मानव के जीवन का विकास भविष्यत में छिपा है परन्तु इस विकास का बीज-मूल तो मानव के अपने भूत में बीजा जाता है। आज का गायक, वादक, नर्तक या कोई भी कलाकार अपने बीते हुए बचपन में ही अपनी भावी कला का बीज एवं संस्कार विशेष ले चुका होता है। नदी किनारे के गांव में जन्म हुआ। बचपन भी वहीं बीता। दिनचर्या ही नदी के किनारे से प्रारम्भ होती थी। शौच, स्नान, ध्यान से कार्य आरम्भ होता। बाल्यावस्था थी, बाल-सुलम खेल-कूद भी वहीं नदी के किनारे होता। नदी की गीली, रेतीली मिट्टी हाथ में उठाते, नीचे टपकाते। कुछ आकृति अपने आप बनती। कुछ समय बाद कल्पना शक्ति ने काम करना प्रारम्भ कर दिया। हमारे गांव से पहाड़ दिखाई पड़ते हैं। उस प्राकृतिक दृश्य का वातावरण भी प्रभावी हुआ जिसके परिणामस्वरूप वह गीली मिट्टी से बनने वाला आकार कुछ-कुछ हमारी इच्छानुरूप आकार लेने लगा और यहीं से संभवतः अज्ञात रूप से, मन की गहराई में कला का बीज पैठ गया।
घर में माता जी के साथ घर के काम में सहायता करते। कच्चा घर होने के कारण माता जी मिट्टी में तूडी, भूसा मिलाकर गारा तैयार करती थी। फिर घर की लिपाई-पुताई होती। इसी तैयार मिट्टी से अनाज को सुरक्षित रखने को कोठी बनाती। कोठी के ऊपर खड़िया और गेरूं की सहायता से आलेखन चित्र कर्म होता। पशु-पक्षियों आदि की आकृतियां मिट्टी की मोटी सतह उभारकर बनाई जातीं फिर रंग किये जाते और गृह के आवश्यक साधन चूल्हा, चक्की की मण आदि बनाया जाता। इस सारे कार्य को हम बड़े कुतूहल से देखते तथा माता जी का हाथ बंटाते। हम में शिल्प कला एवं चित्रकला के बीज अंकुरण का प्रारम्भिक विकास यहां हुआ।
घर में होने वाले तीज-त्यौहार, सांझी, अहोई आदि तथा विवाह आदि उत्सवों के समय विविध रंगों से घर को कुछ धार्मिक प्रतीक चिन्ह एवं फूल-पत्तियों के आलेख चित्रण से सजाया जाता था। यहां हमारी कला का और विकास हुआ। कलाकारिता का संस्कार दृढ़ हुआ। पूज्य पिता जी का व्यवसाय तो चूड़ियों का था परन्तु उनमें सौन्दर्य बोध बहुत तीव्र था। इसका प्रमाण यह था कि वे स्वयं मिट्टी तैयार करते। उससे चिलम बनाते। क्योंकि वे हुक्का एवं चिलम पीने के शौकीन थे। जब चिलम की गीली मिट्टी में काना डाल कर उसको आकार देते कुछ सूख जाती तब उस पर चाकू की नोंक से कलापूर्ण नक्काशी करते। फिर काना निकालने के बाद उसे छाया में सुखाते तथा कुम्हार को देकर पकवाते। फिर अपने इष्टमित्रों को उपहार के रूप में देते। हमारे पिता जी का यह व्यवसाय भी नहीं था और मिट्टी की चिलम भी बाजार में दुर्लभ नहीं थी। मूल्य भी बहुत कम ही होता था। इतने पर भी उनका यह काम स्वयं करने के पीछे मूल कारण उनका कला प्रेम एवं तीखा सौन्दर्यबोध ही था। पिता जी का गुण, पुत्र में कैसे न आता। वह आया। यह वातावरण लेखक के मन-बुद्धि पर पूर्ण रूप से छाया रहा। कालक्रम में शिक्षा ग्रहण करते हुए मैट्रिक पास कर गया। जहां ड्राईंग में विशेष योग्यता प्राप्त हुई।
