रवि बाबू चित्रकला से अपने जीवन के अंतिम दशक में जुड़े और उन्होंने एक स्थान पर लिखा कि अब मैं चित्रकला से इस कदर जुड़ गया हूँ कि प्रायः यह भूल जाता हूँ कि मैं कभी कविता भी लिखा करता था। उनके लिये चित्रकला में पदार्पण शब्दों की दुनिया के कोलाहल से दूर एक खामोश कला में खो जाने का सफर था। उन्हें चित्रकला, 'जीवन संध्या की प्रेयसी' जैसी प्रतीत होती थी। उन्होंने 1938 में विलियम रोटेन्सटाइन को लिखे पत्र में कहा, 'यह चित्रकला मेरे मन की नियमित क्रीड़ा साथी बन मुझे साहित्यिक वाचालता या मुखरता से ज़रूरी विकर्षण प्रदान कर रही है। यह मानो एक सपना है...'।
इस खामोश दुनिया की तलाश जिसमें सिर्फ रंग बोलते हैं, मौन आपके अवचेतन से बात करता है और रूपाकार एक नई दुनिया का सृजन करते हैं। प्रारंभसे ही यह रंगों की दुनिया विश्वरंग के सपनों में शामिल रही है। वह चाहे टैगोर पर केंद्रित चित्रकला प्रदर्शनी का आयोजन हो या देश के सौ से अधिक युवा चित्रकारों की राष्ट्रीय चित्रकला प्रदर्शनी का आरंभ, वह भारतीय चित्रकला के इतिहास पर संवाद तथा पुस्तिका का प्रकाशन हो या भारतीय चित्रकला में नारी परिप्रेक्ष्य और अमूर्तन पर बातचीत, वह देश की प्रख्यात महिला चित्रकारों पर केंद्रित नेशनल आर्टिस्ट कैंप हो या युवा चित्रकारों की कला पर केंद्रित कैटलॉग का प्रकाशन, विश्वरंग ने हर समय चित्रकला को अपने विमर्श में केंद्रीय स्थान दिया है।
भारतीय चित्रकला पर केंद्रित यह पुस्तक उसी यात्रा का अगला पड़ाव है।
भीमबैठका जैसे पत्थरों पर उकेरे प्रकृति और जीवन के चित्र भारतीय चित्रकला के आदि स्थान माने जाते हैं। भित्ति चित्रों से आगे बढ़ते हुए कला ने लोक में अपनी जगह बनाई एवं तीज-त्यौहारों पर, ऋतुओं और मौसमों पर, प्रकृति और मानव जीवन पर बनाये चित्रों ने भारतीय मानस में गहरी पैठ बना ली। आदिवासी समाजों में चित्रकला की एक अलग परंपरा विकसित हुई जिसमें प्रकृति, जानवर और देवता अद्भुत ढंग से प्रगट होते हैं और मनुष्य के अवचेतन को कई स्तरों पर छूते हैं। वहाँ लोक कथाओं को भी चित्रकला में प्रस्तुत किया जाता है वैसे ही जैसे भारत के अनेक मंदिरों में राम और कृष्ण पर केंद्रित कथाएं तथा भारतीय पौराणिक कथाएं अत्यंत भव्यता के साथ चित्रित की गई हैं। आगे चलकर चित्रकला में, विशेषकर नागर कलाओं में, एक समग्र जीवन दृष्टि विकसित हुई। राग माला पेंटिंग इसका अद्भुत उदाहरण हैं।
रागमाला या रागों की माला लघुचित्रों का ऐसा संग्रह है जो रागों के मूड या उनके भाव को चित्रित करता है। राग प्रकृति और प्रहर के अनुसार ईश्वर की प्रार्थना से निबद्ध थी। रागों के भाव को एक कविता से भी दर्शाया जाता था जो अक्सर रागमाला चित्र के ऊपर लिखी होती थी। अक्सर कवि अपनी कविता पर यह भी लिखते थे कि इसे किस राग में गाया जाना है। इस तरह कविता, संगीत और चित्रकला का अद्भुत समन्वय रागमाला पेंटिंग में देखने मिलता है। कविता राग और चित्र में छुपे रस का अवगाहन करती थी। अगर राग का काम श्रोता के मन में एक निश्चित रस का प्रवाह कर निश्चित भाव पैदा करना था, तो उस भाव को चित्रित भी किया जा सकता था। इस तरह चित्रकला मुझे संगीत के अधिक निकट जान पड़ती है।
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