प्राक्कथन
साधारणतः भारतीय दर्शन को ब्रह्मवादी दर्शन माना जाता है। ब्रह्मवाद वह है जो परमतत्व के रूप में एकमात्र एकसत्ता ब्रह्म को स्वीकारता है। ब्रह्म की अभिव्यक्ति ही समस्त चराचर पदार्थ है। ब्रह्मवाद के भी दो रूप हैं निर्गुण ब्रह्मवाद या निर्गुणवाद एवं सगुण ब्रह्मवाद या सगुणवाद । निर्गुणवाद ब्रह्म के निर्गुण रूप को स्वीकारता है, तो सगुणवाद उसके सगुण रूप को स्वीकारता है। निर्गुणवाद के अनुसार ब्रह्म निराकार है, जबकि सगुणवाद ब्रह्म को साकार मानता है। निर्गुण और निराकार होने के कारण ब्रह्म मनुष्य एवं अन्य प्राणियों के अंतःस्थल में बसा है, वह पेड़-पौधों, पत्थरों आदि अचेतन पदार्थों में भी निहित है। इसलिए उपनिषदों में आत्मा को ही ब्रह्म माना गया है। आत्मा के दो स्तरों की बात की गयी है उच्चतर आत्मा जो ब्रह्म मात्र है और निम्नतर आत्मा जो जीव (मनुष्य सहित अन्य चेतन प्राणी) है। निम्नतर आत्मा की पूर्णता उच्चतर आत्मा है। परन्तु सगुणवाद के अनुसार पूर्णता केवल ईश्वर (सगुण ब्रह्म) की है। ईश्वर का अंश मात्र मनुष्य एवं अन्य प्राणी हैं। पत्थर आदि निर्जीव पदार्थ भी ईश्वर का अंश मात्र ही है। अतएव पूर्ण सत्ता सिर्फ ईश्वर है जिसे आकार दिया जा सकता है। यही कारण है कि सगुणवाद मूर्तिपूजा का समर्थन करता है। राधा-कृष्ण, सीताराम के रूप में ईश्वर की शक्ति और ईश्वर के प्रगाढ़ एवं अभिन्न संबंध को दिखलाया गया है। साथ ही, स्त्री-पुरुष की अभिन्नता को भी दर्शाया गया है। पुरुष के लिए स्त्री और स्त्री के लिए पुरुष अनिवार्य है। इस अनिवार्यता को निर्गुणवाद नहीं स्वीकारता है। इसलिए उसमें कठोरता आ जाती है, जबकि सगुणवाद में कोमल-भाव परिलक्षित होता है। ईश्वर के साथ भक्त का रागात्मक संबंध बन जाता है।
सगुणवाद हो या निर्गुणवाद दोनों का आधार वैदिक एवं औपनिषदिक विचार ही है। वेदों में सगुण ईश्वर की कल्पना की गयी है, जबकि उपनिषदों में अपेक्षाकृत निर्गुण ईश्वर को प्रश्रय दिया गया है। पुराणों में सगुण ईश्वर के विभिन्न अवतारों को उल्लेख मिलता है। उन्हीं अवतारों में राम और कृष्ण की गणना की जाती है, जिन्हें ईश्वर का पूर्ण अवतार कहा जाता है। इस प्रकार प्राचीन भारतीय दर्शन का मुख्य प्रतिपाद्य विषय ईश्वर या ब्रह्म रहा है जिसके इर्द-गिर्द आत्मा, मूर्तिपूजा, अवतार आदि संप्रत्ययों का उद्भव होता है। कालान्तर में इन संप्रत्ययों के कारण सामाजिक तनाव की स्थिति हुई। इस तनाव को उत्पन्न करने में मुगल-आक्रमण का बहुत बड़ा हाथ रहा है। अंग्रेजी हुकूमतों ने तो इसे इतना विस्तार दिया कि जाति, धर्म और सम्प्रदाय के नाम पर सभी भारतीय आपस में ही रक्तरंजित होने के लिए तत्पर रहते थे। अंग्रेजों का बुना हुआ यह 'जाल' आज भी नष्ट नहीं हो पाया है; बल्कि स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माताओं ने ऐसी धारा की व्यवस्था की है कि जाति के नाम पर सामाजिक अलगाव का होना स्वाभाविक है। धार्मिक उदारता ने धार्मिक कट्टरता को जन्म दिया है। धर्मान्तरण द्वारा साम्प्रदायिक विद्वेष फैला और धार्मिक कट्टरता पनपी । धर्मान्तरण धार्मिक उदारता का पर्याय है।