घर व माता-पिता के अनन्तर गुरुओं का योगदान महत्त्व रखता है। नाहन में कला महाविद्यालय के प्रधानाचार्य ने कला क्षेत्र के पंचवर्षीय डिप्लोमा (व्यवसाय कला) में मुझे प्रवेश दिया तथा छात्रवृत्ति प्रदान कर के आर्थिक सहायता एवं प्रोत्साहन भी दिया। अभी प्रशिक्षण पूर्ण हुआ ही था कि हरियाणा लोक सेवा संघ, चण्डीगढ़ के माध्यम से राजकीय शिक्षण महाविद्यालय, कुरुक्षेत्र में कला अध्यापक के पद पर नियुक्ति हो गई। यह 1967 का वर्ष था। अध्यापन के साथ-साथ स्वाध्याय भी चलता रहा। फलतः 1987 में चित्र कला विषय में एम. ए. की उपाधि प्राप्त हो गई।
25 वर्षों से भी अधिक विश्वविद्यालय शिक्षण महाविद्यालय में ललित कला का प्राध्यापक होने के नाते सदैव ही एक जिज्ञासा बनी रही कि इस भू-भाग के भित्तिचित्रों का प्रकार, पद्धति, शैली आदि कैसी होगी। इनको लेखन प्रबन्ध के रूप में प्रस्तुत करना परम कर्तव्य भी समझा क्योंकि पर्याप्त प्रयास करने पर भी इस भू-भाग की (कला एवं संस्कृति) चित्रकला पर इससे पहले कोई लेखन रूप में सामग्री उपलब्ध नहीं हुई। यह जानकर अति आश्चर्य हुआ कि इतनी अधिक बिखरी हुई अज्ञात, अमूल्य एवं कलात्मक महत्त्व की कलाकृतियां अभी तक कलाविदों व कला अन्वेषकों की दृष्टि से कैसे ओझल रहीं ? इसलिए यह लेखन कार्य करना और भी आवश्यक हो गया। समय व जलवायु की क्रूरता के प्रभाव से ये भित्तिचित्रों की अज्ञात अमूल्य निधि दिन-प्रतिदिन लुप्त एवं नष्ट होती जा रही थीं। इसलिए शीघ्रातिशीघ्घ्र इस अमूल्य, धरोहर को प्रकाश में लाने एवं कला-विद्वानों और कला-प्रेमियों का ध्यान इस ओर आकर्षित करने, जो इसके सही मूल्य को आंक सकें। ऐसे अमूल्य, अज्ञात भित्तिचित्रों को, जो इस भू-भाग के इतिहास, संस्कृति एवं कलात्मक थाती को अपने में संजोये समेटे हुए हैं, को अपने लेखन का विषय बनाया।
जीवन का महत्त्वपूर्ण समय कला-शिक्षण के साथ-साथ यहां के महत्त्वपूर्ण स्थलों को समीप से देखने में गुजरा, जहां पर भारतीय चित्रण परम्परा के, यहां की पुरानी हवेलियों, मन्दिरों, चौपालों, स्नानागारों (सदरी) एवं कुएं की छतरियों आदि की भित्तियों पर भित्तिचित्रण परम्परा के उत्कृष्ट उदाहरण देखने को मिले। और इसी सतत् प्रेरणा से इन अज्ञात भित्तिचित्रों का कोष अन्धकार से प्रकाश में लाया गया। और पी.एच.डी. की उपाधि और इसी विषय पर मेरठ विश्वविद्यालय मेरठ से पी.एच.डी. की उपाधि सन् मार्च, 1994 में प्राप्त की।
प्रायः ऐसा देखा गया है कि कुछ लेखक कला विषयक अध्यायों के विषय से संबधित छाया चित्र व अन्य दृश्य सम्बन्धी सामग्री, पुस्तक के अन्त में संलग्न करते हैं जो लिखित तथा दृश्य सामग्री शोध में एक प्रकार का बिखराव का आभास कराते हैं। हमने अध्यायों में विषय एवं चित्र सामग्री अध्याय के तुरन्त बाद ही संलग्न की है।
Hindu (हिंदू धर्म) (13585)
Tantra (तन्त्र) (1008)
Vedas (वेद) (731)
Ayurveda (आयुर्वेद) (2086)
Chaukhamba | चौखंबा (3186)
Jyotish (ज्योतिष) (1557)
Yoga (योग) (1164)
Ramayana (रामायण) (1338)
Gita Press (गीता प्रेस) (724)
Sahitya (साहित्य) (24688)
History (इतिहास) (9003)
Philosophy (दर्शन) (3628)
Santvani (सन्त वाणी) (2623)
Vedanta (वेदांत) (116)
Send as free online greeting card
Email a Friend
Visual Search
Manage Wishlist