नेपाल में हिन्दी "हिन्दी का सुंदर देशों में प्रचार अंग्रेजी की तरह औपनिवेशिक साम्राज्यवाद के कारण नहीं हुआ है; बल्कि सर्वहारा, शोषित जनसाधारण की अपनी आवश्यकता और सांस्कृतिक समन्वय की विरासत के कारण हुआ है। भारत में जो मुट्ठी भर सामन्ती वर्ग अंग्रेजी का समर्थन और हिन्दी का विरोध करता है, उसके पीछे उनका गरीब साधारण जनता पर अपना प्रभुत्व कायम रखने का निहित स्वार्थ काम कर रहा है। यही हाल नेपाल में अब आकर हिन्दी को विदेशी भाषा बतानेवाले निहित स्वार्थवाले राजनीतिको और कुछ उच्च्च पदाधिकारियों का है। वे तराई और पहाड़ की इस सर्वप्रचलित सम्पर्क भाषा को सामान्य जनता के राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास का द्रुत माध्यम बन जाने के भय से पीडति हैं। अतः हिन्दी को नेपाल की राष्ट्रीय भाषा की मान्यता देने से भी घबड़ाते हैं।
प्रोफेसर डॉ. कृष्णवन्द्र मिश्र (जन्म: ३०-अप्रैल-१९३५, स्वर्गारोहणः १०-जून-१९९६), (एम.ए. संस्कृत, हिन्दी), साहित्याचार्य, पी-एच.डी.) लम्बे समय से नेपाल में हिन्दी एवं संस्कृत शिक्षण तथा अनुसन्धान से सम्बद्ध रहे हैं। डा. मिश्र का लेखन भाषा तथा साहित्य के अतिरिक्त संस्कृक्ति तथा इतिहास के अनेक पक्षों से जुड़ा है। नेपाल तथा भारत की अनेक प्रतिष्ठित शोध पत्रिकाओं में हिन्दी, अंग्रेजी तथा नेपाली में आपके पचास से अधिक आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। आप पिछले बीस वर्षों से नेपाल के त्रिभुवन विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के प्रमुख पद पर कार्यरत रहे हैं। आपने पेकिंग (चीन) में भी हिन्दी का अध्यापन कार्य किया है। 'नेपाल में हिन्दी के सम्बन्ध में आपका लेखन अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित हुआ है। आपकी प्रकाशित कृतियाँ हैं-'ट्राइब्स इन दि महाभारत', 'जनकपुर प्रोफाइल', 'नेपाल की भाषा-समस्या' तथा 'नेपाल में हिन्दी'
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