डॉक्टर रामप्रकाश जी रसायन विज्ञान के एक अच्छे विशेषज्ञ हैं। उन्होंने छोटी-सी आयु में बहुत प्रसिद्धि तथा यश प्राप्त कर लिया है। यह बात और भी चकित करती है कि अपने विषय के प्रसारण तथा अनुसन्धान में निरन्तर परिश्रम करते रहने पर भी वह समाज सेवा, वैदिक संस्कृति के प्रचार, ऋषि दयानन्द के मिशन की पूर्ति का कार्य तथा अनेक सम्बन्धित कार्यों में सदैव जुटे रहते हैं। बहुत ऊँचे वक्ता व लेखनी के धनी हैं। मंच पर बोल रहे हों अथवा कुछ लिख रहे हों तो जादूगर की न्याईं लोगों को आकर्षित करते चलते हैं। तर्क तथा विद्वत्ता कभी उनका साथ नहीं छोड़ती। मेरा अनुमान है कि अखण्ड ईश्वर-प्रेम तथा धर्म में अगाध निष्ठा उनके जीवन की सर्वतोमुखी सफलता के कारण हैं। राष्ट्र को ऐसे महान् कार्यकर्त्ता पर गर्व है। आर्यसमाज, आर्यवीर दल तथा अन्य युवक शक्ति के तो वे प्राण ही हैं।
पूज्य स्वामी श्रद्धानन्द जी महाराज का लिखा आर्यवीर पण्डित लेखराम जी का जीवन-चरित पढ़कर मुझे लगा कि पूज्य स्वामीजी ने अपने कार्य को क्रियात्मक रूप से सिद्ध कर दिया। वे आर्यवीर लेखराम के जीवन-चरित में जब लिख चुके कि किस प्रकार एक यवन ने उनको सत्यभाषण करने पर छुरा घोंप दिया तो उसके मुद्रण के कुछ वर्षों पश्चात् पूज्य स्वामी जी को भी एक यवन ने पिस्तौल से बलि वेदी पर चढ़ा दिया। इससे सुन्दर वीर लेखराम का जीवन-चरित किसने लिखा होगा ?
डॉक्टर रामप्रकाश जी के सम्बन्ध में जो शब्द ऊपर लिखे हैं, उनका प्रयोजन भी यही है कि पण्डित गुरुदत्त का जीवन-चरित वही व्यक्ति उचित ढंग से लिख सकता है जो योग्यता तथा निष्ठा में पण्डित गुरुदत्त जी का उत्तराधिकारी हो। डॉक्टर रामप्रकाश जी का लिखा पण्डित गुरुदत्त जी का जीवन-चरित इस बात का मुँह बोलता प्रमाण है।
मैं सदैव आर्यसमाज को धार्मिक, राजनीतिक तथा सामाजिक क्षेत्रों का क्रान्तिकारी आन्दोलन ही मानता चला आया हूँ। यह ठोस धारणा मेरे जीवन का अंग बन गई है। उन लोगों को जो आर्यसमाज को केवल मात्र एक संस्था मानते हैं, मैं पूर्वगामी समझता हूँ। विद्यार्थी जीवन में मैंने अपनी धारणा को जबरदस्त वेग से चलाया।
कली मुस्काई और फूल बन गई। डाल मस्ती में झूम उठी। पुष्प ने धरती से, जल से, वायु से, सूर्य से ... जीवन लिया, शक्ति ली। उसे जो चाहिए था वह उसने विश्वपति के पुण्य उद्यान में सर्वत्र बिखरी सम्पदा से जी भर कर लिया। फिर उसने अपनी मधुर मुस्कान से धरा को मुखरित किया, अपना सौरभ लुटाया, अपने रंग रूप से प्रकृति को सौंदर्य प्रदान किया। समय बीता। वह मुरझा गया। पंखुड़ियाँ धूल में मिल गईं। वह रूप, वह रंग, वह गंध ... कुछ भी न रहा। पर उसे इसका कोई दुःख नहीं, कोई पीड़ा नहीं, कोई व्यथा-वेदना नहीं। उसका जीवन चक्र पूरा हो चुका; जो लेना था, ले लिया, जो देना था, दे दिया। कोई सपना अधूरा न रहा। फिर दुःख कैसा ?
पर एक कली ऐसी कली जो खिलने से पूर्व तोड़ दी गई, मसली गई, मिट गई, मिट्टी हो गई न अभी जीवन ले पाई, न जीवन दे पाई। कितनी आशाएँ थीं उससे ! सब धरी रह गईं। माली से पूछो उसके दिल पर क्या बीती ? पण्डित गुरुदत्त विद्यार्थी उस कली की भाँति थे जो खिलने से पूर्व मुरझा गई। रजत श्वेत एवं शीतल ओस की भाँति वह संतप्त धरा की प्यास बुझाने आए, पर क्षण में ओझल हो गए। अमावस्या की घोर निशा में प्रकाश-पुंज बनकर आए पर कब उदय हुए, कब चमके, कब छिप गए-पता ही न चला। इतना छोटा था उनका जीवनकाल। लोग देखते रह गए। यह धरती उन्हें रहने के योग्य नहीं जँची थी क्या ?
महत्त्व अवधि का नहीं, दिव्यता का है। दिव्य गुणों के कारण उनका यह छोटा-सा जीवन प्रेरणा का अविरल स्रोत है। वे गुणों के भण्डार थे।
वे थे एक पितृभक्त पुत्र, सहृदय सखा, कुशल खिलाड़ी, सक्रिय छात्र नेता, धुन के धनी, अदम्य उत्साह की मूर्ति, विस्मयोत्पादक स्मरणशक्ति एवं प्रतिभा के स्वामी, अपरिमित ज्ञान के भंडार, विद्यावारिधि, मनमोहक कवि, योग्य लेखक, गम्भीर दार्शनिक, उत्कृष्ट वैज्ञानिक, कुशल सम्पादक, सफल अध्यापक, सुलझे हुए शिक्षा-शास्त्री, ओजस्वी वक्ता, तपस्वी प्रचारक, प्रबल सुधारक, दूरदर्शी नेता, स्वाभिमानी देशभक्त, सच्चे योगी, तपोनिष्ठ मुनि, वेद-शास्त्रों के मर्मज्ञ, समर्पित सत्यान्वेषक, परम ऋषिभक्त, ईश्वरानुरागी...। इन्हीं गुणों के कारण जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में वे अमिट छाप छोड़ गए।
पण्डित जी में ये गुण किस प्रकार विकसित हुए, इसकी भी एक कहानी है। जब पण्डित जी ने ऋषि दयानन्द सरस्वती को इहलीला संवरण करते देखा तो उन पर एक जादू-सा हो गया। वे जितना जितना ऋषि को समझते गए, उतना ही रंग गहरा होता चला गया। बस, इसी रंग का प्रभाव था कि एक बार पण्डित जी ने दो कपड़ों पर आर्यसमाज के पाँच-पाँच नियम लिखवा लिए। प्रातः काल जलपान किया। फिर एक कपड़ा आगे लटका लिया, दूसरा पीठ से बाँध लिया और चलने लगे ऋषि सन्देश सुनाने के लिए। देवी ने देखा तो विस्मित हो गई। हाथ पकड़ बोली "पतिदेव ! यह क्या हाल बनाया है? क्या कहेंगे लोग?" उत्तर मिला "भोली ! तू नहीं जानती। अब यह जीवन मेरा नहीं रहा। मैं इसे ऋषि के चरणों में अर्पित कर आया हूँ। अब रोम-रोम उनकी धरोहर है, देवी।
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