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मिथिला की त्रासदी: बाढ़ और सुखाड़- Mithila Ki Trasadi: Badh Aur Sukhad

$35
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Specifications
Publisher: JANAKI PRAKASHAN, PATNA
Author Ajay Kumar Jha
Language: Hindi Text
Pages: 223 (With B/W Illustrations)
Cover: Hardcover
9.00x5.50 inch
Weight 390 gm
Edition: 2014
ISBN: 9789381313787
BA0317
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Book Description

 

 

प्रस्तावना


उत्तर वैदिककाल से ही मिथिला की एक अतिविशिष्ट पहचान रही है।
शतपथ ब्राह्मण के अनुसार विदेह जन के विदेह माथव और उनके पुरोहित गौतम राहुगण के नेतृत्व में मिथिला भूमि में सर्वप्रथम उपनिवेशन हुआ। विदेह राज्य की राजधानी मिथिला सम्पूर्ण उत्तर-पूर्व भारत में एक प्रमुख शिक्षा केन्द्र के रूप में प्रख्यात हुई। फलतः विदेह राज्य के पूरे भू-भाग को ही कालान्तर में मिथिला कहा जाने लगा। गुप्तकाल से लेकर पूरे मध्यकाल में इसे तिरहुत भी कहा जाता था। परन्तु तिरहुत में पूर्णियाँ, किशनगंज, कटिहार, नौगछिया, बेगूसराय, सहरसा आदि का भाग शामिल नहीं था।

 

अतः एक सांस्कृतिक ईकाई के रूप में मिथिला नाम ही पूरे ऐतिहासिक युगों में सर्वाधिक लोकप्रिय रहा। मिथिला को नदी मातृक प्रदेश कहा जाता है।

 

वस्तुतः एक उत्कृष्ट संस्कृति का उत्तरोत्तर विकास नदी श्रृंखला के बीच ही होता रहा। किन्तु मिथिला संस्कृति की उद्गाता नदियाँ आधुनिककाल में एक ज्वलन्त समस्या बनकर उभरी हैं।

 

उत्तर बिहार के अठारह जिलों के कुल 25,000 वर्गमील में फैले मिथिला में पूरब से पश्चिम तक पंद्रह प्रधान नदियाँ बहती हैं, जबकि अन्य अनेक सहायक नदियाँ हैं। मिथिला की पश्चिम सीमा गंडक नदी है और इसके दक्षिण गंगा नदी बहती है, जबकि पूरब में मिथिला परिक्षेत्र का विस्तार महानंदा नदी तक है। मिथिला के अन्दर बहनेवाली प्रमुख नदियों में कोसी, कमला, बलान, बागमती, धेमुड़ा, बूढ़ी गंडक, खिरोई, लखनदेई, जीवछ आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इनमें से कुछ नदियों गर्मी के मौसम में पतले नाले सी दिखाई पड़ती हैं, कुछ में पूरे वर्ष पानी की धारा बहती है और कुछ तो साल में चार-पाँच महीने लगभग सूख ही जाती हैं। किन्तु एक समानता इनमें है और वह यह कि मानसून की वर्षा के बाद ये नदियाँ प्रचंड रूप धारण कर लेती हैं, इनमें पानी का जबर्दस्त उफान आता है और ये प्रबल वेग से बहने लगती ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मिथिला को जलप्लावित कर जन-जीवन को अस्त-व्यस्त और संत्रस्त कर देती हैं। इस नदी मातृक भूभाग का औसतन 76 प्रतिशत क्षेत्रफल प्रतिवर्ष बाढ़ में डूब जाता है और औसतन साठ लाख लोग बेघर-बार हो जाते हैं तथा भुखमरी तथा महामारी से पीड़ित होते हैं। बाढ़ की विभीषिका के कारण लगभग जुलाई से सितम्बर तक न. केवल यहाँ की आर्थिक गतिविधि अस्त-व्यस्त रहती है, बल्कि इनसे सामान्य जन-जीवन भी प्रभावित होता है। इस तरह प्रतिवर्ष बाढ़ के रूप में विशाल जलराशि मिथिलावासियों पर कहर ढ़ाती अन्ततः समुद्र के खाड़े जल में विलीन हो जाती हैं।

 

