रामचरित मानस और भगवद्गीता में ब्रह्म द्रष्टा वैदिक ऋषियों के परा विज्ञान और उस पर प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जीवन पद्धति (आत्मवादी संस्कृति) का पारदर्शी एवं व्यावहारिक भाष्य प्रस्तुत किया गया है। बहुत प्राचीन काल में विदेह राजर्षियों ने आत्मवादी विचारधारा का प्रचार किया था, जिस पर आर्यों की मूल संस्कृति की स्थापना की गयी थी। माधव विदेह, राजर्षि जनक और योगी याज्ञवल्क्य आदि इसके प्रमुख संवाहकों में से थे। (इसका अनुसंधान परक विवरण द्वितीय भाग में प्रस्तुत करने की योजना है)।
इसकी ओर संकेत करते हुए गीताकार ने कृष्ण से कहलवाया है कि "अर्जुन, मैंने सबसे पहले यह कर्मयोग-ज्ञान सूर्य को दिया, सूर्य से यह ज्ञान राजर्षि मनु को मिला, मनु से इक्ष्वाकु को और अनेक राजर्षियों को परंपरागत यह ज्ञान प्राप्त हुआ। परन्तु दीर्घ काल के पश्चात् वह ज्ञान लुप्तप्राय हो गया। अवतरित होकर वही ज्ञान में (पुरुषोत्तम ब्रह्म) आज तुम्हें प्रदान कर रहा हूँ (गीता अ० ४) ।"
कृष्ण ने अर्जुन से यह भी कहा कि "इसी ज्ञान का पालन कर जनक आदि राजर्षियों ने सिद्धि प्राप्त की थी, तुम भी इन पूर्वजों द्वारा व्यवहृत मार्ग पर चलो (गीता अ० ३)।"
इसी प्रकार "मानस" में गोस्वामी जी ने राजर्षि जनक के गुरु याज्ञवल्क्य को व्यास-पीठ पर बैठा कर कहा जागबलिक जो कथा सुहाई। भरद्वाज मुनिबरहिं सुनाई।। कहिहउँ सोइ संबाद बखानी। सुनहु सकल सज्जन सुखु मानी ।।
"हे सज्जनों। याज्ञवल्क्य ने भरद्वाज को रामचरित मानस का जो ज्ञान प्रदान किया, वही मैं आपको सुना रहा हूँ। आप उसे सुनें और आनन्द प्राप्त करें।" इस कथन में भी उपर्युक्त तथ्य की ओर ही संकेत है।
लेकिन ऐसा न समझा जाय कि गीता और 'मानस' के रचयिता पुनरुत्थानवादी या परंपरावादी थे और प्राचीन काल की संस्कृति को पुनः प्रतिष्ठित करने का उन्होंने प्रयास किया, ऐसा समझना अज्ञान-आधारित भ्रम होगा। वस्तुतः उन्होंने स्वयं उस परम सत्-चित् आनंद तत्त्व का पूर्ण, निर्बाध एवं एकरस साक्षात्कार किया था, जिसे जान लेने पर सब कुछ सहज रूप से ज्ञात हो जाता है। उन्हें ब्रह्म, ब्रह्माण्ड, प्रकृति, जीव, जीवन और कर्म के सारे रहस्य प्रतीति-गोचर थे। अपनी अनुभूति के आलोक में उन्होंने प्राचीन ऋषियों एवं राजर्षियों द्वारा आविष्कृत-प्रचारित ब्रह्म- विज्ञान और उस पर प्रतिष्ठित जीवन-पद्धति (आत्मवादी संस्कृति) का सम्यक् आकलन-मूल्यांकन किया। उन्हें अपनी ब्रह्मानुभूति और प्राचीन ऋषियों की ब्रह्मानुभूति में पूर्ण तादात्म्य का दृढ बोध हुआ। और, तब वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि प्राचीन काल के ब्रह्म-द्रष्टा ऋषियों-राजर्षियों द्वारा जिस वैज्ञानिक विचार-धारा और संस्कृति की स्थापना की गयी थी, उसी से अखिल मानवता का स्थायी कल्याण संभव है। इसलिए उन्होंने अपने-अपने युग में, अपने-अपने ढंग से, उसे निरूपित किया।
परन्तु ये दोनों ग्रंथकार परा कोटि के कवि भी थे। इन्होंने ब्रह्म-विज्ञान को गूढ़ काव्यात्मकता के माध्यम से प्रस्तुत किया है। गीता की संरचना, विषय-प्रतिपादन-शैली और शब्द प्रयोग काव्यात्मक हैं। इस तथ्य पर ध्यान न देने के कारण श्री शंकराचार्य से लेकर आधुनिक काल तक जिन आचार्यों, विद्वानों, साधकों, संतों ने गीता-भाष्य लिखे हैं वे निर्भान्त निष्कर्ष नहीं दे पाये हैं। महर्षि अरविन्द ने गीता की काव्यात्मकता को समझा और सही परिप्रेक्ष्य में गीता की विवेचना की। भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली द्वारा प्रकाशित "भगवद्गीता : एक नया अध्ययन" पुस्तक में मैंने इन सब बातों की विस्तार में चर्चा की है।
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