मुक्तिबोध (1917-1964) आधुनिक युग के अकेले 'फुल टाइम' लेखक-सर्जक रहे हैं जिनके लिए साहित्य ही सबकुछ था। उनके लिए साहित्य आत्मसंघर्ष और सामाजिक परिवर्तन का सशक्त माध्यम था। पिछले 50 वर्षों से वे आधुनिक हिन्दी कविता और आलोचना के केन्द्र में हैं। अनेकानेक विवादों और असहमतियों के बावजूद आज मुक्तिबोध न केवल हिन्दी साहित्य के शीर्षस्थ स्थापित सर्जक के रूप में विख्यात हैं बल्कि नये कवियों के लिए प्रतिमानक कवि के रूप में भी बेहद चर्चित हैं। वे हिन्दी साहित्य के अकेले संघर्षरत और गतिशील रचनाकार थे। उनका प्रारम्भिक सृजन छायावाद से प्रभावित होने के बावजूद उसकी समस्त रूमानी, अमूर्त एवं वायावीय सीमाएँ तोड़ता है। परवर्ती काल में उनका सृजन सामाजिक यथार्थ से उनके व्यापक कटु-अनुभवों के समानान्तर जुड़ता है और अपनी अनुभूति को वे मार्क्सवादी समाज-दर्शन से परिपक्व करते हुए नए सृजन-सीमांत और वैयक्तिक-सामाजिक महत्त्व भी प्रदान करते हैं। इस क्रम में उनके रचनात्मक औदात्य, भोगे हुए त्रासद अनुभव और आधुनिक कटु सौन्दर्याभिरुचि के साथ-साथ उनकी प्रगतिशील मार्क्सवादी दृष्टि को भी सहज ही रेखांकित किया जा सकता है। उनकी प्रयोगवादी कविताओं में एक प्रकार के जटिल बौद्धिक व्यक्तिवाद और मानसिक घात-प्रतिघातों का विलक्षण संयोजन विद्यमान है।
छबिल कुमार मेहेर 18.06.1973 को ओड़िशा, जिला-बरगढ़ के लाउमुण्डा गाँव के एक संयुक्त मध्यवर्गीय परिवार में जन्म। ओड़िआ भाषा के कवि-रचनाकार पिता का संस्कार बचपन का स्कूल बना। बी.ए. तक की पढ़ाई बनजारेपन और पेण्टिंग की रुचियों के बीच सम्पन्न हुई। हिन्दी साहित्य में एम.ए., अनुवाद में स्नातकोत्तर डिप्लोमा, तुलनात्मक भाषाविज्ञान में एम.फिल. और हिन्दी विषय में नेट, पी-एच.डी. जैसी अकादमीय एवं योग्यता प्रदायी उपाधियों। पिछले दो दशकों से अनुवाद- आलोचना-सम्पादन में सक्रिय । कई चर्चित ओड़िआ कहानियों का हिन्दी में अनुबाद। अब तक 15 आलोचना और 40 सम्पादित पुस्तकें प्रकाशित । विभिन पत्र-पत्रिकाओं में 50 से अधिक आलेख प्रकाशित। मॉरीशस में आयोजित 11वें विश्व हिन्दी सम्मेलन (2018) में प्रतिभागिता। श्री मेहेर डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर, मध्य प्रदेश से प्रकाशित राजभाषा उन्नयन की वार्षिक पत्रिका 'भाषा भारती' के सम्पादक व द्विभाषी शोध-पत्रिका 'मध्य भारती' के प्रबन्ध सम्पादक भी रहें हैं। डॉ. मेहेर वर्तमान में राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय के अधीन उत्तरी क्षेत्र-2, गाजियाबाद में उप निदेशक (कार्या.) के पद पर कार्यरत हैं। सम्मान हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग का 'सम्मेलन सम्मान' (2010) एवं म.प्र. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, भोपाल का 'हिन्दीतर भाषी हिन्दी सेवी सम्मान' (2018)। 'आलोचना का स्वदेश' पुस्तक को केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय, भारत सरकार का 'हिन्दीतर भाषी हिन्दी लेखक पुरस्कार' (2017)। हिन्दी में उत्कृष्ट रचनात्मक लेखन हेतु मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग की ओर से वर्ष 2017-18 का प्रतिष्ठित 'हिन्दी भाषा-हिन्दी सेवा सम्मान'।
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