लेखक परिचय
डॉ० शारदा पाठक का जन्म एक संम्भ्रान्त ब्राह्मण परिवार में ग्राम-राजापुर, थाना-चोलापुर, जनपद-वाराणसी, उततर प्रदेश में १ जुलाई, १९४१ को हुआ था। इनके पूज्य पिताजी का नाम स्व० जयनाथ पाठक तथा पूज्यनीया माता का नाम स्व० सरस्वती पाठक था। डॉ० पाठक एक कृषि वैज्ञानिक हैं और भारत सरकार के कृषि मंत्रालय में 'भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद' नई दिल्ली के 'केन्द्रीय पटसन एवं संबंद्ध रेशा अनुसंधान संस्थान' वैरकपुर, पश्चिम बंगाल के निदेशक पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। भारत सरकार की तरफ से कृषि विशेषज्ञ के रूप में कृषि विभाग, ज़ाम्बिया, अफ्रीका में कार्य कर चुके हैं तथा विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय अनुसंधान परियोजनाओं के तहत थाइलैण्ड, इन्डोनेशिया, नेपाल तथा बांग्लादेश आदि देशों का भ्रमण किए हैं। इनके १२५ वैज्ञानिक शोधपत्र तथा १९ पुस्तकें तकनीकी विषयों पर प्रकाशित हैं। सेवानिवृत्त के बाद साम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी से ज्योतिष एवं वास्तुशास्त्र की शिक्षा भी प्राप्त किए हैं। वैज्ञानिक विषयों के अतिरिक्त, इनकी प्रमुख प्रकाशित पुस्तकें निम्नांकित हैं- * सरयूपारीण-ब्राह्मण परिचय। * शकुन विचार। * श्री राम नाम मंत्र के जप का रहस्य। * हिन्दू धर्म में मोक्ष की अवधारणाएँ। प्रस्तुत ग्रंथ 'मृत्यु का रहस्य' लेखक की अगली रचना है।
आभार
सर्वप्रथम मैं उन समस्त आचार्यों, लेखकों के प्रति हृदय से अपना आभार व्यक्त करता हूँ जिनके लेखों आदि की सहायता से इस ग्रंथ की रचना संभव हुई है। प्रसिद्ध चिन्तकों और विचारकों के अतिरिक्त, वाराणसी से प्रकाशित 'टाइम्स ऑफ इण्डिया' तथा 'दैनिक जागरण' में विभिन्न विद्वानों द्वारा समय-समय पर प्रकट किए गए उनके विचारों को भी ग्रंथ में साभार समाहित किया गया है। परम पूज्यनीय माता स्वर्गीया सरस्वती पाठक एवं परम पूज्य पिता स्वर्गीय जयनाथ पाठक आप दोनों का आशीर्वाद सदैव मुझे प्रेरणा प्रदान करता रहा जिससे इस ग्रंथ लेखन का कार्य सम्पन्न हुआ। मेरी धर्मपत्नि श्रीमती सरोज पाठक का अकस्मात् निधन दिनांक १७ जनवरी २०२० को हो गया जिसके फलस्वरूप ग्रंथ लेखन में विलम्ब हुआ। ईश्वर उनकी पवित्र आत्मा को शान्ति प्रदान करें। उनकी पुनीत स्मृति में यह ग्रंथ मैं समर्पित करता हूँ। परिवार के अन्य सदस्यों का ग्रंथ लेखन में सहयोग के लिए मेरा हार्दिक शुभाशीष। ग्रंथ प्रकाशक श्री कुलदीप जैन, भारतीय विद्या संस्थान, वाराणसी का मैं अत्यन्त आभारी हूँ।
प्राक्कथन
मनुष्य के जीवन की दो घटनाएँ प्रमुख एवं सत्य हैं-एक जन्म और दूसरा मृत्यु। कहा जाता है कि जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु निश्चित होती है। जन्म-मृत्यु के साथ ही भारतीय हिन्दू जीवन दर्शन में पुनर्जन्म का सिद्धान्त आदि काल से प्रतिस्थापित किया गया है। यह अवधारणा आत्मा की अमरता पर आधारित है। आत्मा भौतिक शरीर धारण कर जब संसार में आता है तो उसे जन्म कहते हैं और आत्मा जब भौतिक शरीर को छोड़कर दृश्य जगत से अदृश्य जगत में प्रवेश करता है तो उसे मृत्यु कहा जाता है। मृत्यु के बाद वर्तमान जीव का एक-दूसरे नए शरीर में पुनः प्रवेश करना पुनर्जन्म कहलाता है। इस प्रकार आत्मा का जन्म-मृत्यु-पुनर्जन्म की श्रृंखला इस भौतिक जगत में अनवरत चलती रहती है। इन्हीं विषयों को समाहित कर इस ग्रंथ की रचना हुई है। प्रस्तुत ग्रंथ में कुल पाँच अध्याय हैं। अध्याय-१ में मनुष्य के जन्म और उसके जीवन का विवरण है। जीव का गर्भ से बाहर निकलकर पहले पहल अस्तित्व में आना जन्म है। जन्म जीव के जीवन धारण करने की प्राकृतिक क्रिया है। मानव जीवन जीने की प्रक्रिया है, एक विधा है, जीते रहने का नाम है। अध्याय-२ में मानव शरीर का वेदान्त दर्शन के आधार पर त्रि-शरीर सिद्धान्त की व्याख्या है। इसके अतिरिक्त, मनुष्य के शरीर में पंचकोश की संकल्पना का विवरण भी दिया गया है। अध्याय-३ में जन्म-मृत्यु-पुनर्जन्म श्रृंखला की अवधारणा आत्मा की अमरता पर आधारित है। अतः इस अध्याय में आत्मा के स्वरूप, जीवात्मा, आत्मा की शाश्वत प्रकृति आदि विषयों पर चर्चा की गई है।
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