पुस्तक परिचय
प्रस्तुत पुस्तक, बुद्धकालीन भारत, में बौद्धकाल की ऐतिहासिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक तथा भौगोलिक सामग्रियाँ, जो यत्र-तत्र बिखरित हैं, उसे योजनाबद्ध कर अन्य पालि स्त्रोतों से इसका तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। अतः यह पुस्तक पालि जगत के साथ-साथ ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भी काफी महत्वपूर्ण एवं उपयोगी है, क्योंकि इस प्रकार का कोई क्रमबद्ध रूप से विवेचन करने के लिए पुस्तकों की कमी है जिसे यह पुस्तक दूर कर सकेगी। दस अध्यायों में लिखित यह पुस्तक बुद्धकालीन सामाजिक एवं आर्थि संरचना, बुद्ध वचन एवं उनका ऐतिहासिक परिपेक्ष्य, त्रिपिटकों में वर्णित भौगोलिक स्थिति, समाज और अर्थ-तंत्र, शिक्षा से सम्बन्धित कई मुद्दे, धार्मिक एवं सांस्कृतिक अवस्था, राजतंत्र एवं गणतंत्र जैसे महत्वपूर्ण पक्षों पर प्रकाश डालता है।
लेखक परिचय
डॉ० पूनम कुमारी, एम०ए० (स्वर्ण पदक), पीएच० डी०, गंगा देवी महिला कॉलेज, पटना (मगध विश्वविद्यालय की एक अंगीभूत इकाई), में पालि विभाग के विभागाध्यक्ष के पद पर 1985 से कार्यरत है। कई शोध-पत्रिकाओं इनका शोध निबन्ध प्रकाशित हो चुका है।
प्राक्कथन
बुद्धकालीन भारत मुख्यतः पालि स्त्रोतों पर आधारित पुस्तक है। त्रिपिटक साहित्य के दीघ-निकाय में निर्धारित सुत्तों को सूक्ष्म रूप से अध्ययन के पश्चात् ऐसी धारणा बनी कि इन सुत्तों में बौद्धकालीन ऐतिहासिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक तथा भौगोलिक सामग्रियाँ जो बिखरित हैं, उन्हें योजनाबद्ध कर अन्य पालि स्त्रोतों से तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया जाय तो पालि जगते के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध हो सकती है, साथ ही इतिहास अध्ययन के क्षेत्र में भी इसकी अहम भूमिका होगी। इस प्रकार का कोई क्रमबद्ध रूप से विवेचन करने के लिए पुस्तक अब तक उपलब्ध नहीं है और इसी अभाव की पूर्ति प्रस्तुत पुस्तक द्वारा करने का एक प्रयास किया गया है। इस कार्य में मैं कहाँ तक सफल हो पाई हूँ इसका आकलन आपके सम्मुख है। इन्हीं भावनाओं से प्रेरित होकर मैंने प्रस्तुत विषय का चयन किया, जिसकी रूप रेखा दस अध्यायों में विभाजित है । पहला अध्याय बुद्ध एवं उनके वंश-परम्परा, काल एवं तत्कालीन भारत की राजनैतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक स्थिति का संक्षिप्त वर्णन प्रस्तुत करता है । दमरा एवं तीसरा अध्याय का सम्बन्ध बुद्ध वचन के रूप में है जो प्रमाणित त्रिपिटक-साहित्य, उसी की भाषागत विशिष्टताओं के आधार पर एवं रचनाकार, काल आदि का सम्यक् निरूपण करते हुए दीघ निकाय और उसके महत्व का भी प्रतिपादन किया गया है। साथ ही साथ इस क्रम में यथासम्भव अट्ठकथाओं तथा उप-अट्ठकथाओं का भी सहारा लिया गया है।
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