प्राक्कथन
अनेक विद्वानों ने भिन्न-भिन्न शब्दों में कविता की परिभाषाएँ ही हैं। सामान्यतः कविता की कल्पना की अभिव्यक्ति कहा जा सकता है। किसी ने काव्य को केवल वैसे विचार और शब्द माना है, जिनमें भाव स्वतः बँध जाते हैं किसी ने रसात्मक वाक्य को कविता कहा, तो किसी ने काव्य का जीवन की आलोचना कहा है, तो किसी ने काव्य को सत्य और आनन्द का मिश्रण बताया है। कविता वह कला है जो चुने हुए शब्दों के द्वारा कल्पना और यथार्थ के अनगिनत अर्थ परोसती है। अपने आप को अभिव्यक्त करने की इच्छा और मानवीय संवेदना के प्रति अनुराग की स्वाभाविक भावना ही कवि को कविता रचने के लिए प्रेरित करती है। इसमें कवि की प्रतिभा, संस्कार, अभ्यास और प्रेरणा, सबका सहयोग रहता है। प्रसिद्ध विचारक 'सुकरात' ने कविता की व्याख्या करते हुए इसे देवी प्रेरणा से प्रेरित संदेश का रूप दिया है। उनके विचार से जब ईश्वर हमसे बात चीत करना चाहता है तो वह कवियों की वाणी के माध्यम से अपने शब्दों को व्यक्त कर देता है। काव्य के दो पक्ष बताए गए हैं- भाव पक्ष और कला पक्ष। भावपक्ष को अनुभूति पक्ष और कविता का अन्तरंग पक्ष भी कहा जाता है। कवि अपने मन में उठने वाले भावों को ही कविता में इस प्रकार अभिव्यक्त करता है कि वे भाव सभी पाठकों और श्रोताओं के भावों के साथ घुल-मिल जाते हैं। भावपक्ष कविता की चेतना है, आत्मा है, प्राण है। भावों के बिना कविता की कल्पना ही नहीं की जा सकती। भाव की ही तरह कलापक्ष भी कविता के लिए महत्वपूर्ण है। कलापक्ष को अभिव्यक्ति पक्ष और कविता का बहिंरग पक्ष भी कहा जाता है। कविता के कलापक्ष का आकर्षक, प्रभावशाली और सौंदर्य सम्पन्न होना आवश्यक है। भाषा की कलाकारी के जरिए कविता में भावपक्ष को सार्थक अभिव्यक्ति मिलती है। भाव और कला दोनों के संयोग से श्रेष्ठ कविता बनती है कविता की बनावट में भावपक्ष व कलापक्ष दोनों का मिश्रण होता है, लेकिन कविता के कई प्रमुख तत्त्व भी स्वीकार किए गए हैं- शब्द, अर्थ, कल्पना, भावना, बुद्धि और शैली। कविता का शरीर शब्द से बनता है, इसलिए कवि अपनी रचना को आकार देने के लिए उपयुक्त शब्दों का चयन करता है, लेकिन बिना अर्थ के शब्द के अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती। अर्थ के कारण ही कविता में शब्द वांछित लक्ष्य तक कविता को पहुँचाते हैं। शब्द और अर्थ मिलकर कवि की भावना और कल्पना को साकार करते है। कविता के मनोभावों और उसके मन में उमड़ती कल्पना को उसकी बुद्धि सँवारती है। बुद्धि तत्व से शून्य कविता न तो आकर्षक होती है और न उसमें कोई विशेषता होती है। शैली का संबंध कवि की अविव्यक्ति से है। शैली के विविध उपकरणों के माध्यम से कवि अपनी रचना को नायापन प्रदान करता है। आचार्य राम चन्द्र शुक्ल ने कविता को व्यापक अर्थ में प्रयुक्त करते हुए लिखा है - "जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञान-दशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की यह मुक्तावस्था रस-दशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है उसे कविता कहते हैं।" अनेक पाश्चात्य विद्वानों ने विशुद्ध कविता के लक्षणों को ध्यान में रख कर उसकी परिभाषा की है, मैथ्यू आर्नल्ड ने कविता को मूलतः जीवन की आलोचना बताया है। हिन्दी के पहले कवि के नाम के बारे में इतिहासकारों में विवाद है, लेकिन यह एक सच्चाई है कि सातवीं शताब्दी से संस्कृत और अपभ्रंभ काव्य-परम्परा की अगली कड़ी के रूप में हिन्दी कविता विकसित हुई, सिद्धों और साधुओं, बौद्धों और जैनियों के धार्मिक काव्य से लेकर विभिन्न राजदरवारों में कार्यरत चारणों के वीर गाथा काव्य तक हिन्दी कविता ने इस पहले दौर में विस्तार पाया। इसके बाद सारे भारतीय परिवेश में धार्मिक पुनर्जागरण की लहर आई। निर्गुण और सगुण दोनों धाराओं के सन्त और भक्त मध्यकाल में हिन्दी कविता को उसके स्वर्ण युग में ले गए।
लेखक परिचय
डॉ. मधुबाला सिन्हा का जन्म 18 जनवरी, 1961 में गया (बिहार) में हुआ। आपने 1984 में एम.ए. (हिन्दी) की उपाधि मगध विश्वविद्यालय से प्राप्त की एवं 1990 में पीएच-डी. की उपाधि प्राप्त कर वर्तमान में वरीय प्राध्यापिका (हिन्दी विभाग) के पद पर रांची वीमेन्स कॉलेज में कार्यरत हैं।
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