व्यक्त वचन के लिए महावैयाकरण शिक्षाशास्त्री भाषावैज्ञानिक पाणिनि मुनि ने 'भाष्' धातु का प्रयोग किया है- "भाष व्यक्तयायां वाचि" (धातु-पाठ)। इस भाष् धातु से ही 'भाषा' शब्द व्युत्पन्न हुआ है। यह मानव-समाज में विचार-विनमय के लिए महत्त्वपूर्ण सर्वोत्तम सफल साधन है। संसार में अनेक मानव समाज है जिनकी विविध भाषाएँ हैं। भाषा का ध्वनि रूप प्रधान है तथा लिखित रूप गौण है। ऋग्वेद में लिखा है कि देवी वाणी की उत्पति देवों ने की। उस विश्व रूपा वाणी को प्राणी बोलते हैं-
"देवी वाचमजयन्त देवाः। तां विश्वरूपां पशवो वदन्ति ।। "ऋग्वेग.
काव्यादर्श में आचार्य दण्डिन् ने लिखा है कि दैवीवाक् संस्कृत का महर्षियों ने अन्वाख्यान कियाः "संस्कृतं नाम दैवीवाक्गन्वाख्याता महर्षिभिः। वेदों की रचना संस्कृत भाषा में हुई। उसे वैदिक संस्कृत भाषा के नाम से अभिहित किया गया। वैदिक संस्कृत के साथ लोक-व्यवहार में भी यह भाषा प्रचलित थी। पाणिनि ने अपने समय में व्यवहृत संस्कृत भाषा का संस्कार किया। यह संस्कार कृत भाषा संस्कृत भाषा के नाम से प्रचलित हुई। कुछ लोग प्राकृत को ही जनभाषा कहते हैं और वही मूल भाषा हैं। लेकिन पाणिनि ने अपनी अष्टांध यायी में वैदिक संस्कृत और लौकिक संस्कृत का तुलनात्मक वर्णन कर सिद्ध कर दिया कि विविध क्षेत्रों में इसके स्वरूप में भी कुछ भेद था। उन्होंने वैयक्तिक एवं क्षेत्रीय भेद को प्रदर्शित कर इस भाषा की सजीवता प्रमाणित की। साथ ही इस भाषा के स्वरूप को शाश्वत एवं चिरन्तन बनाये रखने के लिए व्याकरण के नियमों में इसे बाँध दिया। फलतः आज भी इसका मूलरूप सुरक्षित है।
अष्टाध्यायी में उन्होंने प्रौढ़ भाषावैज्ञानिक शिक्षाशास्त्री होने के नाते शिक्षार्थियों को सरल सुग्राह्य एवं बोधगम्य शैली में संस्कृत भाषा के साथ-साथ भारतीय संस्कृति की परम्परागत शिक्षा प्रदान की। आज भी उनकी बतायी हुई वैज्ञानिक शिक्षण-विधि विद्वत् समाज में प्रचलित है। साधारण प्रारम्भिक विद्यार्थी से लेकर चूड़ान्त विद्वान् के लिए उनकी संस्कृत भाषा-शिक्षण-विधि ग्राह्य एवं अनुकरणीय है। सम्पूर्ण विश्व के भाषाविद् इनके भाषा-शास्त्र एवं शिक्षण-विधि की मुक्तकंठ से भूरी-भूरी प्रशंसा कर रहे हैं। संस्कृत में किसी भी भाषा का व्याकरण इनकी अष्टाध्यायी की समता करने में अक्षम है। पच्चीस सौ वर्षों के बाद भी इस भाषा और व्याकरण का स्वरूप अक्षुण्ण है।
मानवीय विकास के लिए भाषा की शिक्षा महत्त्वपूर्ण सफल साधन माना गया है। सामान्यतः भाषा के निम्नलिखित् रूप होते हैं- मूलभाषा, मातृभाषा, क्षेत्रीय भाषा, राज-भाषा, राष्ट्रभाषा, विदेशी भाषा, सांस्कृतिक भाषा, बोली (उपभाषा), उच्चरित भाषा तथा लिखित भाषा। इनमें मातृभाषा सबसे अधिक प्रबल एवं प्रभावशाली होती है। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव व्यक्ति की मूल प्रकृति एवं पालन-पोषण पर पड़ता है। इसके बाद प्रादेशिक भाषा का स्थान है। अपने सामाजिक, वाणिज्यिक, प्रशासनिक तथा राजनैतिक उपयोगिता के लिए राष्ट्रभाषा का महत्त्वपूर्ण स्थान है। तदनन्तर सम्पूर्ण देश की सांस्कृतिक व्यवस्था से सम्बद्ध भाषा का स्थान है। इस सांस्कृतिक भाषा का औययन एवं आँयापन सांस्कृतिक प्रगति के लिए अनिवार्य है।
