भूमिका
इस भाग में भारत पर तुर्क अफगान द्वारा आक्रमण (1192 ए० डी०), शासन तथा तदुपरांत मुगलों द्वारा आक्रमण शासन तथा उनके पतन (1526-1757 ए० डी०) तक के वृत्तांत वर्णित किए गए हैं। लगभग छः सौ वर्षों की लम्बी अवधि के विदेशी शासन के फलस्वरूप भारतीयों की मूल विचारधारा में तथा उनके जीवन के परम्परागत स्वरूप में इस्लामी सिद्धांतों के मिश्रण से अनेक परिवर्तन का होना, अनिवार्य और स्वाभाविक है। भारतीय दर्शन की विश्व-व्यापकता तथा इस्लाम धर्म की समूह-बद्धता आमने-सामने खड़ी थी। दोनों विचारधाराओं के जो समान तत्व थे, जैसे-सृष्टिकर्ता, पालनकर्त्ता तथा संहारकर्त्ता के स्वरूपों में उसे जिसने अपनाया, वह सूफी संत कहलाए तथा हिन्दू और मुसलमानों द्वारा पूजित हुए । ये भारतीय समाज के गौरव-पुरुष बन गए। परन्तु जो शासक या सामान्य पदाधिाकरी इस्लाम धर्मावम्बियों की संख्या बढ़ाने में लग गए, वे कट्टरवादी, संकीर्णवादी कहलाए, उन्हें भारतीय जनसाधारण ने न सम्मान दिया, न अपना स्नेह । किन्तु जिन्होंने आतंक से, भय से अथवा लोभ से धर्म-परिवर्तन स्वीकार किया, उन्हें इतिहास ने "नए मुसलमान" की संज्ञा दी। शायद ही ऐसे किसी व्यक्ति के हृदय में इस्लाम के प्रति हार्दिक प्रेम, प्रेम या आस्था रही हो, उनमें दो बातें अवश्य देखने को मिलती है, "शासकीय वर्ग के लोग" कहलाने की लालसा अथवा उत्पीड़ित होने का भय। फिर भी, समयक्रम से यह नया वर्ग बड़ा शक्तिशाली होकर उभरा, फारस से आए तुर्क-अफगान, मुगल आए और मिट गए, परन्तु नए मुसलमानों के विराट-समूह, भारतीय समाज में, राजनीति में उभरता रहा, उसका स्थान बना रहा और सदा बना रहेगा। यह समुदाय मूलतः भारतीय था, अतः वह एक नए रूप में भी भारत का ही अंग और अंश हैं।
इतिहास, राजनीतिशास्त्र तथा समाजशास्त्र के स्नातक छात्र एक प्रश्न अवश्य करते हैं-बारहवीं शताब्दी में जब मुहम्मद गजनी और गोरी भारत पर बार-बार आक्रमण कर रहे थे तब यही के क्षत्रीय राजा और योद्धा क्या कर रहे थे ? सिकन्दर के आक्रमण के बाद से ही सर्व-विदित होचुका था कि भारत का पश्चिम-उत्तर भू-भाग विदेशी आक्रमण के लिए खुला रास्ता है, फिर इस मार्ग की रक्षा के लिए सावधानी क्यों नहीं बरती गयी ? बारहवीं शताब्दी में सूचना तंत्र और खुफिया विभाग कैसी थी ? जिसे सीमा के सटे प्रदेशों के हल-चल का कोई पता नहीं था ? प्रश्न में उत्तेजना और उदासीनता, दोनों व्याप्त है। परन्तु इन प्रश्नों का उत्तर सीधा है और मात्र एक ही है।
भारतीय राजाओं के बीच आपसी कटुता और वैमनस्य, जैसे-दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान तथा बनारस के राजा जयचन्द गहड़वाड़ के बीच थी, वह देश की सुरक्षा की बात अधर में था । राष्ट्रीय समग्रता की भावना का सर्वथा अभाव था। खुफिया विभाग सुगठित नहीं था और सूचना तंत्र आज के जैसा द्रुतगामी नहीं था। दक्षिण और उत्तर भारत के बीच कोई ताल-मेल नहीं था, विन्ध्य पर्वतमाला अभेद्य और दुर्गम पथ बना खड़ा था और आखिरी बात यह भी कि युद्ध केवल वीरता की भावना से जीता नहीं जाता बल्कि रण-कौशल, आयुध और पोशाक की भी आवश्यकता होती है, जिस ओर भारतीय राजाओं, यहाँ तक कि तुर्क-अफगान शासकों का भी ध्यान नहीं गया था। याद रहे, बाबर के पास तोपें थी, इब्राहिम लोदी के पास हाथी और तीर-तलवार। पानीपत के युद्ध (1526 ए० डी०) में तोपों की जीत हुई थी, हाथियों की हार। मारक शक्ति ही युद्ध का फैसला निश्चित करती है।
मध्यकालीन भारत की सामाजिक दशा आज की दशा से भिन्न थी। आज की राजनैतिक और सामाजिक व्यवस्था वैदिक काल से मेल खाती है, मध्यकालीन व्यवस्था से नहीं। उदाहरणस्वरूप देखा जाय तो मध्यकालीन जनता राजाओं को देवतुल्य मानती थी, राजाओं की अनुचर होती थी। जन जागरण, जनता की आवाज या जनशक्ति द्वारा राजाओं का विरोध देखने-सुनने को नहीं मिलता। ऊपर से बौद्धों की अहिंसा और तटस्थता कम घातक सिद्ध नहीं हुई। बौद्ध-युवक तलवार की जगह कमंडल पसंद करते थे ।
इस्लाम के संपर्क के फलस्वरूप भारतीय संस्कृति में ठहराव आ गया। स्त्रियाँ पहली शिकारी बनीं। उनके सारे सामाजिक अधिकार लुप्त हो गए और हाथ आयी पराधीनता, अशिक्षा, उत्पीड़न । महिलाएँ पूज्या से भोग्या बन कर रह गयीं। उनके चेहरे पर पर्दा पड़ गयी और मर्यादा तथा सतीत्व की रक्षा जीवन की समस्या बन गयी ।
अलाउद्दीन खिलजी की कामान्धता ने रानी पद्मिनी और उनकी एक हजार सहेलियों द्वारा सामूहिक जौहर व्रत-सतीव्रत का कारण बन गयी। यह पूरी कहानी हिन्दी भाषा और बोलियों में लोक गाथा के रूप में उतर आयी ।
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