भारतीय इतिहास में बुन्देलखण्ड का महत्वपूर्ण स्थान है। यहां का इतिहास अत्यन्त प्राधीन है। वाल्मीकि का आश्रम बांदा प्रयागराज गार्ग पर चित्रकूट जिला मुख्यालय से बाइस कि मी की दूरी पर लालापुर में था। महाभारत के रवरिता व्यास कॅन-यमुना नदियों के एक द्वीप घर पैदा हुए थे। द्रोणाचार्य का जन्म निवाडी जिला के बाघाट ग्राम में हुआ था और तुलसीदास राजापुर (चित्रकूट जिला) में हुए थे। इसलिए बुन्देलखण्ड का इतिहास जितना प्रेरक और रोमांचकारी है. इतना किसी अन्य प्रदेश का नहीं। बुन्देलखण्ड के विस्मृत इतिहास को प्रकाश में लाने का यह एक तुच्छ प्रयास है। किन्तु बुन्देलखण्ड का इतिहास इतना व्यापक है कि उसे एक ग्रंथ में समेटना किसी एक व्यक्ति के सामर्थ्य के बाहर है। अतः हमने अपना कार्यक्षेत्र पन्ना राज्य के इतिहास तर्क सीमित रखा है। मुशी श्यामलाल का तारीखे बुन्देलखण्ड (1884) पहला ग्रन्थ है, जिसमें ब्रिटिश कालीन रियासतों और कम्पनी सरकार के पोलिटिकल एजेण्ट के खती-किताबत का उल्लेख है। इसमें तत्कालीन राजवंशों का क्रमानुसार वर्णन है। पहरा के दीवान प्रतिपालसिंह ने बुन्देलखण्ड का इतिहास बारह खण्डों में लिखा है। यह इतिहास 1929 ई में लिखकर समाप्त हुआ था। इसका पहला खण्ड काशी से 1929 ई. में प्रकाशित हुआ। किन्तु शेष खण्डों के प्रकाशित होने के लिए अस्सी वर्षों तक प्रतीक्षा करना पड़ी। शेष खण्ड 2 से 12 अब 2009 में प्रकाशित हुए हैं। इसके प्रारम्भिक कुछ खण्ड अव्यवहारिक हो गये हैं। इसका प्रमुख कारण नई सामग्री का विपुल मात्रा में प्रकाश में आना है। अतः नई सामग्री के साथ इसके नये संस्करण की आवश्यकता है। दीवान प्रतिपालसिंह के बाद गोरेलाल तिवारी ने बुन्देलखण्ड का संक्षिप्त इतिहास लिखा, जो 1990 (1933 ई.) में काशी नागरी प्रचारिणी समा, काशी से प्रकाशित हुआ। इसमें समस्त बुन्देलखण्ड का राजनीतिक इतिहास अत्यन्त संक्षिप्त रूप में दिया गया है। क्योंकि यह ग्रन्थ आज से नब्बे साल पहले प्रकाशित हुआ था, अतः अब इसमें आमूल चूल परिवर्तन की आवश्यकता है। 1987 ई. में डा. रामस्वरूप ढेगुला का शोधप्रबन्ध बुन्देलखण्ड का राजनैतिक एवं सांस्कृतिक अनुशीलन शीर्षक ग्रन्थ प्रचारित हुआ। किन्तु ग्रंथ का शीर्षक भ्रामक है। इसमें केवल दतिया राज्य का इतिहास वर्णित है और हमारे विषय से सम्बन्धित नहीं है। यद्यपि भगवानदास श्रीवास्तव और भगवानदास खरे का बुन्देलों का इतिहास लिखा तो काफी पहले गया था, किन्तु प्रकाशित हुआ 1982 ई. में। पन्ना के परवर्ती शासकों के लिए यह एक अच्छा आधार ग्रन्थ है। डा. भगवानदास गुप्ता का लखनऊ विश्वविद्यालय का शोधप्रबन्ध महाराजा छत्रसाल बुन्देला, 1958 ई. में प्रकाशित हुआ। छत्रसाल पर लिखा यह ग्रंथ आज भी मानक स्तर का है और इस स्तर का छत्रसाल पर कोई दूसरा ग्रंथ अभी तक प्रकाशित नहीं हुआ। 