19वीं सदी के उत्तरार्द्ध से ही मिथिला की इन उच्छृंखल नदियों को नियंत्रित करने और इनके द्वारा लाये जाने वाले अकूत जल भंडार का नियोजित उपयोग करने के लिए गम्भीर विमर्श प्रारम्भ हुआ। इसके लिए सेमिनारों-संगोष्ठियों के आयोजन, विशेषज्ञ समितियों के गठन, सर्वेक्षणों एवं प्रतिवेदनों और जन आन्दोलनों का एक लम्बा दौर चला और समस्या अतिगम्भीर, संवेदनशील तथा विवादास्पद होने के कारण यह सिलसिला आज भी जारी है और भविष्य में भी तब तक जारी रहने की संभावना है, जब तक कि मिथिला की नदियों के जल को नियोजित कर इसे अभिशाप से वरदान के रूप में नहीं परिवर्तित कर लिया जाता है।

 

आजादी के बाद मिथिला की प्रमुख नदियों को नियंत्रित कर इनकी जलों का सिंचाई एवं पनबिजली उत्पादन के लिए नियोजित करने के उद्देश्य से क्रमशः कोसी, गंडक, कमला, बागमती और अधवारा समूह की नदियों पर जलाशय और तटबंध बनाए गए और इनसे नहरें निकाली गईं। अन्य छोटी-छोटी नदियों को भी बाँधा गया। सरकार के साथ-साथ बाढ़ प्रभावित इलाके के लोगों ने इन्हें पूरा करने के लिए 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध में अनथक प्रयत्न किए। सरकार ने अरबों रुपये खर्च किए, असंख्य लोगों ने भारी श्रमदान दिया। लेकिन 50 वर्षों के भगीरथ प्रयत्नों का परिणाम क्या हुआ? तटबंधों के अन्दर के लाखों लोग उजड़ गए, उनके पुनर्वास की समुचित व्यवस्था नहीं हुई और वे दर-दर भटकने के लिए मजबूर हो गए। नहरें बनी, लेकिन उनमें सिंचाई के लिए यथेष्ट पानी ही नहीं आया। जलाशय भी बने, लेकिन पनबिजली का उत्पादन नहीं हो सका। तटबंध बने, लेकिन बाढ़ का कहर घटने के बजाय बढ़ता चला गया। 1952 में 25 लाख हेक्टेयर भूमि बाढ़ प्रभावित थी, वहीं 1994 में यह बढ़कर 68.9 लाख हेक्टेयर भूमि हो गयी और इसका विस्तार निरन्तर जारी है। 2004 में उत्तर बिहार अर्थात् मिथिला का शायद ही कोई जिला बचा, जिसने बाढ़ की त्रासदी को नहीं भोगा।

 

ज्यों-ज्यों बाढ़ की विभीषिका बढ़ती गई, जल के समुचित नियोजन के सवाल पर भूपारिस्थितिकी एवं जल वैज्ञानिकों, अभियंताओं, पर्यावरणविदों, भूगोलवेत्ताओं, कृषि एवं मौसम वैज्ञानिकों और अन्य तकनीकी विशेषज्ञों के बीच बहस भी सरगर्म होता गया। इस बहस में राजनेता, नौकरशाह और सामाजिक कार्यकर्त्ता भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते रहे हैं और जल नियोजन की नीतियों को प्रभावित करते रहे हैं। दिनेश कुमार मिश्र, मेधा पाटकर, भोगेन्द्र झा, रामचन्द्र खाँ आदि ने इस बहस को परस्पर विरोधी आन्दोलन में परिणत कर दिया है। जलाशय-तटबंध बनाओ बनाम इन्हें तोड़ो, नदियों को बाँधो बनाम मुक्त करो, जल को नियोजित करो बनाम जल के साथ जीना सीखो आदि नारों ने आज मिथिलावासियों को न केवल दो खेमों में बाँट दिया है, बल्कि एक न समाप्त होने वाली दुविधा में डाल दिया है। 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध में मिथिला में जल-नियोजन की समस्या और इसके निराकरण के लिए किए गए प्रयत्नों का शोधपरक आलोचनात्मक अध्ययन इस द्विविधा और संशय से मुक्ति से सहायक हो सकता है। प्रस्तुत पुस्तक इस दिशा में एक गम्भीर प्रयास है।


 

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