पुस्तक परिचय
प्रस्तुत पुस्तक भारतीय पुरातत्त्व एवं अधिनियम में पुरातत्विक अध्ययन के क्षेत्र में भारत में हुए प्रगति के बारे में विशद् विवेचन एवं पुरातात्विक अधिनियमों का समालोचनात्मक अध्ययन किया गया है। पुरातत्त्व वैज्ञानिकों कनिंघम, मार्शल, व्हीलर संकालिया, घोष, लाल के अवदानों की चर्चा की गई है। 21 वी शताब्दी में भारतीय पुरातत्त्व की दशा एवं दिशा को भी दर्शाया गया है। हमे पूर्ण विश्वास है कि इससे इतिहास, पुरातत्त्व विषयक अध्ययन से जुड़े छात्र, शिक्षक, शोध-प्रज्ञ एवं सामान्य सुधीजन पाठक लाभान्वित होगें।
लेखक परिचय-1
डॉ० जयदेव मिश्र 1979 ई० से पटना विश्वविद्यालय में शोध एवं अध्यापन कार्य में संलग्न है। बुद्धिस्ट आइकनोग्राफी इन बिहार (600-1200 ई०) विषय पर पी-एच० डी० की उपाधि प्राप्त की। आपकी पुरातत्त्व सम्बधी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। आपके अनेक शोध-पत्र एवं निबंध विख्यात पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं। कई ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक संस्थाओं से सम्बद्ध हैं।
लेखक परिचय-2
डॉ० अरविन्द कुमार (जन्म 5 फरवरी 1980, ग्राम भगवानपुर स्टेशन, जिला वैशाली) इन्होंने पटना विश्वविद्यालय से एम० ए० (प्रा० भा० इ० एवं पुरातत्त्व), एम० ए० (इतिहास), एल-एल० बी० किया तथा भारत के शैक्षणिक पुरावशेषों का सांस्कृतिक अध्ययन (1206 ई० तक) विषय पर पी-एच० डी० की उपाधि 2010 में प्राप्त की और इन्हें भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् (ICHR) से जूनियर रिसर्च फेलोशिप प्राप्त हुआ है। इनकी कई पुस्तकें एवं शोध निबंध प्रकाशित हो चुके हैं।
प्राक्कथन
पुरावशेषों का अध्ययन 'पुरातत्त्व' कहलाता है। आधुनिक काल में पुरातत्त्व एक लोकप्रिय विषय के रुप में उभरा है। जो ऐतिहासिक अध्ययन को वैज्ञानिकता प्रदान करती है। पुरातात्विक अध्ययन हमारे विरासत को अतीत के गहन गहह्वर से वर्तमान की देहरी तक पहुँचता है। इसमें राजे-महाराजे की गतिविधियों से लेकर सामान्य जन से संबद्ध सांस्कृतिक साक्ष्य प्राप्त होते है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ऐतिहासिक अध्ययन में वस्तु-निष्ठता पुरातत्त्व के माध्यम से ही आती है। विश्व में जहाँ पुरावशेषों का अध्ययन भारत से पहले प्रारंभ हुए, वही भारत में इसकी पृष्ठभूमि औपनिवेशिक काल में दिखती है। ब्रिटिश राज में इसे पल्लवित एवं पुष्पित होने का मौका मिला। स्वतंत्रोत्तर जब पुरातात्विक अध्ययन में वैज्ञानिकता आई तो भारतीय पुरातत्त्व चरमोत्कर्ष पर पहुँच गई, न केवल सरकारी विभाग रहे बल्कि प्रांतीय एवं शिक्षा विभाग के महत्वपूर्ण विषय बन गए । यह धरोहर को जानने एवं सुरक्षित रखने का माध्यम बनी। अनेक पुरानिधि अधिनियम, परिनियम बने जिससे कि विरासत की संरक्षा की जा सकें। 21वीं शताब्दी में भारतीय पुरातत्त्व अंतः आयामी से बहुआयामी बनकर जनमानस में पहचान बनाई। सूचना एवं संचार प्रोधौगिकी (ICT) के प्रयोगों से नए आयाम विकसित हुए। सामुद्रिक सर्वेक्षण (Marine Survey), उपग्रह चित्रण (Satellite Imaging), गामा किरण विश्लेषण (Gamma ray Spectometry GRS), भौगोलिक सूचना प्रणाली (Geographical Information System GIS), भूमंडलीय स्थलीय प्रणाली (Global Positioning System GPS), सूदूरवर्ती संवेदना (Remote Sensing) आदि के पुरातत्त्व में प्रयोग ने सामुद्रिक पुरातत्त्व (Marine Archaeology), हवाई पुरातत्त्व (Arial Archaeology), पर्यावरण पुरातत्त्व (Environmental Archaeology)
भूमिका
पुरावशेष मानव सभ्यता और संस्कृति का जीवन्त प्रमाण है। ऐतिहासिक काल में भी पुरातात्विक सामग्रियाँ लिखित तथ्यों के लिए साक्ष्य का कार्य करती है तथा प्रमाणिकता की दिखा में विशेष सहायक होती है। पुरातत्व शब्द अंग्रजी के 'आर्कियोलॉजी' (Archaeology) का पर्याय है। अंग्रेजी शब्द आर्कियोलॉजी युनानी भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना आर्कियोस (Archaios) + लोगास (Logos)। आर्कियास का अर्थ है है पुरातन एवं लोगास का अर्थ है ज्ञान। इस प्रकार आर्कियोलॉजी का अर्थ है पुरातन ज्ञान। इसमें समस्त पुरानी वस्तुओं को लिया जाने लगा जिसका निर्माता मानव रहा हो। इसके द्वारा अतीत उजागर होता है तथा इससे एक क्रमबद्ध, ज्ञान प्राप्त होता है। पुरातत्व के अन्तर्गत इतिहास के उदय काल के पूर्व तथा बाद के मानव समाज और संस्कृति का अध्ययन और अन्वेषण किया जाता है। अतः हम कह सकते हैं कि पुरातत्व मानव के उस कड़ी के अध्ययन में लगा है जो कभी धरती पर था, पर आज विलुप्त है। इसी के सहारे आज केवल इन नष्ट न हुए अतीत के अवशेषों के आधार पर वास्तविक संस्कृति का पुनर्निमाण करना सम्भव हो सका है। पुरातत्व विज्ञान के उद्भव के बारे में कई कथानक है। मेसोपाटामिया शासक कैल्डियन नवोदिश को इसका श्रेय देते हैं। नवोदिश ने सिप्पुर नगर में सितिशमस (सुर्य) स्थापत्य के नीचे के अवशेष का उत्खनन कराया था। दूसरे मत के अनुसार हानवंश के सू-म-सियेन (Ssu-ma-Chien) को मानते हैं। जो चीन के प्राचीन स्मारकों के पुरावशेषों का सर्वेक्षण करवाया था। अब लोग यूनान (Greece) तथा रोम (Rome) की क्लासिकल सभ्यता की खोज से मानते हैं। 15वीं शताब्दी के अन्त में इटली में रोम की कलाकृतियों का संग्रह होने लगा।
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