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पाकिस्तान जिन्ना से जेहाद तक- Pakistan: From Jinnah to Jihad

$33
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Specifications
Publisher: Prabhat Prakashan, Delhi
Author S. K. Dutta, Dr. Rajeev Sharma
Language: Hindi
Pages: 319
Cover: PAPERBACK
8.5x5.5 inch
Weight 300 gm
Edition: 2025
ISBN: 9789386231864
HCD269
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Book Description
पुस्तक परिचय
जिन्ना ने कभी भी 'जेहाद' शब्द का इस्तेमाल नहीं किया- उनके अनुयायियों ने किया परंतु उन्होंने ऐसी राजनीति को बढ़ावा दिया, जिसे प्रचलित परिदृश्य में 'जेहाद' का नाम दिया जा सकता है। अगस्त 1946 के उनके सीधी काररवाई कार्यक्रम ने उनके अंदर स्थित 'जेहादी' को उभारा। कई रूपों में जिन्ना भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे प्रमुख 'जेहादी' थे। उनकी द्विराष्ट्र संबंधी राजनीति की अवधारणा ने उन्हें अकेले दम पर मुसलिम राष्ट्र पाकिस्तान का निर्माण करने में मदद दी। इस प्रक्रिया में उन्होंने उससे अधिक मुसलमान भारत में छोड़ दिए, जितने पाकिस्तान में हैं। नए राष्ट्र ने अपने निर्माता के व्यक्तित्व की विशेषता- भारतीयों के लिए अविश्वास को ग्रहण किया, जो धीरे-धीरे भारत के लिए घृणा में बदलती गई। जिन्ना के बाद पाकिस्तान ने उनको विरासत को आगे बढ़ाया। जुल्फिकार अली भुट्टो ने भारत के साथ हजार वर्षों तक युद्ध करने की इच्छा जाहिर की तो जिया-उल-हक ने राजीव गांधी से कहा कि उनके देश के पास भी परमाणु बम है। अब स्वनिर्वाचित कमांडो राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ कश्मीर के घिसे हुए रिकॉर्ड को दुहरा रहे हैं और भारत को बम से डरा रहे हैं। मुशर्रफ धीरे-धीरे, लेकिन दृढता से उसमें योगदान कर रहे हैं, जो पाकिस्तान के निर्माण के बाद सबसे बड़ा खतरा रहा है- यानी सभ्यताओं के टकराव । अपने विषय का गहन अध्ययन करके लिखी गई यह शोधपरक पुस्तक 'पाकिस्तान जिन्ना से जेहाद तक' समकालीन स्थितियों का विश्लेषण करती है और भावी रणनीतिक परिदृश्य पर बड़ी सूक्ष्मता से दृष्टि-निक्षेप करते हुए अनेक अव्यक्त-अनजाने पहलुओं, घटनाओं और रहस्यों को उजागर करती है।

लेखक परिचय-1
सेवानिवृत आई. पी.एस. अधिकारी श्री एस. के. दत्ता केंद्रीय जाँच ब्यूरो के पूर्व निदेशक हैं, जहाँ उन्होंने चौदह वर्षों से अधिक समय तक अपनी सेवाएँ दीं। सी.बी.आई. से उनकी लंबी संबद्धता ने उन्हें जटिल मामलों, जैसे- राजीव गांधी हत्याकांड, सुरक्षा घोटालों, बैंक घोटालों और आतंकवादी मामलों की छानबीन का विस्तृत अनुभव दिया। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद, भूमिगत बैंकिंग (हवाला), नशीले पदार्थों के व्यापार और संगठित अपराध पर विभिन्न अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद, भूमिगत बैंकिंग (हवाला), नशीले पदार्थों के व्यापार और संगठित अपराध पर विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शोधपत्र प्रस्तुत किए हैं। वे नशीले पदार्थों के व्यापार पर संयुक्त राष्ट्र ऑब्जर्वर ग्रुप के सदस्य थे, जिसके लिए वे ऑस्ट्रेलिया, थाईलैंड, हांगकांग तथा सिंगापुर गए। सेवानिवृत्ति के पश्चात् वह पाकिस्तान, अफगानिस्तान और भारत की सुरक्षा चिंताओं पर गहन अध्ययन में व्यस्त रहे हैं। वर्तमान पुस्तक पाकिस्तान पर उनके तीन वर्षीय शोध का परिणाम है। वह समाचार पत्रों में समय-समय पर लेख आदि लिखते रहे हैं।