भारत के संविधान में मान्यता प्राप्त निम्नलिखित चौदह भाषाएँ हैं:-संस्कृत, कश्मीरी, पंजाबी, हिन्दी, उर्दू, बंगाली, आसामी, उड़िया, मराठी, गुजराती, तामिल, तेलगु, मल्यालम और कन्नड़। इनमें से संस्कृत को छोड़कर सभी भाषाएँ आधुनिक भारतीय भाषाएँ हैं। ये सभी अपने-अपने राज्य में बोली जाती हैं और राज्य भाषा कही जाती हैं। हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा मानी गयी है। संस्कृत देश की सांस्कृतिक भाषा है। शिक्षा के क्षेत्र में राज्यभाषाओं में से कोई 'एक, राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी तथा सांस्कृतिक भाषा के रूप में संस्कृत का समुचित स्थान है। अग्रेजी का एक प्रमुख अन्तर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में और वर्तमान राजकीय भाषा के रूप में स्थान है।
संस्कृत भाषा भारोपीय भाषा-परिवार से सम्बन्धित है। यही परिवार प्राचीन आर्यों की मौलिक भाषा थे। भाषा और संस्कृति का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध 1 है। ये दोनों भाषाविज्ञान की सीमारेखा पर अवस्थित हैं। ये दोनों ही मानव-अभिव्यक्ति के दो रूप हैं। संस्कृति को समझे बिना भाषा का अध्ययन एकांगी और अधूरा है। सांस्कृतिक परिवेश के परिचय के बिना भाषा के सही अर्थ को नहीं समझा जा सकता है। भाषा की एकसूत्रता का पर्याय समाजिक एकसूत्रता है।
उत्तरी भारत की सभी भाषाएँ विकास-प्रक्रिया द्वारा संस्कृत से उत्पन्न हुईं अर्थात् संस्कृत से प्राकृत और प्राकृत से आधुनिक भारतीय भाषाएँ उत्पन्न हुईं। यद्यपि दक्षिण भारत की द्रावड़ी भाषाएँ द्रावड़ कुल से सम्बन्ध रखती हैं, फिर भी ये सभी भाषाएँ संस्कृत भाषा से काफी प्रभावित हैं। इन भाषाओं ने पच्चीस से चालिस प्रतिशत संस्कृत के शब्दों को अपनी भाषा में आत्मसात कर लिया है। इस परिवार की सभी भाषाओं का साहित्य संस्कृत विचार-धारा एवं अभिव्यक्ति द्वारा समृद्ध और सशक्त किया गया है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि सभी आधुनिक भारतीय भाषाएँ संस्कृत से उत्पन्न और समृद्ध की गयी हैं। संस्कृत समस्त भाषाओं के बीच एकता और तारतम्य स्थापित करती है।
भारतीय धर्म, दर्शन तथा संस्कृति की भाषा के रूप में बौद्धिक भाषात्मक, आध्यात्मिक तथा कलात्मक निष्पति के हितार्थ प्रेरणा की स्थायी एवं गतिशील धारा के रूप में संस्कृत भाषां का महत्त्व अवर्णनीय है। अमेरिकी प्रोफेसर लिडविक स्टरनबैक ने कहा कि संस्कृत साहित्य भारतीय संस्कृति का न केवल प्रतीक मात्र है अपितु सारे संसार की एक अक्षय निधि है।
वास्तव में संस्कृत भाषा हमारे शब्द-भाण्डार को संमृद्ध करती है और अभिव्यक्ति एवं वाग्विदग्धता को उत्कृष्ट तथा विलक्षण बनाती है। आधुनिक भारतीय भाषाओं की अभिनव अभिव्यक्ति एवं शब्दावली के लिए संस्कृत बहुत बड़ा स्त्रोत है। यह नूतन रचना स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद परमावश्यक बन गयी है। अपनी प्रादेशिक भाषाओं को समृद्ध करने के लिए नये शब्द, नई पारिभाषिक शब्दावली और अभिव्यक्ति के नये रूप वांछनीय है। संस्कृत धातुओं से नवीन शब्दावली बनायी जा चुकी है और अभी भी बनायी जा रही है।
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