प्राक्कथन
सुदीर्घ काल से महाकवि कालिदास-विषयक गवेषणाएं होती रही हैं। कालिदास को आधार मान कर आधिसंख्य विद्वानों, समीक्षकों तथा अनुसंधित्सुओं ने विभिन्न कोणों से स्थापनाएं की हैं। वस्तुतः महाकवि का व्यक्तित्व एवं कृतित्व ही ऐसा अप्रतिम है की कोई कितनी भी व्याख्या कर जाता है किन्तु सन्तोष नहीं होता। कतिपय आलोचकों ने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में कालिदास-विषयक तथ्यालोचन किया है, तो कुछ ने तत्कालिक सामाजिक परिवेश में महाकवि की प्रतिभा को टटोलने का प्रयास किया है। कुछ लोगों ने उनमें छिपे हुए दर्शन के बीजों को उभारने का प्रयास किया है। इस प्रकार जिसने जो खोजने का प्रयास किया है, उसे वह मिलता रहा है। कालिदास के चुम्बकीय व्यक्तित्व का आकर्षण ही इतना सशक्त है की आबाल वृद्ध-वनिता सभी मुग्ध तथा आनन्द विभोर हो जाते हैं। शैशव में ही रघुवंश के दिवतीय सर्ग का पारायण किया था। उसका सस्वर पाठ मुझे कल्पना-लोक में ले जाता था। न मालूम कैसी सुंदर रही होगी वह गाय? कैसा भीषण होगा वह सिंह? तब से क्रमशः महाकवि कालिदास की अमर-कृतियों से सम्पर्क बढ़ता ही गया। स्नातकोत्तर परीक्षा में सम्मिलित होने के लिये संस्कृत के महाकव्यों तथा नाटकों का अनुशीलन इष्ट था। इसी सन्दर्भ में आचार्य अयोध्या प्रसाद सिंह जी के वैदुष्यपूर्ण व्याख्यानों को हृदयंगम करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। विशेषतः कालिदास तथा भवभूति के तुलनात्मक विवेचन से जिज्ञासा बढ़ती ही गई और इसका समग्र श्रेय विद्वद्वरेण्य गुरवर को है। आज जबकि जीवन का पूर्वार्ध पार कर चुका हूँ "कालिदास की कथा कल्पना" रह-रह कर कचोटती रहती है और उसी दुर्निवार एषणा का यह परिणाम है कि महाकवि के निमित्त भावनाओं के फूल चढ़ाने बैठा हूँ। इधर कई वर्षों से हमारी आचार्यप्रवर रॉची विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के अध्यक्षपद को सुशोभित कर अनुसंचित्सुओं का मार्ग दर्शन कर रहे हैं। मुझे इस स्वर्णिम संयोग का अतिध्य हर्ष है कि विद्वद्विभूति प्रोफेसर साहब ने इस शोध कार्य के हेतु मेरा उत्साह बढ़ाया है। इसके लिए मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मनाता हूँ। महाकवि कालिदास की कथा कल्पना के सम्बन्ध में मेरे द्वारा जो कुछ रचायित हो सका है वह तो केवल गुरुवर के प्रसाद का चमत्कार है और एतदर्थ कृतज्ञता-ज्ञापन के लिए मैं अपने को सर्वथा असमर्थ पाता हूँ।
लेखक परिचय
डॉ शम्भुनाथ झा का जन्म। नवंबर सन् 1944 ई को बिहार के सहरसा जिले में स्थित बनगांव ग्राम में हुआ था। डॉ शम्भुनाथ ज्ञा की शिक्षा बिहार के भागलपुर जिले में हुई जहां से इन्होंने मेट्रिक तथा इंटर की पढ़ाई पूरी की। इसी क्रम में इन्होंने संस्कृत में साहित्याचार्य की उपाधि प्राप्त की जिसकी परीक्षा में इन्होंने पूरे बिहार में स्वर्ण पदक के साथ शीर्ष स्थान प्राप्त किया। 1962 ई. में डॉ. झा ने भागलपुर विश्वविद्यालय के टी.एन. बी. कॉलेज से संस्कृत में बी. ए. की डिग्री शीर्ष स्थान प्राप्त कर स्वर्ण पदक के साथ हासिल किया। 