रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय एवं डॉ. सी.वी. रमन विश्वविद्यालय द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किये जाने वाला टैगोर अन्तर्राष्ट्रीय साहित्य एवं कला महोत्सव, शायद देश में अपनी किस्म का पहला आयोजन है जो किसी शैक्षिक संस्थान द्वारा किया जा रहा है। जहाँ टैगोर साहित्य के क्षेत्र में देश के पहले नोबल पुरस्कार विजेता थे, वहीं सी.वी. रमन को विज्ञान में देश का पहला नोबल पुरस्कार प्राप्त करने का गौरव हासिल है। इन महान भारतीयों के नाम पर स्थापित हमारे दोनों विश्वविद्यालय इस बात पर जोर देते हैं कि विज्ञान और तकनीक के शिक्षण के साथ-साथ साहित्य एवं कलाओं का शिक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है और एक संतुलित मनुष्य के निर्माण में वैज्ञानिक दृष्टि और कलात्मक संवेदना दोनों का होना आवश्यक है। इसमें अपनी भाषा और परंपरा के प्रति गर्व और सम्मान की भावना भी सन्निहित है। विश्वरंग का आयोजन इन्हीं आधारों पर किया जा रहा है। जहाँ इसमें विश्व कविता एवं विश्व में हिंदी के सत्र आयोजित हैं, वहीं प्रवासी भारतीय साहित्य को भी उतना ही स्थान दिया गया है। यह उत्सव हिंदी और भारतीय भाषाओं को केंद्रीयता प्रदान करता है और उनमें आपसी भाईचारे और सम्मान की भावना विकसित करना चाहता है वहीं दूसरी ओर, यह बोलियों से भी रस ग्रहण करना चाहता है जिनके बिना भाषा बहुत विपन्न होगी। यह युवा रचनात्मकता पर जोर देता है और छूटे हुए समूहों जैसे थर्ड जेंडर को शामिल करना चाहता है। साहित्य, कला, रंगमंच और संगीत का यह वृहद आयोजन आज के समय में कलाओं की अंतःसंबद्धता को रेखांकित करने का एक प्रयास भी है। इसी अवसर पर देश की 200 वर्षों की कथा परंपरा को समेटते हुए 18 खंडों में कथादेश का लोकार्पण भी किया जायेगा। विश्वरंग का आयोजन इस उम्मीद के साथ किया जा रहा है कि भारत और विश्व के अन्य देशों के बीच साहित्यिक, सांस्कृतिक संवाद को मजबूत किया जा सके, संवाद और सहयोग ज्यादा गहरा हो तथा आशा और प्रेम के मूल रंगों से पहचान बढ़े।
आमतौर पर ये माना जाता है कि हिन्दी एक वैश्विक भाषा बनने की ओर अग्रसर है पर क्या वास्तव में ऐसा है? इस संग्रह में विभिन्न विद्वानों ने इस प्रश्न पर विचार किया है। सुषम बेदी और कुछ अन्य विद्वानों का मानना है कि सबसे पहले तो भारत में ही हिन्दी को पर्याप्त सम्मान देना पड़ेगा तभी विश्व में भी उसे आदर और सम्मान प्राप्त होगा। प्रख्यात विचारक हाईन्स वेर्नर वेसलर कहते हैं कि भाषा का प्रयोग और उसके साहित्य का विस्तार करना जरूरी है वैश्विक भाषा का दर्जा प्राप्त करना अपने आप में उतना महत्वपूर्ण नहीं। यूट्टा ऑस्टिन सोचती हैं कि भाषा और संस्कृति का संबंध अन्योन्याश्रित संबंध है और अगर महान भारतीय संस्कृति को बचाया जाना है तो भारतीय भाषाओं को भी बचाने का प्रयास होना चाहिए और सबसे पहले भारत में होना चाहिए। हिन्दी में शायद विद्वान तो बहुत हैं पर हिन्दी प्रेमियों की कमी है। इस सबके बावजूद हिन्दी धीरे-धीरे ही सही विश्व भर में फैल रही है। इस संग्रह में इटली, अमेरिका, चेकोस्लाविया, कजाकिस्तान, वेलारूस, बुल्गेरिया, चीन, ब्रिटेन, सूरीनाम, डेनमार्क, सिंगापुर, ऑस्ट्रलिया, न्यूज़ीलैंड, नीदरलैंड्स, जापान, दक्षिण कोरिया, पोलैंड, हंगरी और स्वयं भारत में हिंदी की स्थिति और उसके प्रचार-प्रसार का विषद विश्लेषण किया गया है जिसे डॉ. सुषम बेदी, हाईन्स वेसलर, एल्मार्क रेनर, यूट्टा आस्टिन, दागमार मारकोवा, डॉ. दरीगा कोकोऐवा, डॉ. गंगाप्रसाद शर्मा, अर्चना पेन्युली, संध्या सिंह, सुनीता नारायण, प्रो. हीरोको नागासाकी, डॉ. दानुता स्ताशिक जैसे विद्वानों ने किया है। ये सभी अपने-अपने देश में हिन्दी पढ़ा रहे हैं और इनमें से कई विश्वरंग में आयोजित विश्व में हिन्दी सेमीनार में हिस्सा भी ले रहे हैं। इस अवसर पर इस संग्रह का प्रकाशित होना सुखद व महत्वपूर्ण है।
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