किसी भी समुन्नत भाषा के दो आधार होते हैं। एक शब्दकोश और दूसरा व्याकरण। कोश, भाषा की शब्दसंपदा का संचय एवं संरक्षण करता है; व्याकरण, भाषा के स्वरूप को व्यवस्थित एवं स्थिर करता है। जिस भाषा को राजभाषा या राष्ट्रभाषा बनकर देश की सामासिक संस्कृति को अभिव्यक्त करने के योग्य बनना हो, उसका शब्द भंडार विपुल और व्याकरण सरल होना ही चाहिए। यह देखा गया है कि जिस भाषा में शब्दों को आत्मसात् करने की जितनी अधिक शक्ति होती है और जिसका व्याकरण जितना सरल-सुबोध होता है, वह भाषा उतनी ही जल्दी विकसित होती है। हिन्दी में ये दोनों विशेषताएँ हैं, इसीलिए विगत पाँच दशकों में उसने जितनी प्रगति की है, उतनी किसी अन्य भाषा ने नहीं की। आगे भी उसके विकसित और समुन्नत होने तथा विश्वभाषा के रूप में मान्य होने की पर्याप्त संभावनाएँ हैं।
संस्कृत की दुहिता होने के कारण हिन्दी को संस्कृत की विपुल शब्दावली विरासत में मिली है, किन्तु जैसा कि सर ज्योर्ज ग्रियर्सन ने कहा है, हिन्दी के बारे में एक बात याद रखने जैसी है कि इस भाषा का विकास प्रारंभ से ही आंतर्भाषा (लिंग्खाफ्रेंका) के रूप में हुआ है। जैसे महानदी को सहायक नदियों अपने जल से समृद्ध करती हैं वैसे ही व्रज, अवधी, हरियाणवी, राजस्थानी और मालवी आदि भाषाओं तथा बोलियों ने आंतर्भाषा हिन्दी को अपनी शब्द-संपदा से समृद्ध किया है। इतना ही नहीं गुजराती, मराठी, बंगाली, पंजाबी आदि अन्य प्रादेशिक भाषाओं और अरबी, फारसी और अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषाओंने भी अपनी शब्दावली से हिन्दी के शब्द भंडार की अभिवृद्धि की है। हिन्दी की इस विपुल शब्द-संपदा का प्रमाण, ग्यारह भागों में प्रकाशित "बृहत् हिन्दी शब्दसागर" है। हिन्दी के राजभाषा बन जाने के बाद, विगत पाँच दशको में हिन्दी, व्रजभाषा, अवधी, राजस्थानी, उर्दू आदि भाषाओं के तथा हिन्दी की प्रशासन एवं तकनीकी शब्दावली के अनेक कोश प्रकाशित हुए हैं, जिनसे हिन्दी की शब्द-संपदा में आशातीत वृद्धि हुई है। आज हिन्दी के विविध कोशो में संकलित साहित्यिक एवं प्रशासनिक शब्दावली की संख्या पाँच लाख के लगभग है।
यह जिज्ञासा हो सकती है कि इतने कोशों के उपलब्ध होते हुए इस कोश के प्रकाशन का क्या प्रयोजन है? और इसका नाम "हिन्दुस्तानी शब्दकोश" क्यों रखा गया है?
प्रत्येक कोश को तैयार करने के पीछे कोई न कोई प्रयोजन तो होता ही है। प्रस्तुत कोश भी एक विशेष उद्देश्य से तैयार किया गया है। ऊपर जिन कोशों का उल्लेख किया गया है, वे सब शोधार्थियों और विद्वानों के काम के हैं। स्तर और मूल्य दोनों ही दृष्टियों से वे साधारण पाठक तथा स्कूल-कॉलेज के छात्रों की पहुँच से बाहर हैं। वे केवल ग्रंथालय की आलमारियों की शोभा में अभिवृद्धि करते हैं। ये बृहत् और कीमती कोश, हिन्दीतर प्रदेश के छात्रों के लिए तो बिलकुल उपयोगी नहीं हैं, क्योंकि यहाँ के छात्र हिन्दी का अध्ययन द्वितीय भाषा के रूप में करते हैं। वे ऐसे कोशों की मांग करते हैं, जो आसानी से उपलब्ध हो सकें तथा सस्ते, संक्षिप्त और सारगर्भित हों, जिनमें उनकी गद्य-पद्म की पाठ्य पुस्तकों की शब्दावली के साथ-साथ समाचारपत्र, रेडियों, टी.वी., सिनेमा आदि संचार माध्यमों और कार्यालयों में व्यवहृत हिन्दी-उर्दू शब्दावली एक-साथ मिल सके। पश्चिमांचल के छात्रों की इन्हीं आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर हमने हिन्दी-उर्दू के सर्वाधिक प्रयुक्त २०,००० शब्दों का चयन किया है और उनके संक्षिप्त और सारगर्भित अर्थ दिए हैं। हमने प्रयत्न किया है कि हिन्दी नकर बी.ए., एम.ए. में तथा हिन्दी की स्वैच्छिक परीक्षाओं में बैठनेवाले छात्रों की पाठ्यपु नकों में प्रयुक्त सामान्य शब्दावली का समावेश इस कोश में हो जाय, साथ ही संचार माध्यम और कार्यालयों में प्रयुक्त हिन्दी-उर्दू शब्दों को भी हमने इसमें संग्रहीत किया है, जिससे जत्रों के साथ-साथ जनसाधारण के लिए भी यह कोश उपयोगी हो सके।
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