संस्कृत वाङ्मय विश्व वाङ्मय समुदाय में मूर्द्धन्य है- इसमें किसी का भी मतभेद नहीं है। इसका विस्तृत, सुसमृद्ध और सभी अङ्गों से पूर्ण कलेवर सभी को आश्चर्यचकित करता है ऐसा कहना अत्युक्ति नहीं है। इसमें निहित शाश्वत और सार्वभौमिक ज्ञान-निधि अनादि काल से लेकर आधुनिक युग तक निरंतर व्यवहार में दृष्टिगोचर होती है।
इसके वाङ्मय के संदर्भ में यह उक्ति चरितार्थ होती है- 'जो यहाँ नहीं है, वह दूसरी जगह नहीं है, जो इसमें है, वह कहीं नहीं है।' एक ओर जहाँ इस लोक में कर्म करते हुए सौ वर्ष तक जीवित रहे, इत्यादि कर्म की ओर प्रवृत्त करने वाले मंत्र एकत्रित हैं तो दूसरी ओर अज्ञानता से मिलने वाले मृत्यु के भय को विद्या द्वारा दूर कर अमृत की प्राप्ति करें- ऐसा प्रवृत्ति-निवृत्ति उपदेशपरक वचन भी यहीं प्राप्त हो जाते हैं। इस कारण इस वाङ्मय के दो भाग हैं विद्या और अविद्या। अविद्या भी जानी जाती है। पुरुषार्थ की पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और अपरा कही जाती है और विज्ञान शब्द से सिद्धि ही इस वाङ्मय का परम लक्ष्य हैं। मोक्ष-भेद से चार प्रकार के हैं। इनमें धर्म बुद्धि का विषय है और सत्-असद् का विवेक करना इसका लक्षण है। अर्थ शरीर का विषय है और व्यवहार इसका लक्षण है। काम मन का विषय है और भोग इसका लक्षण हैं। मोक्ष आत्मा का विषय है और चरमनिवृत्ति इसका लक्षण है। इनमें यथायोग्य प्रवृत्ति-वृत्तिपरक उपदेश के प्रतिपादन की विलक्षणता ही इसका वैशिष्ट्य है। कहा भी गया है- धर्म, अर्थ और काम का सेवन समान रूप में किया जाना चाहिए। जो एक का दास बन जाता है, वह मनुष्य जघन्य है।
धर्म के अनुरोध से, अर्थ के अनुरोध से, काम के अनुरोध से और मोक्ष के अनुरोध से सबका उपयोग ही इसका परम संदेश है।
इसलिए मोक्ष ही लोगों का चरम लक्ष्य है। लेकिन वह तो तुरीय सर्वोच्च पाद है। तीन पादों (धर्म, अर्थ, काम) को पार कर ही वहाँ पहुँचा जा सकता है। धर्म अनुष्ठान के योग्य है और अर्थ का उपार्जन करना चाहिए और काम का सेवन करना चाहिए। उसके बाद ही मोक्ष में तल्लीनता सम्भव होती है। उसके अनुरोध से मानवजीवन भी ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास-भेद से चार प्रकार में ही विभक्त है। (मानव) पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचारी होता है और प्रवृत्ति निवृत्ति ज्ञानादि का उपार्जन करता है और वह स्नातक गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता है। विविध प्रकार के तप द्वारा विषयों से मन का निवर्तन (दूर करने) के लिए पचहत्तरवें वर्ष तक प्रयत्नशील होता है। विषयों से दूर आत्मा वाला होकर वह संन्यास धारण करता है। सभी वस्तुओं का त्यागकर जब तक जीवित रहता है, वह सम्पूर्ण बाह्य आवरण का त्याग कर परम ईश्वर को प्राप्त करता है और इस काल में उसकी जीवन-शैली, सुव्यवस्थित होती है। इस प्रकार सभी अङ्गों से पूर्ण इस वाङ्मय को यदि कोई निवृत्ति-मार्ग मात्र का उपदेश और अकर्मण्यता की बात करने वाले मानता है तो वह देवताओं का प्रिय ही है। इसमें न केवल पुरुषार्थ-सिद्धि का ही वर्जन है, अपितु उनके मार्गों की व्याख्या करने वाले शास्त्र भी रचे गये हैं। सम्पूर्ण वाङ्मय मूल रूप से चार वेदों, उसके छः अङ्गों, पुराण, मीमांसा, न्याय, धर्मशास्त्रादि इन चौदह भागों में विभक्त है। उनकी शाखा और प्रशाखा हजारों भागों में विभक्त और व्याख्यायित हैं। मूल रूप से चार वेद या मूल संहिताएँ ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के नाम से जानी जाती हैं।
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