1973 ई. में डा. महेन्द्रप्रतापसिंह द्वारा सम्पादित लालकवि का छत्रप्रकाश ग्रंथ प्रकाशित हुआ। ग्रंथ में अनेक कमियां हैं। इसमें सभी स्थान नामों का अभिज्ञान नहीं किया गया और जिनका किया गया है, उनमें से भी कुछ पहचान ठीक नहीं है। 1975 में डा. साहब का ऐतिहासिक प्रमाणावली और छत्रसाल ग्रंथ प्रकाश में आया। इसमें प्रारम्भिक भूमिका के बाद छत्रसाल के वही पत्र दिये गये हैं जो पहले ही प्रकाशित हो चुके हैं। इसमें पृ. 94, पत्र क्रमांक 64 में महोरा को गडोरा पढ़ा गया है। इसी प्रकार पत्र क्रमांक 77 के करी का राही अभिज्ञान नहीं किया गया है। यह स्थान रीवा जिला की सिरगीर तहसील का ककरेडी है। इसी प्रकार कुछ अन्य स्थानों के अभिज्ञान भी दोषपूर्ण है। 1983 ई. में वा. भगवानदास गुप्ता का ग्रंथ मस्तानी बाजीराव और उसके वंशज बांदा के नवाब एक शोधपूर्ण कृति है, जिसमें यत्र-तत्र पन्ना के घरवर्ती बुन्देला शासकों कर वर्णन है। 1980 ई. में मोतीलाल त्रियाती अशान्त का बुन्देलखण्ड दर्शन शीर्षक ग्रंच का प्रकाशन हुआ। जैसा कि ग्रंथ के नाम से विदित होता है कि इसमें इतिहास के स्थान पर बुन्देलखण्ड के विविध ऐतिहासिक, सामाजिक और धार्मिक पक्षों का वर्णन किया गया है। 1991 ई. में डा. काशीप्रसाद त्रिपाठी ने बुन्देलखण्ड का बृहत इतिहास प्रकाशित कराया जिसमे राजतन्त्र से प्रजातन्त्र के इतिहास का वर्णन है। गोरेलाल तिवारी अपने 439 पृष्ठ वाले इतिहास को संक्षिप्त इतिहास कहते हैं. इसके विपरीत 436 पृष्ठ वाले इतिहास की त्रिपाती बृहद इतिहास की संज्ञा देते हैं। इस तथाकथित इतिहास में प्रारम्भ से लेकर 1259 ई. तक का इतिहास केवल 29 पृष्ठों में निपटा दिया गया है। अत यह कितना बृहद है, इसका सहज ही अनुमान हो जाता है। 2001 में डा भगवानदास गुप्ता का एक लघु ग्रंथ मुगलों के अन्तर्गत बुन्देलखण्ड के इतिहास-संस्कृति के हिन्दी साहित्यिक स्रोतों का मूल्यांकन प्रकाशित हुआ। इसमें ओरछा के राजा मधुकरशाह (1554-92) से लेकर पन्ना के राजा छत्रपाल बुन्देला (1649-1731) के काल तक की ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण काव्य कृतियों के ऐतिहासिक विवरणों का विवेचन कर बुन्देलखण्ड के मुगलकालीन इतिहास के लिए उनकी उपादेयता पर प्रकाश बालकर तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था एवं संस्कृति को उद्घाटित करने का प्रयत्न किया गया है। डा. भगवानदास गुप्ता द्वारा 1997 ई. में प्रचारित मुगलों के अन्तर्गत बुन्देलखण्ड का सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक इतिहास भी एक महत्वपूर्ण कृति है। इस ग्रंथ में 1531 ई. तक मुगल- बुन्देला सम्बन्धों का विवचेनात्मक विवरण प्रस्तुत कर इस काल में बुन्देला शासन, तत्कालीन सामाजिक-आर्थिक स्थिति, साहित्य, कला एवं संस्कृति के विशिष्ट तथ्यों तथा चिन्तन की धाराओं का समावेश किया गया है। 