प्राक्कथन
बैंकिंग किसी भी अर्थव्यवस्था को परिष्कृत, समृद्ध रूप प्रदान करती है। मध्यकालीन राजस्थान के व्यापार एवं वाणिज्य के विकसित संगठन, राज्य के बाहर के व्यापारियों का राजस्थान की ओर निष्क्रमण, शहरीकरण की प्रवृत्ति एवं कृषिगत अर्थव्यवस्था में उभर रहे नकदीय सम्बन्धों ने मौद्रिक अर्थव्यवस्था को विस्तार स्वरूप प्रदान किया और गहन मौद्रिक अन्तःसम्बन्धों का प्रत्यक्षीकरण बैंकिंग व्यवस्था के रूप में हुआ।
प्रसिद्ध आर्थिक इतिहासकारों प्रो. एस.पी. गुप्ता, प्रो. दिलबाग सिंह, प्रो. बी.एल. भादानी एवं प्रो. बी.एल. गुप्ता ने राजस्थान के कृषिगत एवं व्यापारिक इतिहास पर महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। अभी तक मध्यकालीन राजस्थान की वित्तीय पद्धतियों एवं ऋण प्रणाली पर स्वतंत्र ग्रन्थों का लेखन नहीं किया है। प्रस्तुत ग्रन्थ में मध्यकालीन राजस्थान में देशीय बैंकिंग व्यवस्था पर स्वतंत्र अध्ययन किया गया है। यह ग्रन्थ मुख्यतः राजस्थान राज्य अभिलेखागार, बीकानेर, लोकसंस्कृति शोध संस्थान, नगर-श्री, चूरू एवं भारतीय विद्या मंदिर शोध प्रतिष्ठान, बीकानेर में उपलब्ध समकालीन अभिलेखागारीय सामग्री पर आधारित है।
पूर्व-आधुनिक राजस्थान की अर्थव्यवस्था में देशीय बैंकिंग व्यवस्था सुदृढ़ रूप से कार्यरत थी। इस ग्रन्थ में प्रयुक्त महत्वपूर्ण अभिलेखागारीय दस्तावेजों की प्रमाणिकता एवं प्रासंगिकता असंदिग्ध है। अभिलेखागारीय दस्तावेज राजस्थानी एवं मुड़िया लिपि में लिखे हुये हैं, इन मौलिक दस्तावेजों के आधार पर ऋण-पत्रों, हुण्डियों के प्रारूप, ऋण के लेन-देन में उपजे विवाद, जोखिम, जमानती एवं साख प्रथा और देशीय बैंकिंग के प्रशासनिक संगठन एवं लेखांकन का भी अध्ययन किया है।
प्रस्तुत ग्रन्थ के लिए शोध सामग्री जुटाने में राजस्थान राज्य अभिलेखागार, बीकानेर, लोक संस्कृति शोध संस्थान, नगर-श्री, चूरू, भारतीय विद्या मंदिर शोध प्रतिष्ठान, बीकानेर, राजस्थान अध्ययन केन्द्र, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर एवं नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी, नई दिल्ली के समस्त अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने सहयोग दिया है, इनके प्रति मैं अपनी कृतज्ञता प्रकट करना चाहूँगा।
इस ग्रन्थ लेखन के लिए सदैव मेरा उत्साह संवर्द्धन एवं बहुमूल्य सुझाव के लिए प्रो. बी.एल. गुप्ता, श्री गोविन्द अग्रवाल, श्री पूनमचन्द जोइया, प्रो.. कृष्ण गोपाल शर्मा, डॉ. रश्मि पाटनी, डॉ. बी.एल. शर्मा, डॉ. कोमलकान्त शर्मा एवं कैलाश कँवर का अतीव आभार मानता हूँ, जिन्होंने मुझसे निरन्तर विचार-विमर्श किया एवं सुझाव दिये।
अन्त में मैं अपने परम पूज्य माता-पिता एवं अपने परिजनों का हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ क्योंकि उन्हीं के सस्नेहिल आशीर्वाद के कारण मेरा यह कार्य पूर्ण हो सका।
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