समकालीन दार्शनिक जगत् अपने परंपरागत विचार-शैली का विश्लेषण कर एक ऐसी चिंतन शैली को विकसित करने का प्रयास कर रहा है जिसके आधार पर दर्शन दार्शनिक जगत् से जुड़ी समस्याओं का अध्ययन निष्पक्ष रूप से कर सके।
कुछ ही शताब्दी पूर्व तक धर्म-दार्शनिकों की चिंतन-शैली-दर्शन की स्वीकृत अवधारणाओं के अनुरूप होती थी। परंतु तार्किक भाववादियों तथा आनुभाविक धर्म-दार्शनिकों की सोच ने पारंपरिक चिंतन शैली को पूरी तरह बदल दिया।
समकालीन चिंतक इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि दार्शनिक जगत् की समस्याएँ मुख्यतः गलत भाषीय प्रयोग की देन है।
विश्लेषणवादी चिंतकों ने यह माना कि पारंपरिक दार्शनिकों के गलत भाषीय प्रयोगों ने दर्शन के क्षेत्र में ऐसी समस्याओं को जन्म दिया जो मूलतः कोई समस्या है ही नहीं। तत्त्वमीमांसीय प्रश्न भौतिक अभौतिक तत्त्वों की व्याख्या, ईश्वर के अस्तित्व को प्रमाणित करने का प्रयास आत्मा-परमात्मा से संबंधित तथा ऐसे ही अन्य कई प्रश्न हैं जो भाषा के अवैज्ञानिक प्रयोगों की देन हैं। समकालीन चिंतकों ने इन प्रश्नों का विश्लेषण किया और इन प्रश्नों को निर्मूल सिद्ध करते हुए पारंपरिक चिंतन की रूढ़िवादिता को खत्म करने के लिए संकल्पित हुए।
अन्य सभी शास्त्रों की तरह ही दर्शनशास्त्र का संबंध भी भाषा से अनिवार्य रूप से जुड़ा है क्योंकि हम अपने विचारों को भाषा के माध्यम से ही व्यक्त करते हैं। दर्शन भाषा का अध्ययन व्याकरण के दृष्टिकोण से नहीं करता अपितु उसका लक्ष्य भाषा में निहित उस तर्क का अध्ययन करना है जिसे भाषा का वाक्य-विज्ञान कहते हैं। दर्शनशास्त्र उस सामान्य नियम की खोज करने का प्रयास करता है जो नियम सामान्य रूप से सभी भाषाओं में प्रयुक्त होते हैं और जो हमारे विचारों की या प्रतिज्ञप्तियों की अर्थवत्ता को सिद्ध करती है। अतः दर्शनशास्त्र की भाषा संबंधी समस्या उसकी अर्थवत्ता की समस्या है। वह उन नियमों अथवा कसौटियों की तलाश करता है जिसके अनुसरण से कोई भी वाक्य अर्थपूर्ण कहा जाता है।
लुडविग विट्गेन्स्टाइन 20वीं सदी के एक ऐसे ही प्रखर विचारक हैं जिन्होंने दर्शन की इन तमाम समस्याओं का विश्लेषण करते हुए अपने दर्शन की नींव रखी। उन्होंने इन समस्याओं पर जिस प्रकार से विचार किया वह अपने समय के विचारों से ठीक विपरीत थीं। उन्हें अपने जीवन काल में इतनी लोकप्रियता नहीं मिली जितनी मिलनी चाहिए थी। किंतु मृत्योपरांत उनके पुस्तकों के अंग्रेजी अनुवाद ने सम्पूर्ण दार्शनिक जगत् को उद्वेलित कर दिया। पाश्चात्य दर्शन की विधाएँ तो विट्गेन्स्टाइन के दिशा-निर्देश पर ही चल पड़ी। तार्किक भाववाद और भाषा-विश्लेषण अपने आविर्भाव के लिए सदा विगेन्स्टाइन का ऋणी रहेगा। जिस प्रकार भारतीय दर्शन का सार वेदांत दर्शन को माना जाता है ठीक उसी प्रकार विगेन्स्टाइन के विचारों को पाश्चात्य-दर्शन का सार कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी।
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