'जीवन 'वन की रसधारा' में लेखक ने जीवन के प्रति अपना दृष्टिकोण और सामाजिक चलन पर अपने विचार व्यक्त किये हैं। विचारशील विषयों के इस संकलन का उद्देश्य भारत के युवाओं को अपने अंदर झांकने और परिवर्तन करने के लिये प्रेरित करना है, ताकि वे भारत के योग्य नागरिक बने और हमारे ऋषि-मुनियों की समृद्ध विरासत के सच्चे उत्तराधिकारी होने का कर्तव्य निभायें।
इस संग्रह में छोटे-छोटे पर प्रभावशाली निबंधों को उनके विषयों के आधार पर खण्डों में विभाजित किया गया है। यह पुस्तक चरण-दर-चरण पढ़ने वाली पारंपरिक रीति का पालन नहीं करती, जैसे इस शैली में कई पुस्तकें आती हैं। इसे, इस तरह लिखा गया है कि इसे कहीं से भी, कोई भी पृष्ठ खोलकर पढ़ा जा सकता है। इसमें लिखे गये निबंध न केवल पाठक के अंदर जागरूकता लायेंगे बल्कि यह पाठक को उस विषय पर गहन चिंतन करने के लिये प्रोत्साहित भी करेंगे।
जब हम हमारे अवचेतन मन से समाज द्वारा भरी गयी नकारात्मक सोच को अस्वीकार कर देते हैं तो हम जीवन की पूर्णता को समझने की ओर प्रेरित होते हैं। पूर्णता को समझने की यात्रा में जब हमारे विचार पूर्णतः स्वंतंत्र हो जाते है तो हमारे समक्ष कई चमत्कार होते हैं। स्वय से आत्मसात करने से जीवन में पूर्णता प्राप्त होती है।
जब हम केवल अपने स्वयं की चेतना और स्वयं के हृदय से उत्पन्न होने वाले सूक्ष्म विचारों को समझना सीख जाते हैं, तब हम सच्ची सफलता के मार्ग पर चलने लगते हैं, उन सत्यों के प्रति जागरूक हो जाते हैं जिनसे अब तक हम अनभिज्ञ थे।
इस पुस्तक के माध्यम से, पाठकों को प्रोत्साहित किया जाता है कि वे स्वयं को स्वीकार करें, स्वयं से स्नेह करें और आत्म-सुधार के रास्ते पर बने रहें, साथ ही साथ अपने परिवेश के प्रति सहानुभूति रखें।
हिंदू धर्म, हमें स्वयं को ईश्वर के अंश के रूप में देखने के लिये प्रोत्साहित करता है (अहम् ब्रह्मास्मि) और ब्राह्मण वह है जो सत् चित आनंद में वास करता है। निबंधों का यह संग्रह, 'जीवन की रसधारा' अपने बारे में और अपने आस-पास के संसार के बारे में जागरूकता बढ़ाने और मन की शांति पाने का एक भावपूर्ण प्रयास है।
इस पुस्तक को अवश्य पढ़ें और अपने जानने वाले प्रत्येक युवा से भी इसे पढ़ने का आग्रह करें।
जीवन वन के इस पड़ाव पर आकर मेरा एकमात्र उद्देश्य हमारी माँ स्वरुप प्रकृति, हमारी विविध संस्कृतियों, मानव उत्कृष्टता और ब्रह्मांड को समझने वाली दिव्य शक्ति रचनात्मक चेतना के बारे में ज्ञान अर्जित करना है। मैं अपने नवीन दृष्टिकोण से चीजों को देखता हूँ, समझता हूँ, जो कि मेरा अवलोकन होता है, मेरा परिपेक्ष्य होता है और इसे मैं अपने शब्दों में व्यक्त करता हूँ।
में सीख रहा हूँ - हर पल... और अपने अनुभवों को आपके साथ साझा करने से मुझे इन सीखों को परखने में मदद मिलती है। और अगर मेरी सीख, केवल मेरी ही बनकर रह गयी तो वह भला किस काम की? अगर मैंने कुछ सीखा और उससे सुख प्राप्त किया तो उस सीख को साझा न करना अहंकार और स्वार्थ होगा।
जन्म से हमारे अंदर परम-शक्ति और ज्ञान का वास है पर सांसारिक ताने-बाने में उलझकर, हमने परमात्मा द्वारा दिये गये इन अद्भुत उपहारों को भुला दिया। मैं आशा करता हूँ कि यह पुस्तक आपको, उन शक्तियों का पुनः स्मरण करवायेगी और आपकी आंतरिक खोज में सहायक बनेगी।
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