पुस्तक परिचय
प्राचीन इतिहास एवं संस्कृति के विविध आयामों के अध्ययन में पुराण साहित्य की उपादेयता निर्विवाद है। "वेद समुपवृंहण" का आदर्श तथा 'सूत' नामक संकलनकर्ताओं के प्रयायों से इनमें प्राचीन परम्पराओं के निर्वाह के साथ नवीन मान्यताओं के समन्वय की प्रवृत्ति दिखाई देती है, जो इन्हें 'विश्वकोशीय स्वरूप' प्रदान करता है। इनके संकलन की प्रक्रिया कई शताब्दियों में व्याप्त है, जिसके आधार पर ही पुराणविदों ने "पौराणिक युग" का परिकल्पन किया है। अग्निपुराण (पूर्व मध्यकालीन) रचना है, जिसके संकलन की प्रक्रिया लगभग पाँच शताब्दियों तक चलती रही है। प्रस्तुत ग्रंथ में अग्निपुराण के स्थलों की समीक्षात्मक गवेषणा के परिप्रेक्ष्य में तयुगीन सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं राजनय सम्बन्धी विभिन्न पक्षों की अभिनव समीक्षा की गयी है, साथ ही पौराणिक शोध की कतिपय समस्याओं को विमर्शित करते हुए, अग्निपुराण का स्तरीकरण देश-काल के सन्दर्भ में किया गया है।
लेखक परिचय
सभी परीक्षाओं में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण डा० हर्ष कुमार का जन्म 15 अगस्त, 1960 में रायबरेली, उत्तर प्रदेश में हुआ। आपने 'स्नातक' एवं 'परास्नातक' (प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व) की उपाधि इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राप्त की। 1985 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के "पत्राचार एवं सतत शिक्षा संस्थान" में 'अंशकालिक प्रवक्ता' नियुक्त हुये। 1987 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय की 'डी० फिल०' उपाधि प्राप्त की। इसी वर्ष प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में 'रिसर्च एसोसिएट' नियुक्त हुये । 1988 में प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रवक्ता नियुक्त हुये। पुराणों में शोधरत डा० हर्ष कुमार, 'मुद्राशास्त्र' व 'इतिहास दर्शन' आदि का अध्यापन कर रहे हैं, अनेक महत्वपूर्ण समितियों एवं संस्थाओं के सदस्य हैं, कई राष्ट्रीय संगोष्टियों में भाग ले चुके हैं तथा अनेक प्रतिष्ठित शोध पत्रिकाओं में आपके शोध लेख प्रकाशित हो चुके हैं। वर्तमान में 'वरिष्ठ प्रवक्ता के रूप में कार्यरत हैं तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय अध्यापक संघ (आटा) के 'वरिष्ठ उपाध्यक्ष' भी हैं।
आमुख
डा० हर्ष कुमार की प्रस्तुत कृति इलाहाबाद विश्वविद्यालय की प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व में, डी० फिल० उपाधि हेतु स्वीकृत शोध-प्रबन्ध है, जिसमें अग्निपुराण का गहन ऐतिहासिक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। वर्तमान अग्निपुराण के कई स्तर निरूपित किये गये हैं, जो इसमें अलग-अलग चरणों में भारतीय इतिहास के पूर्व मध्यकाल में समाविष्ट किये गये थे। इसमें नाना विषयों का भी समावेश मिलता है, जिसके कारण इसका कलेवर विश्वकोश जैसा बन गया है। (आग्नेये हि पुराणेषस्मिन् सर्वविद्याः प्रदर्शिताः-383,51) पाम्परिक विषय-वस्तु के साथ-साथ इस पुराण में ऐसी सामग्री भी मिलती है, जो पूर्व मध्यकाल के समाज एवं संस्कृति पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालती है। इस पुराण के कुछ पक्षों पर विश्रुत विद्वानों ने श्लाघनीय शोध किया है। पर व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में इसके आलोचनात्मक अध्ययन की दिशा में अभी और अनुसन्धान अपेक्षित है। प्रस्तुत शोध-कृति इसी दिशा में एक स्तुत्य प्रयास है। यह पाँच अध्यायों में विभक्त है। प्रथम अध्याय में अब तक की पौराणिक शोध की पृष्ठभूमि में मुख्य रूप से अग्निपुराण के स्तरीकरण का (अनुसन्धान) देश एवं काल के परिप्रेक्ष्य में किया गया है। द्वितीय अध्याय में अग्निपुराण में प्रतिविम्बित बहुलता-विशेषित धार्मिक संदर्श एवं उसके अन्तर्गत पूर्व मध्यकाल की नवीन प्रवृत्तियों का विवेचन मिलता है। तृतीय अध्याय में सामाजिक व्यवस्था एवं परिस्थितजन्य सामाजिक परिवर्तनों का अनुशीलन किया गया है। चतुर्थ एवं पंचम अध्याय क्रमशः आर्थिक व्यवस्था एवं राजनय के विभिन्न पक्षों पर अभिनव प्रकाश डालते हैं।