सच पूछिए, तो ब्रह्मवादी दर्शन में इन सबका कोई स्थान नहीं है। ईश्वरीय अंश या ईश्वरीय अभिव्यक्ति होने से सभी मनुष्य समान हैं। उनमें किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं है। सभी मनुष्य भाई-भाई हैं। इसलिए उनमें घृणा और विद्वेष नहीं होकर प्रेम और मैत्री होना चाहिए। सहयोग, सहानुभूति, करुणा, दया इत्यादि गुणों को अपनाना ही मानवता है। यही कारण है कि सगुणवादी ब्रह्मवाद, जिसके अनेक रूप हैं, ने ईश्वर में ही प्रेम, दया, करुणा आदि गुणों को आरोपित किया है। सगुणवादी ब्रह्मवाद के प्रमुख रूपों में वैष्णववाद, शैववाद और शाक्तवाद आते हैं। वैष्णववाद विष्णु, राम-कृष्ण को ईश्वर तथा लक्ष्मी, सीता-राधा को ईश्वर की शक्ति मानता है। शैववाद शिव को ईश्वर और पार्वती को ईश्वर की शक्ति स्वीकारता है तथा शाक्तवाद 'शक्ति' (दुर्गा, लक्ष्मी, पार्वती, सरस्वती, काली आदि) को ईश्वर की संज्ञा देता है। चाहे वैष्णववाद हो या शैववाद, ईश्वर और उसकी शक्ति को मान्यता देता है। निर्गुणवादी ब्रह्मवाद इसी शक्ति को 'माया' की संज्ञा देता है। निर्गुणवाद के लिए ब्रह्म ही ईश्वर है और माया मिथ्या है। किन्तु माया या शक्ति के बिना सृष्टि नहीं होती है। इसलिए ईश्वर की सृजनशीलता को माया कहा गया है।
वास्तव में, वैष्णववाद या शैववाद या शाक्तवाद का आरम्भ आठवीं शताब्दी के बाद होता है। निर्गुणवाद की पराकाष्ठा शंकर के अद्वैत वेदान्त में होती है। अद्वैत वेदान्त पूरी तरह जगत का निषेध करता है। किन्तु वैष्णववाद या शैववाद या शाक्तवाद जगत की सत्यता को स्वीकारता है। दूसरे शब्दों में, सगुणवाद ने निर्गुणवाद के प्रभाव को समाप्त करने का प्रयास किया है। फिर भी, निर्गुणवाद समाप्त नहीं होता है, बल्कि सगुणवाद और निर्गुणवाद में समन्वय की प्रवृत्ति दीखती है। भारतीय दर्शन के मध्यकाल में इस प्रवृत्ति का स्पष्ट दर्शन कबीर में मिलता है। नानक ने निर्गुणवाद को स्वीकारा है। इसके बावजूद मध्यकालीन भारतीय दर्शन सामाजिक एवं धार्मिक सुधार की ओर अधिक प्रवृत्त है। कबीर, नानक, रैदास, तुलसीदास, सूरदास, रसखान, जायसी, मीराबाई, दादू, पलटू आदि सभी संत कवि ने समाज में आयी बुराईयों एवं धार्मिक कुरीतियों को दूर करने का अनथक प्रयास किया है। इन संतों की वाणी को संत साहित्य या भक्ति साहित्य कहा जाता है। किन्तु संत या भक्ति साहित्य में दार्शनिक विचार भरे पड़े हैं। दार्शनिक विचार के कई आयाम हैं-तत्त्व दर्शन, धर्म दर्शन, नैतिक दर्शन, समाज दर्शन आदि । आश्चर्य है कि भारत के किसी भी विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग में संत या भक्ति साहित्य के इन दार्शनिक आयामों की पढ़ाई नहीं होती है, जबकि इकबाल और टैगार जैसे कवि-मनीषियों के दार्शनिक विचार को पाठ्यक्रम में जगह मिली है। परन्तु यह सुखद है कि पटना विश्वविद्यालय ही संभवतः देश का वह पहला विश्वविद्यालय है जिसने स्नातकोत्तर कक्षा के पाठ्यक्रम में कबीर, रैदास और नानक के दार्शनिक आयाम को रखा है।
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