2016 ई. में सुधा गुप्ता द्वारा सम्पादित मध्य आधुनिककालीन बुन्देलखण्ड के इतिहास के समकालिक स्रोत ग्रंथ प्रकाश में आया। यह एक महत्वपूर्ण कृति है. जिसमें पन्ना राजघराने के पत्रों का संग्रह है। 2016 में ही राकेश व्यास की कृति बुन्देलकेसरी छत्रसाल शीर्षक एक पुस्तिका प्रकाशित हुई है। यह पुस्तक छत्रसाल के पत्रों के आधार पर लिखी गई है। ग्रंथ की संयोजना इस प्रकार है-पहले अध्याय में बुन्देलों की उत्पत्ति का वर्णन है। इस अध्याय में बुन्देलों की पारम्परिक उत्पत्ति के स्थान पर प्रतापरुद्र की कालिंजर प्रशस्ति में वर्णित उत्पत्ति को प्रमुख स्थान दिया गया है।
जन्मस्थानः बांदा, उ.प्र जन्मतिथिः 10.12 1942. एम.ए. 1962 प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति और पुरातत्त्व, सागर विश्वविद्यालय पीएच.डी. 1973, विन्ध्यक्षेत्रा का ऐतिहासिक भूगोल, सागर विश्व-विद्यालय पुरस्कार 1. भगवानदास सपफड़िया पुरस्कार, सतना, 1996, 2. नीरज न्यास पुरस्कार, सतना, 2014. 3. सारस्वत सम्मान, झांसी, 2014, 4. दीवान प्रतिपाल सिंह स्मृति सम्मान, पहरा, 2015 शोध तेरह छात्रों को पीएच.डी. प्राप्त आजीवन सदस्य 1. म.प्र. इतिहास परिषद, भोपाल 2. इण्डियन हिस्ट्री कांग्रेस, दिल्ली 3. भारतीय मुद्रा परिषद, वाराणसी 4. एपिग्रापिफकल सोसायटी ऑपफ इण्डिया, मैसूर 5. मरुभूमि शोध संस्थान, डूंगरगढ़, राजस्थान प्रकाशन 1. खजुराहो, मैकमिलन, 1980. 2. विन्ध्यक्षेत्रा का ऐतिहासिक भूगोल, छत्ए छमू क्मसीप, 1987 3. ऐतिहासिक भारतीय अभिलेख, जयपुर, 1992. 4. भारत का राजनीतिक इतिहास, म.प्र. हिन्दी ग्रंथ अकादमी, भोपाल, 2004. 5. भारत की सांस्कृतिक विरासत, इलाहाबाद, 1993. 6. भारतीय पुरातत्त्व के तत्त्व, इलाहाबाद, 2014. 7. खारवेल और उसका राजत्वकाल, बी.आरपब्लिशिंग कारपोरेशन, दिल्ली, 2018. 8. उत्तर भारत का राजनैतिक इतिहास, इलाहाबाद, 2019. 9. कालिंजर का इतिहास, बी.आर. पब्लिशिंग कारपोरेशन, दिल्ली, 10. बुन्देलखण्ड का इतिहास 11. त्रिपुरी के कलचुरि राजवंश.
महाराजा छत्रसाल द्वारा स्थापित पन्ना राज्य बुन्देलों का एक महत्त्वपूर्ण महत्त्व राज्य रहा है। मंशी श्यामलाल ने तारीखे बुन्देलखण्ड (1884), दीवान प्रतिपालसिंह सिंह ने ने बुन्देलखण्ड का इतिहास (1929) और गोरेलाल तिवारी ने बुन्देलखण्ड का संक्षिप्त इतिहास (1933) में लिखा था। लगभग नब्बे वर्ष पूर्व लिखे गये ये इतिहास नई शोध सामग्री के प्रकाश में आने से पूर्वरूप से अव्यावहारिक हो गये है। अतः पन्ना राज्य के सांगोपांग इतिहास के लिए एक ग्रंथ की अतिलिख आवश्यकता थी। इस तथ्य को ध्यान में रखकर पन्ना राज्य के अभिलेखागार से उपलब्ध सामग्री तथा पन्ना उसके विभिन्न ठिकानों से अंग्रेजी सरकार द्वारा की गई संधियों के आधार पर लिखा गया यह ग्रंथ एक प्रामाणिक इतिहास सिद्ध होगा, जो सामान्य पाठकों और शोधकताओं के लिए प्रकाश स्तम्म प्रमाणित होगा।
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