प्राक्कथन
भारतीय दर्शन एवं भारतीय नीतिशास्त्र की अवधारणाएँ काफी समृद्ध रही है। वैश्विक पटल पर इन अवधारणाओं को समझने एवं भारतीय जीवन शैली को आत्मसात करने के लिए वैश्विक समाज प्रयत्नशील है। भारत का दर्शन एवं नीतिशास्त्र व्यावहारिक रहा है। यही कारण है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भारत की ज्ञान परम्परा एवं नीतिशास्त्र की समझ विकसित करने के लिए स्नातक एवं स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में इसे विशेष स्थान दिया गया है। पुस्तक लेखन एक जटिल कार्य है लेकिन हमारे मित्र प्रो. नागेन्द्र मिश्र के सहयोग से ही यह सारस्वत कार्य अपेक्षाकृत कम समय में सम्पन्न हुआ है। हम दोनों ने इस कार्य को पूरा करने में कितना परिश्रम किया है, इसका मूल्यांकन आप सुधी पाठक ही कर सकते हैं। राष्ट्रीय शिक्षा 2020 के अनुरूप चार वर्षीय दर्शनशास्त्र (स्नातक) के लिए पाठ्यक्रम पर आधारित इस पुस्तक के एम.जे.सी.-III में भारतीय दर्शन के सम्प्रत्यय को तथा एम.जे.सी.-IV में भारतीय नीतिशास्त्र के सम्प्रत्यय को साफ एवं स्पष्ट तरीके से प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। विषयों की व्याख्या तुलनात्मक एवं आलोचनात्मक ढंग से की गयी है ताकि विद्यार्थियों के लिए यह अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकें हिन्दी भाषा में सुस्पष्ट पुस्तक की कमी को देखते हुए चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम (FYUGP) के दर्शनशास्त्र विषय के सभी सेमेस्टर में पुस्तक लेखन की प्रेरणा मुझे मोतीलाल बनारसीदास की पटना शाखा के प्रबंधक श्री एस.एन. याज्ञनिक से मिली। मोतीलाल बनारसीदास के निदेशक श्री रवीन्द्र जैन के असीम सहयोग एवं शैक्षणिक सलाहकार श्री वाचस्पति पाण्डेय जी के बहुमूल्य सुझाव से तृतीय समेस्टर के एम.जे.सी., एम.आई.सी. एवं एम.डी.सी.-III एवं एम.जे.सी.-IV की पुस्तक आपके समक्ष है। निश्चित तौर पर इसी प्रकाशन संस्थान से पूर्व में प्रकाशित दर्शनशास्त्र प्रथम एवं द्वितीय सेमेस्टर की पुस्तक निगमन तर्कशास्त्र एवं वैज्ञानिक विधि की अपार सफलता ने तृतीय सेमेस्टर के लिए भी पुस्तक लेखन हेतु हमें अभिप्रेरित किया। ये सभी पुस्तकें दर्शन के जिज्ञासुओं एवं प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए भी उपयोगी साबित होगी। यह पुस्तक विद्यार्थियों एवं पाठकों के लिए उपयोगी होगी, ऐसा लेखक द्वय को पूर्ण विश्वास है। डॉ. नीरज प्रकाश, सत्यम कम्पोजर्स पटना को विशेष रूप से धन्यवाद देता हूँ जिनके अथक प्रयास से यह सारस्वत कार्य पूर्ण हो सका। अन्त में भारतीय दर्शन एवं भारतीय नीतिशास्त्र के पूर्व के लेखकों को सामग्री लेखन में सहयोग के लिए आभार व्यक्त करता हूँ तथा प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग देने वाले सभी सुधीजनों को धन्यवाद देता हूँ। पुस्तक का यह प्रथम संस्करण है। इसलिए कुछ खामियों का रहना स्वाभाविक है। पाठकों के सुझाव का हम सदैव स्वागत करेंगे। परिमार्जन व सुधार की अपेक्षा निरन्तर बनी रहती है।
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