1964 ई. में डॉ. झा ने एम. ए पटना विश्वविद्यालय से पूरी की। इसी दौरान इनका चयन सैनिक स्कूल तिलैया में संस्कृत शिक्षक के पद पर हुआ। एक स्वच्छ और अनुशासित जीवन शैली का आकर्षण इन्हें सैनिक स्कूल तिलैया की तरफ खींच लाई। इस स्कूल में डॉ झा ने संस्कृत शिक्षक के रूप में वर्ष 1965 से 1988 तक अपना योगदान दिया। डॉ शम्भुनाथ झा को पठान-पाठन में काफी रुचि थी। संस्कृत के अलावा उन्हें हिदी एवं अंग्रेजी भाषा, व्याकरण, लेखनी एवं साहित्य का समुचित ज्ञान था। इनके ज्ञान, अनुभव एवं उचित मार्गदर्शन से हजारों विद्यार्थी लाभान्वित हुए। सैनिक स्कूल में कार्य करते हुए ही डॉ. शम्भुनाथ झा ने रांची विश्वविद्यालय से पी. एच. डी. की उपाधि प्राप्त की। डॉ शम्भुनाथ झा न केवल एक विद्वान शिक्षक थे बल्कि एक कुशल प्रशासक भी थे। वर्ष 1988 से 2004 तक उन्होंने जवाहर नवोदय विद्यालय में प्रचार्य के रूप में अपनी सेवाएं दी। इनके शान्त, सरल एवं मृदुल व्यवहार से लोग स्वतः प्रभावित हो जाते थे। इनके मुख से संस्कृत के शलोक सुनकर इनके विद्यार्थी, सहयोगी एवं मित्रगण मंत्रमुग्ध हो जाते थे। किसी भी गूढ़ विषय को सरलता से समझाने की काबिलियत इन्हें अपने शुभचिंतकों में काफी लोकप्रिय बनाया। अपने विद्यार्थियों का उत्साह बढ़ाने और उनका उचित मार्गदर्शन करते रहने का इनका प्रयास आज भी इनके छात्रों में इनके प्रति आदर और सम्मान की भावना जागृत करती है। एक कर्तव्यनिष्ठ, परिश्रमी, ईमानदार एवं परिपक्व अध्यापक के रूप में वह अपने विद्यार्थियों एवं परिजनों में काफी लोकप्रिय और प्रेरणा के स्रोत रहे। डॉ शम्भुनाथ झा का निधन सन् 14 जून 1923 ई में अपने निवास स्थान पर हुआ। यह कृति उन्हें श्रद्धांजलि स्वरूप समर्पित है।
पुस्तक परिचय
कालिदास के चुम्बकीय व्यक्तित्व का आकर्षण ही इतना सशक्त है की आबाल वृद्ध-वनिता सभी मुग्ध तथा आनन्द विभोर हो जाते हैं। शैशव में ही रघुवंश के दिवतीय सर्ग का पारायण किया था। उसका सस्वर पाठ मुझे कल्पना-लोक में ले जाता था। न मालूम कैसी सुंदर रही होगी वह गाय? कैसा भीषण होगा वह सिंह? तब से क्रमशः महाकवि कालिदास की अमर-कृतियों से सम्पर्क बढ़ता ही गया। स्नातकोत्तर परीक्षा में सम्मिलित होने के लिये संस्कृत के महाकव्यों तथा नाटकों का अनुशीलन इष्ट था। इसी सन्दर्भ में आचार्य अयोध्या प्रसाद सिंह जी के वैदुष्यपूर्ण व्याख्यानों को हृदयंगम करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। विशेषतः कालिदास तथा भवभूति के तुलनात्मक विवेचन से जिज्ञासा बढ़ती ही गई और इसका समग्र श्रेय विद्वद्वरेण्य गुरवर को है। आज जबकि जीवन का पूर्वार्ध पार कर चुका हूँ "कालिदास की कथा कल्पना' रह-रह कर कचोटती रहती है और उसी दुर्निवार एषणा का यह परिणाम है कि महाकवि के निमित्त भावनाओं के फूल चढ़ाने बैठा हूँ।
Hindu (हिंदू धर्म) (13726)
Tantra (तन्त्र) (1005)
Vedas (वेद) (728)
Ayurveda (आयुर्वेद) (2081)
Chaukhamba | चौखंबा (3181)
Jyotish (ज्योतिष) (1561)
Yoga (योग) (1168)
Ramayana (रामायण) (1334)
Gita Press (गीता प्रेस) (723)
Sahitya (साहित्य) (24770)
History (इतिहास) (9046)
Philosophy (दर्शन) (3637)
Santvani (सन्त वाणी) (2627)
Vedanta (वेदांत) (116)
Send as free online greeting card
Email a Friend
Visual Search
Manage Wishlist