लेखक परिचय
डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू' राजस्थान के चित्तौड़ जिले के आकोला ग्राम में 2 अक्टूबर, 1964 को जन्म, स्व-शिक्षित अधिस्नातक (प्राचीन भारतीय इतिहास, हिन्दी एवं अंग्रेजी), पी-एच.डी. मेवाड़ प्रदेश का हीड़ साहित्य (राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर), अन्य-पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा एवं शिक्षास्त्रातक (सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर)। लोकसाहित्य एवं इण्डोलॉजी के ख्यात अध्येता और इतिहास, पुराण सहित भारतीय सांस्कृतिक परम्परा पर गम्भीर शोध कार्य। विशेषकर प्राचीन भारतीय कला और तकनीकी विषयों पर कई स्तरीय संगोष्ठियों पर व्याख्यान एवं कई शोधपूर्ण आलेखों का प्रकाशन। इन्हों विषयों पर 300 से अधिक ग्रन्थों का प्रकाशन। अधिकांश ग्रन्थ मूल पाण्डुलिपियों के आधार पर सम्पादित और अनुदित। प्रकाशित ग्रन्थों में महाराणा प्रताप के दरबारी पं. चक्रपाणि मिश्र कृत राज्याभिषेकपद्धति, मुहूर्तमाला एवं विश्ववल्लभ-वृक्षायुर्वेद, श्रीपतिभट्ट विरचित ज्योतिषरत्नमाला, विठ्ठलदीक्षित कृत मुहूर्तकल्पद्रुम, महादेवदैवज्ञ कृत मुहूर्तदीपक, सुरपालकृत वृक्षायुर्वेद, नग्ग्रजिताचार्य कृत चित्रलक्षणम्, अज्ञातकर्तृक कृत बास्तुविद्या, विश्वकर्मीय शिल्पशास्त्रम्, सूत्रधारमण्डनकृत वास्तुसारमण्डनम्, आयतत्त्वम्, राजवल्लभवास्तुशास्त्रम्, देवतामूर्तिप्रकरणम्-रूपमण्डनम्, प्रासादमण्डनम्, वास्तुमण्डनम्, सूत्रधारनाथाकृत बास्तुमञ्जरी, सूत्रधार गोविन्दकृत कलानिधि, वास्तु उद्धारधोरणी, मयमुनिकृत मयमतम्, जिनदत्तसूरीकृत विवेक विलास, ब्रह्मानन्दकृत योगगीता, सूत्रधारमल्लकृत प्रमाणमञ्जरी, चालुक्य सोमेश्वरकृत शिल्पशास्त्रे आयुर्वेदः, भोजराज कृत समरांगण सूत्रधार, राजमार्तण्ड-राजमृगांक, जीवानन्दकृत वास्तुरत्नावली, वायुप्रोक्त एकलिंगपुराण, विश्वकर्मावास्तुशास्त्रम् आदि कृतियाँ चर्चित। देवालय चन्द्रिका में देववास्तु विषयक परम्परा और विधि-विधान का सम्यक विश्लेषण है। इसमें प्रत्येक श्लोक की संस्कृत टीका भी है। सम्मान : राजस्थान संस्कृत अकादमी से पण्डित जगन्नाथ ज्योतिष सम्राट सम्मान। राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली से संस्कृत सेवान्नती सम्मान। राजस्थान के राज्यपाल और राष्ट्रपति महोदय से 2013-14 में राष्ट्रीय शिक्षक सम्मान।
पुस्तक परिचय
धातुओं के विषय में जिस ज्ञानात्मक शास्त्र का विकास हुआ, वह 'धातुशास्त्र' के नाम से जाना गया और उसके महत्वपूर्ण सन्दर्भ हमें चाणक्य के अर्थशास्त्र और चालुक्यनरेश भूलोकमल सोमेश्वर कृत अभिलषितार्थ चिन्तामणि (मानसोलास) में प्रास होते हैं। लोहा जैसा धातु मानवीय संस्कृति में एक अद्वितीय उपहार माना जाता है। लोहे की प्राप्ति होना और उसके उपकरण आदि तैयार करके उनका उपयोग करना मानवीय सभ्यता के अनेक चरर्णी का प्रतिनिधित्व माना जाता है। लोहे का विशेष उपयोग हथियारों में और उसमें भी तलवारी-खड्गों के निर्माण में हुआ। यह भी ज्ञात होता है कि धातुशास्त्र उपयोगी अलंकरणों के निर्माण, मूर्तियों, मुहरों, सांचों, सिक्कों मुद्राओं के पातन, भस्मादि बनाने और ताम्रानुशासन आदि के लिए पत्र-पत्तर तैयार करने की दृष्टि से भी उपयोगी रहा होगा। लोहार्णव ग्रन्थ के विषय में शार्ङ्गधर (1296ई.), वीरमित्रोदय (17वीं शताब्दी) से प्रारम्भिक सूचनाएँ मिलती हैं जबकि इसके दस अध्याय क्रमिक रूप से युक्तिकल्पतरु में प्राप्त होते हैं। इस ग्रन्थ में लोहार्णव के समग्र पाठ को सानुवाद सम्पादित किया गया है। यह निश्चित ही धातुविज्ञानियों, पुरातत्त्व के विद्वानों एवं विद्यार्थियों के लिए उपयोगी सिद्ध होगा और प्राचीन भारतीय धातुविज्ञान के अध्ययन में यथेष्ट सहायक होगा।
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