यह पुस्तक विज्ञान और अध्यात्म के उस दुर्लभ संगम से जन्मी है, जहाँ जिज्ञासा केवल जानने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि स्वयं को समझने की यात्रा बन जाती है। स्वामी शिवानंद द्वारा रचित विश्वप्रसिद्ध ग्रंथ "Mind: Its Mysteries and Control" को पढ़ते हुए डॉ. राम यतन ठाकुर को गहराई से यह अनुभव हुआ कि मन की प्रकृति, उसकी शक्तियाँ और उसका नियंत्रण- यह ज्ञान केवल अंग्रेज़ी भाषा तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्होंने महसूस किया कि इस ग्रंथ का सार उस भाषा में पहुँचना चाहिए, जिसमें सामान्य जन सहजता से इसे पढ़ सकें, समझ सकें और जीवन में उतार सकें। यही भावना इस हिंदी अनुवाद की आधारशिला बनी। डॉ. राम यतन ठाकर का जीवन लंबे समय तक भौतिकी के अध्ययन, अध्यापन और शोध को समर्पित रहा है। परंतु उनके लिए विज्ञान कभी मात्र विषय नहीं रहा- वह सत्य की खोज का माध्यम रहा है। जैसे-जैसे उन्होंने भौतिक संसार के नियमों को समझा, वैसे-वैसे चेतना, मन और अस्तित्व से जुड़े प्रश्न उन्हें भीतर से आकर्षित करते चले गए। उनके दृष्टिकोण में विज्ञान और अध्यात्म परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सत्य की ओर जाने वाले दो पूरक मार्ग हैं। हिंदी में लेखन के प्रति उनका सहज झुकाव बहुत प्रारंभ से रहा है। भौतिकी जैसे जटिल विषय पर लिखी उनकी पुस्तकों ने यह सिद्ध किया कि गंभीर विचारों को भी सरल, सजीव और प्रभावी हिंदी में प्रस्तुत किया जा सकता है। इसी संवेदनशीलता और स्पष्टता के साथ इस ग्रंथ का अनुवाद किया गया है, जहाँ शब्दों के साथ-साथ भाव और उद्देश्य को भी पूरी निष्ठा से रूपांतरित किया गया है। यह पुस्तक केवल मन को समझने का प्रयास नहीं है, बल्कि स्वयं को जानने का आमंत्रण है। जो पाठक जीवन के अर्थ, मानसिक अनुशासन और आंतरिक संतुलन की खोज में हैं, उनके लिए यह कृति एक मार्गदर्शक की तरह सामने आती है-शांत, स्पष्ट और गहन।
डॉ. राम यतन ठाकुर का जन्म 1 जुलाई 1947 को बिहार प्रांत के मधुबनी ज़िले के अंतर्गत बौड़हर ग्राम के एक साधारण परिवार में हुआ। प्रारंभ से ही वे मेधावी छात्र रहे और विद्यालय तथा महाविद्यालय जीवन में उन्हें निरंतर नेशनल मेरिट स्कॉलरशिप प्राप्त होती रही। 1966 में लंगट सिंह कॉलेज, मुज़फ्फरपुर से उन्होंने बी.एससी. (फिज़िक्स ऑनर्स) की परीक्षा उत्तीर्ण की। रसायन विज्ञान, गणित तथा समग्र रूप से उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए उन्हें बेस्ट ग्रेजुएट की उपाधि के साथ स्वर्ण पदक प्रदान किया गया। उनके अंक उस समय तक के महाविद्यालय के इतिहास में एक नया मानक स्थापित करने वाले थे। इसके पश्चात उन्होंने बिहार विश्वविद्यालय, मुज़फ्फरपुर से एम.एससी. (भौतिकी) की डिग्री भी स्वर्ण पदक सहित प्राप्त की। 1969 में उनकी नियुक्ति तत्कालीन भागलपुर विश्वविद्यालय के अंगीभूत महाविद्यालय आर.डी. एंड डी.जे. कॉलेज, मुंगेर में भौतिकी के व्याख्याता के रूप में हुई। शिक्षक फेलोशिप के अंतर्गत उन्होंने आई.आई.टी. दिल्ली से पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की।
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