भूमिका
आदिकाल से मानव तकनीक का प्रयोग करता आ रहा है। वह हमेशा अपने जीवन को सुखमय बनाने का प्रयास करता रहता है। वर्तमान समय में मनुष्य जीवन के सभी क्षेत्रों में तकनीक का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान बना हुआ है। तकनीक में व्यवहारिक उपयोगिता का होना नितांत आवश्यक है। सुनना, बोलना, लिखना और कार्य करना एक कला है और इस कला को तकनीक से जोड़ा जाए तो अधिक उन्नतशील होगा। आजकल दिन-ब-दिन नए-नए उपकरणों का अविष्कार हो रहा है। मनुष्य अपने जीवन में इन उपकरणों का उपयोग कुशलता के साथ कर रहा है। इनमें से अधिकांश उपकरण पश्चिमी देशों में निर्मित किए जा रहे हैं। इन उपकरणों का प्रयोग करते समय शब्दों, वाक्यों अर्थात भाषा का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान होता है। यदि भारतीय जनसमुदाय इन उपकरणों का उपयोग करना चाहता है तो भाषा की समस्या उत्पन्न होगी लेकिन हिंदी ने इस चुनौती को स्वीकार कर लिया है। यह बात हम सभी जानते हैं कि मानवीय अभिव्यक्ति का सशक्त साधन भाषा होती है। जब यह भाषा अत्याधुनिक तकनीकी संचार साधनों से जुड़ जाती है तब कुछ नए आयाम हमारे सामने आते हैं। जिसे हम सीधे शब्दों में भाषा का व्यावहारिक रूप कह सकते हैं। इन नए आयामों और तकनीक वाली इस हिंदी से हिंदी की उपयोगिता और अधिक बढ़ जाती है। जिससे हिंदी में रोजगार के अवसर और भी अधिक बढ़ जाते हैं। हिंदी बहुजन द्वारा बोली जाने वाली बहुप्रचलित भाषा है, जिसमें रचनात्मक शक्ति है, व्यवहारधर्मिता है, गतिशीलता है। हिंदी का अधिकतम प्रयोग आज के जनसंचार माध्यमों में और विशेषकर तकनीकी क्षेत्रों में हो रहा है। यदि संचार माध्यमों द्वारा किसी सूचना, संदेश, विचार, विशेष कला का ज्ञान या व्यावहारिक निपुणता को अधिक से अधिक जनसमुदायों तक पहुँचाना है तो हमारे देश की दृष्टि से हिंदी ही सर्वाधिक उपादेय है। वर्तमान समय में जनसंचार और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हिंदी भाषा के प्रयोग ने भारतीयों के काम-काज को आसान बना रखा है। विज्ञापन से लेकर ई-मेल तक, सोशल मीडिया से लेकर शॉपिंग एप्प तक हिंदी कहीं भी पिछड़ी हुई नजर नहीं आती है। यह दिन दूनीरात चौगुनी प्रगति ही कर रही है। आज हम देख रहे हैं कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में तकनीक का प्रवेश हुआ है जिसमें हिंदी के समक्ष और भी नई चुनौतियाँ आई हैं। हिंदी के इस नए रूप ने हम सबको चौंका दिया है। आज हमारी रोती-बिलखती हिंदी खुद का विकास खुद करने में समर्थ हुई है इन्हीं तकनीकी और जनसंचार माध्यमों के आगमन से। हिंदी साहित्य के अध्ययन-अध्यापन के साथ जनसंचार एवं तकनीकी माध्यमों के विभिन्न रूपों का अध्ययन करना यानी कि समय की गति और परिवर्तन को पहचानना है। स्नातक तथा स्नातकोत्तर स्तर पर हिंदी भाषा और साहित्य का अध्ययन - अध्यापन करते समय महसूस हुआ कि तकनीकी के बढ़ते प्रयोग और इसकी आवश्यकता के कारण अध्यापकों और विद्यार्थियों को भी तकनीक में निपुण बनाना आवश्यक हो गया है, क्योंकि औद्योगिक क्रांति के बाद आज संपूर्ण विश्व को सर्वाधिक प्रभावित अगर किसी ने किया है तो वह है जनसंचार और तकनीकी माध्यमों