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करामाती दादी (कहानी संग्रह): Karamati Dadi (Kahani Sangrah)

$24
Includes any tariffs and taxes
Specifications
Publisher: Suruchi Prakashan, Delhi
Author Ratnachand Sardana
Language: Hindi
Pages: 132
Cover: PAPERBACK
8.5x5.5 Inch
Weight 140 gm
Edition: 2025
ISBN: 9789391154486
HCH114
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Book Description

भूमिका

     

 

साहित्य तब तक साहित्य कहलाने का अधिकारी नहीं होता जब तक उसमे अपने देश-काल और लोक हित की व्याप्ति न हो। आलोचकों और आचार्यों ने अपने-अपने अनेकानेक रूपों में इस परिभाषा को अपने-अपने शब्दों में गढ़ा-चुना है कि साहित्यकारों की यह सर्वाधिक प्रचलित परिभाषा एक उक्ति बन गई है। लेकिन जब हम श्री रत्नचंद सरदाना की कोई कृति या रचना पढ़ते हैं, भले ही वह किसी भी विधा में लिखी गई हो, उनके लिए तो यह कथन मात्र उक्ति न रह कर उनका ध्येय-वाक्य, बीजमंत्र बन जाता है। ऐसा लगता है कि उनके सूजन का शब्द-शब्द अपने लोक और राष्ट्र के जागरण के लिए है, उसके कल्याण के लिए है। इस समय प्रकाशन के लिए तत्पर उनकी कृति 'करामाती दादी' भी इसी की सार्थकता सिद्ध कर रही है। इस बार 'करामाती दादी' में श्री सरदाना जी ने कहानी विधा को अपनी बात काहने के लिए चुना है। इनकी कहानियों के विषय नितांत अछूते हैं। भारतीय संस्कृति पर हो रहे मार्क्सवादी कुठाराघातों, प्रसारवादी चर्च के कुत्सित लक्ष्यों, मजहबी कट्टरवाद की विकृत मानसिकता और कौटुम्बिक व्यवस्था तोड़ने को आतुर वैश्विक बाजारवाद उनकी हर कहानी में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रतिध्वनित होता है। भारतीय विशेषकर हिंदुओं में विवाह एक दैवीय जन्म-जन्मांतर का बंधन है जबकि अन्य पंथों में एक अनुबंध मात्र है। कृति की दूसरी ही कहानी में ही लेखक अपने पात्र इंजीनियर से संवाद शैली में पाठक के समक्ष सारे सूक्ष्म भेद खोल देता है। इंजीनियर के पादरी नाना ने अपनी बेटी का विवाह कबीले के मुखिया के पुत्र से सिर्फ इसलिए कर दिया कि वे उसे अपना धर्म स्वीकार करवा सकें। उसकी माँ मुखिया-पुत्र के क्रिश्चियन न बनने के कारण अपने पुत्र को अनाथालय में छोड़ देती है और किसी अन्य से विवाह कर विदेश चली जाती है। 'परम स्नेही' के कथानक का ताना-बाना भी इसी विषय के इर्द-गिर्द घूमता है। संबंधों का यह खोखलापन पाठक के मन को अंदर तक झकझोर देता है। अन्यत्र वे लिखते हैं, "यदि परिवार रूपी यह संस्था न हो तो समाज के सभी अनुशासन और मान्यताएँ छिन्न-भिन्न हो जाएँ... सभ्यता और संस्कृति के सभी मानदंड समाप्त हो जाएँगे।" बाजारवादी वैश्विक प्रदूषण ने हमारी परिवार व्यवस्था को ही नहीं तोड़ा अब तो वे नीति, मर्यादा ही नहीं प्रकृति-सम्मत आचरणों की भी धज्जियाँ उड़ाने लगे हैं। बहुत तेजी से बढ़ते एल.जी.बी.टी. क्यू और सेरोगेसी के उदाहरण सात समंदर पार से इस जम्बूद्वीप में भी सुनाई देने लगे हैं। लेखक कृति की कहानी 'माँ तो माँ होती है' में इस समस्या को उठाते हुए तथा इसके बारे में कोई स्पष्ट व्यवस्था बनाए जाने के पक्ष में न्यायालय में बहस करती अधिवक्ता से कहलाता है, "किराए की कोख मानवीय गरिमा के विरुद्ध है तथा अनैतिक है..." प्राचीन भारतीय न्याय व्यवस्था मानव कर्तव्य-बोध को आधार मान कर चलती थी जबकि विदेशियों द्वारा हमें दी गई न्याय व्यवस्था व्यक्ति के अधिकार-बोध पर आधारित है। वे बड़ी कुशलता से अपनी कई कहानियों में वर्तमान न्याय और दंड व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। जेल के बारे में वे 'न्याय अथवा दण्ड' में ये कहने से भी नहीं चूकते, "सरकार जिसे सुधारगृह कहती है, उसे अपराध प्रशिक्षण केंद्र कहना अधिक उपयुक्त होगा।" 'मुठभेड़' भी इसी का दूसरा पक्ष उजागर करती है। कुछ मात्रा में अवैध घुसपैठियों की समस्या लगभग हर देश में रहती है। लेकिन भारत जैसे देश में तो यह बांग्लादेशी अवैध घुसपैठियों के रूप में देश के वास्तविक नागरिकों का जीवन दूभर किए जा रही है। "स्वार्थ पूरा तो..." कहानी में भ्रष्टाचार और महानगरीकरण की समस्याओं के साथ-साथ इस समस्या को भी प्रमुखता से उठाया गया है। 'हमाम में' कहानी का तो पूरा कथानक स्पष्ट कर देता है कि भ्रष्टाचार और बेईमानी किसी कार्यालय या पद विशेष की समस्या नहीं है यह तो रोम-रोम में बुरी तरह रच-बस गया है। 'माता न कुमाता भवति' शीर्षक कहानी देशभक्ति के विभिन्न धरातलों से विचरण करती हुई नक्सलवाद की परतों को उघाड़ती हुई एक सुखांत अंत से समाप्त होती है। कहानीकार का चिंतन पूर्णतः राष्ट्रवादी होते हुए भी नितांत तटस्थ है।

