मनीषा पञ्चकम् आदिशङ्कराचार्यविरचित पञ्चलोकात्मक एक लघु ग्रंथ है ! इस लघु कृति पर श्रीनृसिंहाश्रम कि मधुमञ्जरी टिक उपलब्थ है ! इस लघु कृति पर मूल संस्कृत श्लोको का अन्वय, अन्वयार्थ एवम् अनुवाद है जबकि टिक का अनुवाद एवम् विमर्श किया गया है ! चार श्लोको के माध्य्म से चारो महाकाव्यों के अर्थ को स्पष्ट किया गया है एवं पञ्चम श्लोक महाकाव्य के का फल है !
मनीषापञ्चकम् की कथा का आधार यह है कि एक दिन शङ्कराचार्य गंगा स्नान कर के कशी विश्वनाथ के दर्शन करने के लिए जा रहे थे ! अचानक मार्ग में चाण्डाल को सामने देखकर बोले यहाँ से जाओ जाओ ! चाण्डाल के उत्तर को सुनकर शङ्कराचार्य आश्चर्य चकित रह गये और उसी घटना को आधार बनाकर उसी क्षण उन्होंने ये ग्रंथ लिखा ! देखने में तो यह अतीव लघु है परन्तु जीवनपर्यन्त विचार एवं आचरण के लिए प्रयाप्त है !
डॉ. लक्ष्मिकान्त विमल शङ्करवेदान्त ने प्राचीन दुर्लभ ग्रंथो के सङ्कलन एवं उनके अनुवाद तथा व्याख्या के साथ संपादन में लगे है उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय ,दिल्ली के संस्कृत विभाग से ' अवधूगीता : एक दार्शनिक अध्धयन ' नामक शीर्षक पर एम. फिल. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के विशिष्ट संस्कृत अध्धयन केंद्र से 'शङ्कर वेदान्त में अर्थ निर्धारण का अध्ययन ' नामक शीर्षक पर पी. एच. डी. की है ! इन्होंने "to prepare A Reader in Indian Philosophy " नामक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की वृहत्परियोजना में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के विशिष्ट संस्कृत अध्ययन केंद्र में प्रोजेक्ट फेल्लो के रूप में जुलाई 2003 से जून 2006 तक कार्य किया है ! विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा सञ्चालित राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) उत्तीर्ण है एवं भारतीय दार्शनिक अनुसन्धान परिषद् , नई दिल्ली के कनिष्ठ शोध अध्येता (JRF) रहे है ! सम्प्रति शङ्कर शिक्षायतन न्यास , नई दिल्ली में शोध सहायक के रूप में कार्यरत है !
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