ने। वर्तमान में अधिकांश देश जीवन के विभिन्न पहलुओं पर विज्ञान-आधारित प्रौद्योगिकी का प्रयोग कर रहे हैं। इसी आवश्यकता को मद्देनजर रखते हुए मैंने इस पुस्तक का संपादन किया है। मेरी चुनौतियों को स्वीकार कर आलेख लेखकों ने जनसंचार और तकनीकी हिंदी के विविध पहलुओं पर लेखन कर सहयोग दिया है। मैं इन सभी का आभारी हूँ। मुझे ग्रामोन्नति मंडल के अध्यक्ष, मा० प्रकाश जी पाटे, कार्याध्यक्ष, मा० कृषिरत्न, अनिल जी मेहेर, कार्यवाह मा० रविंद्र जी पारगावकर, ग्रामोन्नति मंडल के सभी संचालक सदस्य मान्यवर तथा प्राचार्य, श्रीकांत जी शेवाळे की प्रेरणा और प्रोत्साहन प्राप्त हुआ। मैं आप सभी के प्रति अत्यंत आभारी हूँ। महाविद्यालय के प्राध्यापक वृंद और कार्यालयीन कर्मियों का भी सतत सहयोग मिलता रहा, मैं इन सभी का आभारी हूँ। सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग के प्रो० विजयकुमार रोडे, प्रो० सदानंद भोसले और हिंदी अध्ययन मंडल के सभी सदस्य गणों का मैं अत्यंत आभारी हूँ। अन्त में चिंतन प्रकाशन, कानपुर के श्री रामसिंह खंगार जी और उनके दोनों सुपुत्रों को मैं धन्यवाद देना अपना परम कर्तव्य मानता हूँ, जिन्होंने मेरी इस पुस्तक के प्रकाशन में पूर्ण सहयोग दिया है।
लेखक परिचय
प्रोफेसर अनिल काळे जन्म - 7 दिसम्बर 1969, उफळवटे, माढा, सोलापुर (महा०)। शिक्षा- एम०ए०, एम० फिल्०, पी-एच० डी०, सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय, पुणे (महाराष्ट्र)। अन्य-1. अनुवाद पदविका, सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय, पुणे, 2. राज्य स्तरीय पात्रता परीक्षा (स्टेट एलिजिबिलिटी टेस्ट) उत्तीर्ण, सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय, पुणे। प्रकाशन-1. रामदरश मिश्र के उपन्यासों में ग्रामीण परिवेश, 2. शोधालेख : राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित शोध आलेख, 3. पुस्तकों में प्रकाशित आलेख, 4. संपादकीय राष्ट्रीय शोध पत्रिका, 5. पुस्तकों का सह- संपादन। शोध परियोजनाएँ -1. सा. फु. पुणे विश्वविद्यालय, पुणे, 2. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, दिल्ली। विशेष आयोजन- 1. महाराष्ट्र हिंदी परिषद का १७ वाँ अधिनेशन, 2. राष्ट्रीय संगोष्ठी सदस्य-1. हिंदी अध्ययन मंडल, सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय, पुणे, 2. आजीवन सदस्य, महाराष्ट्र हिंदी परिषद, महाराष्ट्र, 3. उपाध्यक्ष, महाराष्ट्र हिंदी परिषद, महाराष्ट्र, 4. प्रदेश उपाध्यक्ष, महाराष्ट्र राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना, उज्जैन, 5. आजीवन सदस्य, नागरी लिपि परिषद, नई दिल्ली, 6. आजीवन सदस्य, संचारिका, महाराष्ट्र हिंदी प्रसार सभा, औरंगाबाद, 7. आजीवन सदस्य, विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, इलाहाबाद, 8. द्विवार्षिक सदस्य, राष्ट्रवाणी, महाराष्ट्र हिंदी प्रचार सभा, पुणे। सम्प्रति - प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिंदी विभाग, ग्रामोन्नति मंडल संचालित कला वाणिज्य व विज्ञान महाविद्यालय, नारायणगाँव, जि. पुणे (महाराष्ट्र).
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