 

लेखक परिचय

 

रत्न चन्द सरदाना एम.ए., बी.टी. सरदाना जी का जन्म 10 अप्रैल 1941 ई. को तत्कालीन पश्चिमी पंजाब के जिला मुज्जफरगढ़ के एक छोटे से गाँव खाड़के में हुआ था। इनके पिता स्व. श्री राम चन्द सरदाना हकीम तथा माता श्रीमती रामप्यारी सद्‌गृहिणी थे। उन दोनों का स्वभाव सरल था। वे सेवा भावी थे। परिवार आर्थिक रूप से संपन्न था। सरदाना जी ने अपने बाल्यकाल में देश की स्वतंत्रता के उल्लास, सांप्रदायिक उन्मान के भीषण रूप तथा गरीबी को भोगा है। इन घटनाओं ने बाल मन को आहत किया। किंतु पारिवारिक सुसंस्कारों के कारण उनके व्यवहार में कटुता नहीं आई। ऐसी त्रासदी की पुनरावृत्ति न हो, अगली पीढ़ी को जानकारी देना वह अपना पुनीत कार्य मानते हैं। श्री सरदाना जी हिन्दी, अंग्रेजी, पंजाबी तथा सिरायकी के जानकार हैं। आल इंडिया रेडियो व रोहतक केन्द्रों से उनकी वाताएं व कवितापाठ प्रसारित होती रही हैं। उनकी कविताएँ राष्ट्रभाव से ओत-प्रोत रहती हैं। राष्ट्रीय महापुरुषों की जीवनियाँ उन्हें आकर्षित करती हैं। उनके उपन्यासों का फलक व्यापक, वार्तालाप की शैली में लेखन, भाषा सरल, एकात्मवादी दृष्टिकोण, मुहावरों का प्रयोग विषयों की विविधता उनके लेखन का वैशिष्ट है। लघुकथाओं में व्यंग्य का भरपूर पुट है।

 

उपलब्धियां : राज्य शिक्षक पुरस्कार प्राप्त हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित संस्कृति शिक्षा संस्थान द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित विद्या भारती उत्तर क्षेत्र द्वारा लेखक सम्मान साहित्य सभा कैथल द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित भाषा विभाग हरियाणा द्वारा पुरस्कृत कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय द्वारा सम्मानित अखिल भारतीय प्रेरणा साहित्य एवं शोध संस्थान की ओर से प्रेरणा आजीवन साहित्य साधना सम्मान 2025 पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट, अहमदाबाद द्वारा सम्मानित

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