दसबलसेलप्पभवा, निब्बानमहासमुद्दपरियन्ता ।
अदृङ्गमग्गसलिला, जिनवचननदी सदा वहतु ॥
विनयपिटक :
भगवान् अर्हत् सम्यक्सम्बुद्ध द्वारा पालिभाषा में कहे गये समग्र वचनों (सारगर्भित उपदेशों के संग्रह) को त्रिपिटक कहते हैं। त्रिपिटक में तीन पिटक हैं-1. विनयपिटक, 2. सुत्तपिटक एवं 3. अभिधम्मपिटक। इनमें विनयपिटक बौद्ध धर्म के अनुयायी भिक्षुसङ्घ का संविधान (आचारसंहिता) है। अतः धार्मिक दृष्टि से उसका सुत्तपिटक से अधिक महत्त्व है; क्योंकि यह बुद्ध शासन की आयु (स्थिरतादायक) है। अतएव बौद्ध धर्म की स्थविरवादपरम्परा ने 'विनयपिटक' को अपनी धर्म-साधना में सदैव अत्यधिक उच्च स्थान दिया है।
सचाई यह है कि भगवान् बुद्ध ने जिस 'धम्म' का उपदेश दिया था उसका साक्षात्कार जीवन की अतिशय पवित्रता के विना उस समय भी असम्भव था, और आज भी है। इस पवित्रता के सम्पादन हेतु जिस साधना-मार्ग की आवश्यकता थी उसका विस्तृत उपदेश तो सुत्तपिटक एवं 'अभिधम्म' में दे दिया था, किन्तु भिक्षु भिक्षुणियों के सङ्घों की स्थापना के बाद उनमें कुछ असंयमी और कदाचारी एवं चित्त मलग्रस्त व्यक्तियों के आ जाने से सङ्घ की व्यवस्था को कठोर व्यावहारिक नियमों से बाँधने की भी आवश्यकता आ गयी। यही कारण है कि हम विनयपिटक में यथाप्रसङ्ग नाना प्रकार के नियमों का प्रज्ञापन भगवान् बुद्ध के श्रीमुख से हुआ देखते हैं।
पातिमोक्ख :
फिर भी, यह बात निश्चित है कि शिक्षापद एवं प्रातिमोक्ष सम्बन्धी नियमों का प्रज्ञापन होने के बाद सङ्घ के लिये ये अत्यन्त आवश्यक हो गये; अतः प्रारम्भ में ये शिक्षापद, भले ही विनयपिटक के पाराजिक, पाचित्तिय नामक ग्रन्थों (सुत्तविभङ्ग) में व्याख्यान के साथ रहे हो, बाद में इनके पाठ की आवृत्ति प्रति 15वें दिन (उपोसथ के दिन) आवश्यक हो जाने के कारण व्याख्यारहित मूल शिक्षापदों का संग्रह 'पातिमोक्खसुत्त' नाम से किया गया। इस सुत्त को भी भिक्षु और भिक्षुणियों के लिये पृथक् पृथक् दो भागों में विभक्त किया गया-1. भिक्खुपातिमोक्ख एवं 2. भिक्खुनीपातिमोक्ख ।
पातिमोक्ख का पाठ : वर्तमान में पातिमोक्ख के शिक्षापदों के तीन पाठ मिलते हैं- 1. पालिविनयपिटक में 2. तिब्बती संस्करण (मूलसर्वास्तिवादियों का अनुवाद) में एवं 3. चीनी विनयपिटक में। इन तीनों में शिक्षापदों की गणना इस प्रकार है-
उपर्युक्त सूचियों से स्पष्ट है कि पालि-विनय-पिटक में शिक्षापदों की संख्या 227 और चीनी संस्करणों में 250, तथा तिब्बती संस्करणों में 258 है। जहाँ तक पालि और तिब्बती संस्करणों की तुलना का प्रश्न है, उनके प्रत्येक नियम की संख्या में समानता है। केवल शैक्ष्यसम्बन्धी नियमों में असमानता है। वे पालि-संस्करण में 75 हैं जबकि तिब्बती-संस्करण में 106 हैं। इसी कारण तिब्बती संस्करण के नियमों की कुल संख्या भी 31 बढ़ गयी है।
पालि और चीनी संस्करणों में केवल 'पाचित्तिया धम्मा' (पातयन्तिक धर्म) और 'सेखिया धम्मा' (शैक्ष्य) इन दो नियमों की गणना में अन्तर है। पालि-संस्करण में इनकी संख्या क्रमशः 92 और 75 है, जबकि चीनी संस्करण (शिबुन-रित्सु) में वह इसी क्रम से 90 और 100 है।
'पाचित्तिय' धर्मों से सम्बद्ध मतभेद कुछ महत्त्वपूर्ण भी हो सकता है, किन्तु 'सेखिय' धर्म-सम्बन्धी मतभेद सर्वथा ही महत्त्वपूर्ण नहीं है। 'सेखिय धम्म' बाह्य शिष्टाचार से सम्बद्ध छोटे-मोटे नियम हैं, जो बुद्धोक्त 'क्षुद्रानुक्षुद्र' की कोटि में सरलतया परिगणित हो जाते हैं। अतः उनके विषय में मतभेद होना भिक्षु संघ के इतिहास में प्रथम संगीति के समय से ही देखा जाता है। स्वयं विभिन्न चीनी सम्प्रदायों के विनय-पिटकों में भी इसके विषय में समानता नहीं मिलती है। पालि विनय-पिटक के 75 'सेखिय' धर्मों के स्थान पर 'शिबुन-रित्सु' (चीनी विनय) में तो उनकी संख्या 100 है, किन्तु नवीन सर्वास्तिवादी विनय के अनुसार उनकी संख्या 103 है। तिब्बती मूलसर्वास्ति-वादियों के अनुसार वह संख्या 106 है ही, जैसा हम लिख चुके हैं। इस प्रकार कुछ छोटे मोटे विभेद हैं।
'महाव्युत्पत्ति' (महायानी ग्रन्थ) ने इन शैक्ष्य धर्मों को 'असंख्य' (सम्बहुलाः शैक्ष्यधर्माः) बताकर इस भेद का बहुत अच्छा समाधान कर दिया है।
एक अन्य समाधान :
पालि और चीनी विनय-पिटकों के शिक्षापदों की तुलना के आधार पर यहाँ एक समाधान रखना आवश्यक प्रतीत होता है। पालि विनय-पिटक में शिक्षापदों की संख्या 227 है, किन्तु अंगुत्तरनिकाय में कम से कम तीन स्थानों पर उसकी संख्या 150 कही गयी है। वहाँ भगवान् ने यह स्पष्ट देशना की है- "भिक्षुओ! यह प्रति पन्द्रहवें इन 150 से अधिक शिक्षापदों को स्मरण करना पड़ता है, साधारणबुद्धि साधकों के लिये इतना लम्बा पाठस्मरण काठिन्यप्रद हो सकता है। अतः भिक्षुओ ! उन शिक्षापदों के स्थान पर इन तीन शिक्षाओं का (1. अधिशील, 2. अधिचित्त एवं 3. अधिप्रज्ञ शिक्षाओं) का स्मरण वैसे साधकों के लिये अधिक सरल होगा। इन तीनों शिक्षाओं में वे सभी शिक्षापद समाहित हो जाते हैं।
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