लेखक परिचय-2
राजीव शर्मा सन् 1982 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं और संप्रति 'द ट्रिब्यून' के विशेष संवाददाता हैं। उन्होंने आंतरिक सुरक्षा और रक्षा मामलों में विशेषज्ञता प्राप्त की है। यह उनके द्वारा लिखी पाँचवीं पुस्तक है। उनकी पहली पुस्तक एक हिंदी उपन्यास' धूप और कोहरा' थी, जो सन् 1983 में प्रकाशित हुई। उनकी तीन अन्य पुस्तकें 'बियॉण्ड द टाइगर्स: ट्रैकिंग राजीव गांधीज एसेसिनेशन' (1998), 'पाक प्रॉक्सी वार: ए स्टोरी ऑफ आई. एस. आई. 'बिन लादेन एंड करगिल' (1999) और 'द पाकिस्तान ट्रैप' (2001) भारत तथा विदेशों में काफी चर्चित हुई।

आमुख
12 जनवरी, 2002 को दिए गए अपने ऐतिहासिक भाषण में जनरल परवेज मुशर्रफ ने घोषणा की कि कश्मीर पाकिस्तानियों के खून में है। हालांकि यह अच्छी भाषण-कला का उदाहरण हो सकता है, परंतु तथ्य सर्वथा भिन्न हैं। वास्तव में सिंध और बलूचिस्तान के पाकिस्तानी लोग कश्मीर के मामले में उतने ही उदासीन हैं जितना दक्षिण भारतीय वन दस्यु वीरप्पन अमेरिकी घटनाओं पर होगा। जिन्ना से लेकर मुशर्रफ तक सभी पाकिस्तानी शासक निरंतर यह समझने में असमर्थ रहे हैं कि पाकिस्तान भारतीयों, विशेषकर उत्तर भारतीयों, के खून में दौड़ता है। क्या यह बात भारत सरकार को पाकिस्तान में वह सब करने की अनुमति देती है, जो पाकिस्तान पंजाब, जम्मू-कश्मीर और भारत के अन्य भागों में करता रहा है? निश्चित रूप से नहीं। और यदि कभी भारत सरकार ने यह निर्णय कर लिया कि पाकिस्तान को उसकी भाषा में ही जवाब देना है, तो पाकिस्तान के लिए अपना अस्तित्व बचाना बहुत ही कठिन हो जाएगा। भारत दो दशकों से पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित सीमा-पार आतंकवाद के हमलों को झेलता आ रहा है। यदि भारत पाकिस्तान के नीति-निर्माताओं को उनकी ही दवाओं का स्वाद चखा दे तो पाकिस्तान चूर-चूर हो जाएगा। किसी राष्ट्र की बुनियाद ही जब नफरत पर रखी गई हो तो उसे ऐसे परिपक्व राजनीतिज्ञों की आवश्यकता होती है, जो अगली पीढ़ी के बारे में सोचें, न कि क्षीण दृष्टिवाले राजनेताओं की, जो केवल अगले चुनाव के बारे में सोचते हैं। यह पाकिस्तान का दुर्भाग्य है कि वहाँ हमेशा सत्तालोलुप राजनीतिज्ञों और जनरलों का गठजोड़ देखने को मिलता है, जो देश की सेवा से अधिक सत्ता में अपना स्थान स्थायी बनाने में रुचि रखते हैं।

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