प्राक्कथन
तुलनात्मक धर्म संसार के प्रधान धर्मों का अध्ययन है। यह एक धर्म विज्ञान है जो भिन्न-भिन्न परम्पराओं और संस्कृतियों का तुलनात्मक विवरण प्रस्तुत करता है। यह प्रत्येक धर्म के विभिन्न सम्प्रदायों का मूल्यांकन भी करता है जो एक सामान्य कोष से उद्भूत होते हैं। इनके अंतर्गत विभिन्न धर्मों के सिद्धान्तों के बीच समानताओं तथा विभिन्नताओं का अध्ययन किया जाता है। यह विद्या विश्व के सभी धर्मों के मूलभूत सिद्धान्तों को अनावृत्त करती है। यह धमों के पारस्परिक सम्बन्धों का अन्वेषण करती है। धर्म के सर्वांगीण अध्ययन के लिए उसके इतिहास, दर्शन तथा तुलनात्मक अध्ययन पर निर्भर रहना पड़ता है। प्रत्येक धर्म का सुदीर्घ इतिहास होता है। इतिहास उनके उद्गम और विकास की विभिन्न स्थितियों पर प्रकाश डालता है। कुछ धर्मों का इतिहास अत्यन्त विविधतापूर्ण है। चूँकि उन्हें दूसरे धर्मो के भयंकर आक्रमणों, प्रभावों, विलयन और हस्तक्षेप का सामना करना पड़ा है। इस प्रकार तुलनात्म्क धर्म समकालीन युग के विभिन्न दर्शनों के बीच तुलना एवं विभेद करता है तथा उनके एकीकरण एवं संयोजन की संभावनाओं को दिखलाता है। वह प्रत्येक धर्म के भावी संभव स्वरूप, संयोग जिसमें उसके विकसित होने की संभावना है तथा विभिन्न सम्प्रदाय या प्रवृत्तियाँ जो उनसे उद्भूत हो सकती है उन पर विचार करता है। तुलनात्मक धर्म को धर्मविज्ञान भी कहा जाता है। विज्ञान, ज्ञान को प्रमाणित एवं व्यवस्थित करता है। वह धर्म से अबौद्धिक एवं अप्रमाणिक विश्वासों को दूर करता है। जी०डब्ल्यू) गिलमौर के अनुसार, वह समय नजदीक है, जब धर्मविज्ञान को स्वीकार किया जा सकेंगा और तब वैज्ञानिक विधि का धर्म के क्षेत्र में उपयोग होगा तथा उसे सभी विशेषाधिकार भी प्राप्त होंगे। प्रसिद्ध भारतीय मानवतावादी डॉ. एन. के. देवराज के अनुसार धर्मों के मूल्यांकन को बौद्धिक तथा नैतिक सिद्धान्तों की कसौटी पर आधारित करना चाहिए। उनके अनुसार धर्म को बौद्धिक आधार पर स्थापित करना आवश्यक है। धर्म का सिर्फ बौद्धिक पक्ष ही नहीं, किन्तु मानव जाति के कल्याण में इसका पूर्णयोगदान अपेक्षित है। डॉ. देवराज के अनुसार भौतिक सामंजस्य और मानवतावादी आदर्श एक पूर्णधर्म के आधारभूत सिद्धान्त है। साम्प्रदायिक धर्म न तो बौद्धिक होता है न नैतिक न मानवतावादी। ऐसा धर्म उदार एवं सार्वभौम दृष्टिकोण रखने वाले व्यक्ति को कभी आकर्षित नहीं करता। मानव जाति में आदरणीय स्थान रखने वाला धर्म आवश्यक रूप से नैतिक तथा मानवतावादी होता है। आधुनिक धर्म आकस्मिक रूप से उत्पन्न नहीं हुए हैं, अपितु वे अपने प्राचीन रूपों के क्रमिक विकास का परिणाम है। मानवीय अनुभव के विकास के साथ धर्म का विकास एवं पूर्णता की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि धर्म के आदर्श तथा उनकी प्राप्ति के साधनों में निरन्तर परिवर्तन होते रहते हैं। मूल्यों में परिवर्तन के साथ एक समय के श्रेष्ठ धर्म बाद में बिल्कुल अग्राह्य हो जाते हैं। डॉ. देवराज के अनुसार, 'आदर्श जीवन के स्वरूप तथा उसे प्राप्त करने के साधनों को मनुष्य निरंतर परिवर्तन करता रहता है।
लेखक परिचय
डॉ. वन्दना सिंह मूलतः सुजानगंज, जिला-जौनपुर (उ.प्र.) निवासी है। प्रारम्भिक तथा उच्च शिक्षा प्रयागराज से सम्पन्न हुई। बी.ए. एम.ए. (दर्शनशास्त्र), नेट इलाहाबाद विश्वविद्यालय से किया तथा पी-एच. डी. (दर्शनशास्त्र) की उपाधि वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय से प्राप्त की। सम्प्रेति प्राचार्य तिलकधारी महिला महाविद्यालय है। दर्शनशास्त्र विषय के अध्यापन का पन्द्रह वर्षों का तथा महाविद्यालय प्रशासनिक सेवा का आठ वर्षों का अनुभव है। अनेक शोध पत्र राष्ट्रीय एवं अन्तराष्ट्रीय शोध पुस्तकों में प्रकाशित है। मुख्य रूप से दर्शनशास्त्र के भारतीय दर्शन, धर्म दर्शन, तुलनात्मक धर्म दर्शन तथा समकालीन भारतीय एवं पाश्चात्य दर्शन में अभिरूचि तथा विशेषज्ञता.
पुस्तक परिचय
प्रस्तुत पुस्तक में धर्म की परिभाषा क्षेत्र, स्वरूप, महत्व तथा आधुनिक युग में धर्म के स्वरूप तथा महत्व का वर्णन है। धर्म मनुष्य के संपूर्ण जीवन को प्रभावित करने वाली सर्वव्यापक अभिवृत्ति है। महाभारत में कहा गया है जो समाज को धारण करे वह धर्म है (धियते लोक अनेत इति धर्म या धरति धारयति वा लोकम् इति धर्म)। मनु ने धर्म के दस अनिवार्य लक्षण बताये हैं। धर्म मनुष्य के जीवन का अवियोज्य अंग है। धर्म मनुष्य को सामाजिक बनाता है तथा विभिन्न लोगों के बीच एकता का भाव बनाता है। धर्म मनुष्य की प्रवृत्तियों एवं आचार को प्रवृत्ति बनाता है। मनुष्य असहाय एवं अपूर्ण होने के कारण किसी शक्ति की अपेक्षा करता है, जिससे उसकी कठिनाइयाँ दूर हो सके इसलिए वह धर्म को अपनाता है। वेद, ब्राह्मण ग्रंथ, उपनिषद, धर्मसूत्र, महाकात्यों, रामायण तथा महाभारत में श्रीमद्भगवद्गीता, पुराणों आदि में धर्म के स्वरूप तथा महत्त्व की भिन्न-भिन्न विशद् व्याख्या की गयी है। धर्म के विषय में समकालीन दार्शनिक धर्म के नैतिक पक्ष पर विशेष बल देते हैं इनके अनुसार मनुष्य को धार्मिक होने के लिए सदाचारी तथा नैतिक आचरण से युक्त होना चाहिए।
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