प्रस्तावना
"अष्टादश" पुराणों में अग्नि पुराण का विशिष्ट स्थान है। विलियम जोन्स के समय से लेकर अद्यतन, प्रस्तुत पुराण के बहु-आयामी स्वरूप को अनेक विद्वानों ने अपनी समीक्षा का विषय बनाया है। इनमें केवल कुछ एक को यहाँ सन्दर्पित किया जा सकता है। सदाशिव ज्ञानी ने इसमें (निःस्थूत) पक्षों को अपने सुविदित ग्रन्थ "Agni Purana-A Study" में ऐतिहासिक परिसर में रखने की चेष्टा किया है। एस०बी०चौधरी ने इसकी रचना-काल को आठवीं और नवीं शताब्दी में रखने का प्रयास किया है। एस० के० डे० ने इसके अलंकार-विषयक स्थलों को नवीं शताब्दी ईस्वी रखना चाहा है। आर० सी० हाजरा के अनुसार उपलब्ध अग्निपुराण वस्तुतः अनुपलब्ध मूल अग्निपुराण का प्रतिसंस्कारित रूप है। सामान्य रूप में इन्होंने इसका समय नवीं शताब्दी ईस्वी माना है। दशरथ शर्मा ने राजनय से सम्बधित इसके सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक पक्षों पर पाण्डित्य-पूर्ण प्रकाश डाला है। मझे हर्ष है कि मेरे पुराने शिष्य डॉ० हर्ष कुमार ने उक्त विद्धानों के मतों के साथ-साथ अनेक विद्वानों के मतों को विश्लेषित करते हुए, तथा इन मतों के औचित्य-अनौचित्य को रेखांकित करते हुए अपने शोध-प्रबन्ध को विषयानुकूल एवं वस्तुनिष्ठ-परक परिवेश में सुनियोजित, सरल एवं सुग्राह्य शैली में सन्निबद्ध करने का सफल प्रयास किया है। पूरे प्रबन्ध को पढ़ने से ऐसा लगता है कि लेखक इस तथ्य से परिचित हैं कि अन्य अनेक पुराणों की भाँति अग्निपुराण विश्वकोश-सदृश सर्वज्ञान-विषयक ग्रन्थ है, जिसमें भारतीय संस्कृति के अनेक तत्व प्रतिबिम्बित हुये हैं।
पुरोवाक्
पुरातन प्राच्य विद्या के संज्ञापक एवं सन्निदर्शक के रूप में पौराणिक वाङ्मय का महत्व संशय-रहित है। इसके बहु-आयामी विषयों को जिन पाश्चात्य एवं पौर्वात्य विद्वानों ने समीक्षा का विषय बनाया है, उनकी रचनाओं से यह सुस्पष्ट हो जाता है कि अतीत कालीन वृत्तों के ऐतिह्य-परक परीक्षण के लिए प्रस्तुत वाङ्मय की उपादेयता विवाद-रहित है। आपाततः पुराण-ग्रन्थ" वेद-समुपबृंहण" के आदश को प्रतिष्ठापित करते हैं, किन्तु अभिव्यक्ततः इनमें नवीन मान्यताओं के साथ समन्वयन की प्रवृत्ति घनीभूत होती दिखाई देती है। इसके परिणाम में इनमें स्थल-हानि एवं स्थल संयोजन तथा पुरातन की पुनरावृत्ति एवं वर्तमान की समनुवृत्ति की द्वैधी प्रक्रिया का प्रतिबिम्बन अनेकशः निदर्शित् हुआ है। यही कारण है कि प्रसंगानुकूल स्थलों के स्तरीकरण के द्वारा एक ही पुराण के आधार पर अनेक युगों की सांस्कृतिक अवधारणाओं को ऐतिहासिक अनुशीलन मर्यादित ढंग से किया जा सकता है। इसमें सन्देह नहीं कि अग्निपुराण पौराणिक संरचना से सम्बन्धित विशेषताओं का एक ऐसा ऐतिहासिक निदर्शन है, जिसके स्थलों द्वारा विभिन्न युगों के सांस्कृतिक संघटकों तथा इन्हें प्रेरणा एवं स्फूर्ति प्रदान करने वाली युग-विशिष्ट अथवा युगान्तर-विशिष्ट प्रवृत्तियों के विविध पक्षों का अनेकधा उद्घाटन होता है। शोध-विषयक आधुनिक मापदण्डों की सर्वथा अपेक्षा रखते हुए तथा अग्निपुराण के रचना-विषयक तत्वों को ध्यान में रखते हुए, प्रस्तुत ग्रंथ (इलाहाबाद विश्वविद्यालय द्वारा डी० फिल० उपाधि के लिए स्वीकृति शोध प्रबन्ध) का अनुशीलन अनुगामी अनुच्छेदों में निरूपित किया गया है।
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