पुस्तक परिचय
मुट्ठी भर रोशनी (1998), धुंध और धुआँ (1999), सफ़र के बीच (2000), बर्फ़ की झील (2001), खिड़की से झाँकता है चाँद (2003), नौकरीनामा (2006), भीतर कहीं कुछ है जो... (2011), अंधे मोड़ से आगे (2014), बौराए प्रतिबिम्ब (2020), जाग दर्दे-इश्क़ जाग- (2023) जैसे उपन्यासों; परिणति (1999), किससे करें फ़रियाद (1999), काश! (2004) जैसे कहानी-संग्रहों; परिमल (1992 कविता-संग्रह); सुधि के दीप (1992 संस्मरण); वो कौन शख्स था जो भर गया मुझमें (2017 चरित लेखन) की लेखिका दीप्ति कुलश्रेष्ठ हिंदी कथा-जगत का जाना-माना नाम है सिर्फ इसलिए नहीं कि वे कहानियाँ लिखती हैं, वे उपन्यास लिखती हैं बल्कि इसलिए क्योंकि वे मनुष्य के मन और उसकी स्थितियों-परिस्थितियों-मानसिकताओं को लिखती हैं- लिखती ही नहीं बल्कि अपने चिंतन, अपनी सोच, अपनी दृष्टि, अपने रचनात्मक हस्तक्षेप से उसे एक मुकम्मल रूप भी देती हैं। वे इसलिए भी महत्त्वपूर्ण बन जाती हैं क्योंकि वे किसी बैनर को लेकर नहीं चलती हैं। स्त्री-विमर्श के दौर में जहाँ हर-एक अपना नाम स्त्री-विमर्श की लेखिका के रूप में दर्ज करा लेना चाहता रहा है वहाँ दीप्ति जी सिर्फ़ लेखकीय उत्तरदायित्वों और लेखक के सामाजिक सरोकारों के रास्ते पर चलती दिखाई देती हैं। दीप्ति जी के लेखन की एक उल्लेखनीय विशेषता है कि वे अपनी रचनाओं के माध्यम से हस्तक्षेप करती दिखाई देती हैं। तमाम नकारात्मक स्थितियों-परिस्थितियों-मानसिकताओं के बीच वे सकारात्मकता की वो महीन रेखा ढूँढ़ ही लेती हैं जिससे जीवन और समाज दोनों को दिशा दी जा सकती है; मूल्यों-मर्यादाओं से जोड़ा जा सकता है; अपने लड़खड़ाते पैरों को बल दिया जा सकता है
लेखक परिचय
डॉ. कौशलनाथ उपाध्याय प्रकाशन जन्म: 20-10-1959 ई. मीरजापुर (उ.प्र.) जिले के अंतर्गत एक गाँव-छटही में। शिक्षा : काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से बी.ए. (ऑनर्स-हिन्दी), एम.ए., पीएच.डी. (हिन्दी) कार्य : जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर में- प्रोफेसर 2003-2006 तक विभागाध्यक्ष, हिन्दी विभाग 2015-2019 तक अध्यक्ष, पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग 40 से अधिक शोध छात्रों का पीएच.डी. / एम.फिल. उपाधि हेतु शोध-निर्देशन आकाशवाणी जोधपुर के विविध कार्यक्रमों, अनेक साहित्यिक संगोष्ठियों एवं कवि सम्मेलनों में सहभागिता एवं उनका आयोजन। डॉ. कौशलनाथ उपाध्याय प्रकाशन : छायावादोत्तर हिन्दी काव्य: बदलते मानदंड एवं स्वरूप (शोध-प्रबंध), 1990 प्रेमचंदे की भाषा (आलोचना), 1995 क्योंकि रचना बोलती है (आलोचना), 1997. कविता की राह (आलोचना), 2002 आईने में समय के हम फिर खड़े (काव्य-संग्रह), 2002 कविता का पक्ष (आलोचना), 2008 कहानी का वर्तमान (आलोचना), 2009 बोधिवृक्ष से (काव्य-संग्रह), 2010 विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में साहित्य के विविध विषयों पर 150 से अधिक लेख एवं पुस्तक-समीक्षाएँ प्रकाशित । सदस्यता : सदस्य : हिन्दी सलाहकार समिति, केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय, नई दिल्ली (2015 से 2018 तक) • हिन्दी परामर्श मंडल एवं जनरल काउंसिल, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली (2018-22) कार्यकारिणी, भारतीय हिन्दी परिषद्, इलाहाबाद (1997-2015) कार्यक्रम सलाहकार समिति, आकाशवाणी, जोधपुर केन्द्र (2017-18) सरस्वती सभा, राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर (2017-18) एकेडमिक काउंसिल एवं सीनेट, जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर Academic Advisory Committee for SWAYAM PRABHA DTH, Channel named-CEC-UGC 03, Social and Behavioural Science, EMRC, Jai Narain Vyas University, Jodhpur. सम्मान : विशिष्ट साहित्यकार सम्मान, राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर सहस्राब्दी हिन्दी सेवी सम्मान
प्राक्कथन
सामाजिक सरोकारों की कथाकार दीप्ति कुलश्रेष्ठ : सृजन की मंज़िलें दीप्ति कुलश्रेष्ठ हिंदी कथा-जगत का जाना-माना नाम है सिर्फ इसलिए नहीं कि वे कहानियाँ लिखती हैं, वे उपन्यास लिखती हैं- बल्कि इसलिए क्योंकि वे मनुष्य के मन और उसकी स्थितियों-परिस्थितियों-मानसिकताओं को लिखती हैं- लिखती ही नहीं बल्कि अपने चिंतन, अपनी सोच, अपनी दृष्टि, अपने रचनात्मक हस्तक्षेप से उसे एक मुकम्मल रूप भी देती हैं। वे इसलिए भी महत्त्वपूर्ण बन जाती हैं क्योंकि वे किसी बैनर को लेकर नहीं चलती हैं। स्त्री-विमर्श के दौर में जहाँ हर-एक अपना नाम स्त्री-विमर्श की लेखिका के रूप में दर्ज करा लेना चाहता, रहा है वहाँ दीप्ति जी सिर्फ़ लेखकीय उत्तरदायित्वों और लेखक के सामाजिक सरोकारों के रास्ते पर चलती दिखाई देती हैं। दीप्ति जी के लेखन की एक उल्लेखनीय विशेषता है कि वे अपनी रचनाओं के माध्यम से हस्तक्षेप करती दिखाई देती हैं। तमाम नकारात्मक स्थितियों-परिस्थितियों-मानसिकताओं के बीच वे सकारात्मकता की वो महीन रेखा ढूँढ़ ही लेती हैं जिससे जीवन और समाज दोनों को दिशा दी जा सकती है; मूल्यों-मर्यादाओं से जोड़ा जा सकता है, अपने लड़खड़ाते पैरों को बल दिया जा सकता है; भटकते-भटकाते समाज के बीच सार्थक जीवनदर्शन के साथ अपने को जोड़ा जा सकता है; मनोवांछित धरती की परिकल्पना को सार्थक किया जा सकता है। इसीलिए हम देखते हैं कि अपने उपन्यासों में वे पात्रों के साथ-साथ स्वयं भी संचरण करती हैं- अपने विचारों के साथ, अपनी भावनाओं के साथ, अपने हस्तक्षेप के साथ, अपनी चाहत के साथ, अपनी सामाजिक सोच और दर्शन के साथ। और जब वे बोलती हैं
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