हर मनुष्य के मन में कविता होती है पर उसे भाषा मिलने में बहुत समय लगता है। मनुष्य जन्म के समय अपनी माँ से परिचित होता है फिर पिता से, फिर परिवार से, फिर गाँव-शहर से, फिर प्रान्त, देश से, फिर दुनिया से। इस प्रकार उसकी भाषा में बदलाव आ जाता है। कभी कभी उम्र बढ़ने के साथ आदमी को नये सिरे से अपने पुरातन का ध्यान आता है तब आदमी याद करता है अपनी माँ को माँ तुम कब आओगी मीठी लोरी सुनाओगी कब चाँद सितारों संग पलना मुझे झुलाओगी यह माँ की याद होती है जब माँ सामने नहीं होती। यह जीवन का अटल सत्य है कि माँ के चले जाने पर ही माँ की सबसे अधिक याद आती है। मेरे मित्र श्री सुधीन्द्र गेमावत इसके अपवाद नहीं है। इस उम्र में जब मनुष्य अपनी वृद्धावस्था में होता है तो वह यादों से घिरा रहता है। उसे अपने शहर की, गाँव की याद आती है और वह उसके अथाह प्यार को याद करता है क्योंकि वहाँ फिर जाकर बसने का समय नहीं रहता इसलिए मनुष्य यादों में उसके शहर को याद करता है। कवि सुधीन्द्र ने अपने नगर सिरोही को बहुत प्यार से याद किया है। अरावली की उपत्यका में आबू पर्वत की तलहटी में सिरोही जैसा सुन्दर शहर बसा हुआ है। श्री सुधीन्द्र गेमावत उसी शहर में जन्मे और पढ़े। उसको उन्होंने अमाप ममता से इस प्रकार याद किया है। सुन्दर ती सुन्दर है, म्हारी सिरोही व्हाली सिरोही, प्यारी सिरोही हरियाली सिरोही, रलियाली सिरोही ताल-तडागी ती भरपूर सिरोही वे उस है कि इ बचेगा। वे उसके प्रयास करते हैं आती है जो से अपने आराध शहते है श्री सुधीन्द्र ने अपने जीवन में इन दिनों कैंसर के बीमारों की सेवा की महती जिम्मेदारी ली है। वे जयपुर कैसर रिलीफ सोसायटी के अध्यक्ष है। वे दिल से यह चाहते है कि कैसर के मरीज न हो। लेकिन जो लोग तरह-तरह के दुव्र्यसन करते हैं उनको कैंसर हो जाता है और उनको व उनके घर वालो को निरन्तर यह समझाते रहते हैं कि यदि वे उस चीज को छोड देते या ग्रहाण नहीं करते तो उनको कैंसर होता ही नहीं और इतना दुःख भी नहीं उठाना पड़ता। कैसर से पीड़ित व्यक्ति की मृत्यु बड़ी दारुण होती है। सुधीन्द्र गेमावत के हृदय में एक बड़ी करुणामय स्थिति है। यह उनकी चिर आर्द आँखों से झलकता है और वे कैंसर मरीज को झूठा दिलासा देते हैं। उनकी आँखों के सामने बहुत सारे कैंसर रोगी दुनिया छोड़ जाते हैं: रोगी जानता है, जाना है झूठी आशा दिलाते है हम लोग कहते हैं ठीक हो जाओगे परमात्मा पर भरोसा रखो डाक्टर तो इलाज करता है, ठीक तो वही करेगा तुम्हारा सिरजन हार कुछ क्षणों के लिए मुरझाये चेहरों पर कुछ मुस्कुराहट आती है, एक लहर सी पर शीघ्र विलीन हो जाती है, निराशा के अतल सागर में
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