-विश्लेषण के क्रम में यक्ष-प्रश्न जटिलतर होता गया। प्रश्न उपस्थित रहा किन्तु उस पर शब्दों का आवरण चढ़ता चला गया। प्रश्न के रूप बदल गये। सौन्दर्य मन की आन्तरिक प्रतिक्रिया है अथवा बाह्य और वस्तुनिष्ठ तत्त्व। वह प्रकृति प्रदत्त सत्ता है अथवा निरपेक्ष भाव-सत्ता। वह विषयनिष्ठ है अथवा विषयिनिष्ठ। वह वीणा के तारों में विद्यमान होता है अथवा उसका वास मनुष्य के कानों में है। वह कर्म में मौजूद है अथवा परिणाम में। वह रचित है अथवा प्रदत्त। वह दृष्यमान वस्तु है अथवा अनुभूयमान स्थिति। वह मन की गति के अनुरूप है अथवा पदार्थ का गुण है। वह सत्य है अथवा निर्मिति। यह सारी जटिलता शब्दों के आवरण के कारण है। इस जटिल व्यामोह के बीच एक सामंजस्यवादी अथवा संतुलनवादी दृष्टि भी उभरकर सामने आयी। मध्य मार्ग के समर्थकों ने दावा किया कि सौन्दर्य एक ही साथ दृष्टि का विषय है तथा अनुभूति का भी।
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