रंगमंच शब्द अपने में अनेकों आयामों को समेटे हुए है। रूपक के स्वरूप और उसके विविध प्रकारों में होने वाली अथवा की जाने वाली क्रियाओं, स्थल, व्यापारों और तकनीक आदि सभी रंगमंच में समाहित है। 'नाट्य तत्राभिनयं तद्रूपारूपातु रूपकम्' में नाटक की सार्थकता अभिनय के व्यापार बिना संभव नहीं है। और अभिनय का आधार पात्र अथवा चरित्र होता है तथा अभिनय के व्यापार को मंच पर सार्थक बनाने का दायित्व अभिनेता का होता है। अतः यह स्पष्ट है कि अभिनेता पर पात्र द्वारा चरित्र के रूप का आरोपण होता है। इस आरोपित चरित्र के क्रिया कलाप को अभिनेता के द्वारा मंच पर इस प्रकार प्रस्तुत किया जाये कि वह दर्शक को चरित्र के कार्य-व्यापार से भी कहीं अधिक रोचक, आकर्षक और मोहक लगने लगे इसका दायित्व निर्देशक का होता है। निर्देशक न केवल अभिनेता को अभीष्ठ अभिनय का प्रशिक्षण देता है अपितु 'कहाँ?' 'कब?' 'कैसे?' 'क्यों?' अभिनय किया जाये इन सारे प्रश्नों के समाधान की भी व्यवस्था करता है। श्रेष्ठ शक 'कहाँ' की समस्या के समाधान में वह मंच पर अभीष्ठ अवधारणा के अनुसार दृश्य-विधान का संयोजन करता है। 'कब?' का समाधान तब अपेक्षाकृत अधिक जटिल हो जाता है जब एक ओर निर्देशक के समक्ष आज का दर्शक है और दूसरी ओर युग-युग का पुराना पात्र अथवा चरित्र उसकी भाषा, उसकी संस्कृति उसका आचरण है। इन दोनों बिन्दुओं में सामंजस्य स्थापित करना एक प्रतिभावान निर्देशक के बलबूते की ही बात हो सकती है। समसामयिक चरित्रों को मंच पर लाकर उनकी सूक्ष्माति सूक्ष्म गतिविधियों का प्रस्तुतीकरण कराना भी प्रबुद्ध और परिश्रमशील निर्देशक का दायित्व है। रंगमंच पर दृश्य को 'किस प्रकार प्रस्तुत किया जाये यह एक व्यापक आयाम है। इसमें नाट्य की प्राचीन पद्धतियों में 'नांदी पाठ' से लेकर 'भरत वाक्य' के बीच में जितनी तकनीकी प्रविधियाँ प्रयुक्त की जा सकती थीं, की जाती थी। आधुनिक रंगमंच को विज्ञान ने बहुत कुछ सहज और आकर्षक बना दिया है। ध्वनि व्यवस्था, प्रकाश व्यवस्था, दृश्यबंध आदि में विद्युत उपकरणों के प्रयोग ने नैसर्गिकता को प्रस्तुत करने में पर्याप्त मदद की है। दर्शक को वर्षा ऋतु में बिजली की चमक, युद्ध में घोड़ों के टापों की ध्वनि और 'कट-कट-कट-कट गोली बरसै, उन-उन भालन झंकार' भी सुनाई पड़ती है। निर्देशक को इस व्यवस्था में यथार्थ के संपादन का दायित्व भी निभाना पड़ता है। जहाँ तक क्यों के समाधान का प्रश्न है यह अपेक्षाकृत अधिक जटिल है। नायक के दुर्बल चरित्र को भी खलनायक के प्रबल किन्तु जनविरोधी चरित्र के सहारे खड़ा करना, यह सहज कार्य नहीं हैं। इनके पीछे निर्देशक की एक बहुत बड़ी प्रतिभा कार्य करती है। नाटक का आधुनिक रंगमंच प्राचीन रंगमंच की अपेक्षा बहुत कुछ परिवर्तित हो गया है। प्रसाधन, अभिनय एवं प्रस्तुतीकरण के विधानों में पाश्चात्य प्रभाव और वैज्ञानिक विकास के कारण पर्याप्त अन्तर आया है। आज का आधुनिक दर्शक अपने व्यस्त जीवन एवं मनोरंजन के साधनों के बहुतायत के बीच रंगमंच के लिए आकर्षित हो, इसके लिए व्यवस्थापक अनेक योजनाएँ करते हैं। नाट्य प्रदर्शन की समय-सीमा कम करने के साथ अल्पावधि में उन्हें पूर्ण संतुष्ट करने के लिए प्रदर्शन को प्रभावपूर्ण एवं आकर्षक बनाना ही आधुनिक रंगकर्मियों की परीक्षा है, और यही उनका परम लक्ष्य है। प्रसन्नता का विषय है कि डॉ. शोभा त्रिपाठी ने इस पुस्तक 'आधुनिक हिन्दी रंगमंच' के अन्तर्गत रंगमंच की परम्परा रंगमंच पर पाश्चात्य प्रभाव और आधुनिक रंगकर्मियों की परीक्षा है, और यही उनका परम लक्ष्य है। प्रसन्नता का विषय है कि डॉ. शोभा त्रिपाठी ने इस पुस्तक 'आधुनिक हिन्दी रंगमंच' के अन्तर्गत रंगमंच की परम्परा रंगमंच पर पाश्चात्य प्रभाव और आधुनिक रंगमंच के विविध आयामों का स्पष्ट और सुग्राहय निरूपण किया है। ये एक प्रतिभा संपन्न और विदुषी अध्यापिका हैं। बाल्यकाल से ही रंगमंच से इनका घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है। सौभाग्यवश अथवा संयोग वश इनके मातृपक्ष से सम्बन्धित समस्त परिवार किसी न किसी रूप में संगीत, नाटक व अभिनय के माध्यम से रंगमंच से जुड़ा है। रंगमंच के प्रति अनुरक्ति और उसमें गति रति का सामर्थ्य इनको कदाचित वंशानुक्रम से प्राप्त है। इनके उन अनुभवों ने पुस्तक को और समर्थ बनाया है। डॉ. शोभा ने मेरे निर्देशन में रंगमंच विषय पर एक महत्वपूर्ण शोधकार्य भी किया है। मैं इनके परिश्रम और अनुसंधान से संतुष्ट हूँ। मुझे पूर्ण विश्वास है कि रंगमंच के प्रति इनका ये परिश्रम और लगाव इन्हें रंगमंच यात्रा का एक ऊँचा शिखर दिखलायेगा।
डॉ. शोभा त्रिपाठी सम्बोधन : डॉ. शोभा त्रिपाठी, पत्नी श्री. यज्ञमणि त्रिपाठी जन्म तिथि : 01 दिसम्बर, 1969 शिक्षा : स्नातकोत्तर (हिंदी एवं कथक नृत्य) पीएच.डी. (रंगमंच विज्ञान) प्रकाशन : अनेक पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं दर्पण बोले सांच (कविता संकलन) कहत सुनत बन गयी कथा (कहानी संकलन) अंसुवन दुरे मोती (नाटक) आधुनिक कविता के प्रथम पांच चरण (इतिहास दर्शन) चीख नहीं ये... (कविता संकलन) चाँद का शहद (कहानी संकलन) संप्रति : प्रवक्ता (हिंदी) नारी शिक्षा निकेतन पी.जी. कॉलेज, लखनऊ (उ.प्र.)
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