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पाटलिपुत्र पुरातात्त्विक अवलोकन- Pataliputra Archaeological Overview

$28
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Specifications
Publisher: JANAKI PRAKASHAN, PATNA
Author Ram Niwas Singh
Language: Hindi Text
Pages: 200 (With B/W Illustrations)
Cover: Hardcover
9.00x5.50 inch
Weight 352 gm
Edition: 2008
ISBN: 9788189880743
BA0402
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Book Description

 

 

भूमिका


प्रथम अध्याय में मैंने नगरीकरण से सम्बन्धित इतिहास लेखन की प्रवृतियाँ, स्रोत तथा प्राचीन पाटलिपुत्र के बारे में सामान्य परिचय देने का प्रयास किया है। बुद्धकाल में भारत में द्वितीय नगरीकरण का दौर शुरु हुआ। उस समय के प्रसिद्ध महानगर में अधिकांश महाजनपद के राजधानी थे। उसी समय सामरिक आर्थिक महत्व को देखते हुए अजातशत्रु के दो मंत्रियों द्वारा पाटलिग्राम में सामरिक केन्द्र का निर्माण कराया गया।' कालक्रम में पाटलिपुत्र ही मगध साम्राज्य की राजधानी बना। स्रोतों के आधार पर यह जानकारी मिलती है कि चन्द्रगुप्त मौर्य के समय तक इस शहर की आबादी 4 लाख हो गयी थी। एलियन का मानना है कि यहाँ के राजप्रासाद का मुकाबला न तो सूसा और न एकबतना कर सकते हैं।


प्राचीन पाटलिपुत्र की गतिशीलता राजनीति की अपेक्षा अर्थ से अधिक प्रभावित रही। पाटलिपुत्र की स्थापना ही कर सम्बन्धी मामले को लेकर हुई। कण्व शासन की समाप्ति तथा ईस्वी सम्वत् के शुरुआत के आसपास पाटलिपुत्र पर वैशाली का अधिकार हो गया। इसके बाद भी पाटलिपुत्र की समृद्धि बनी रही। गुप्तकाल में राजधानी रहने के बावजूद भी सिक्कों की संख्या में कमी आयी और ह्रास के चिह्न परिलक्षित होने लगे। अभी तक नगरीकरण पर जो भी पुस्तकें लिखी गई हैं उसमें पुरातात्विक पक्ष उपेक्षित है। मगध के इतिहास पर भी कई पुस्तकें लिखी गई हैं, लेकिन उन सारी पुस्तकों में पाटलिपुत्र का वर्णन अर्थशास्त्र के आधार पर कर दिया गया है। यू.एन. राय की पुस्तक में भी पुरातत्व सम्बन्धी तथ्य उपेक्षित हैं। बी०सी० ला की पुस्तक से भी खास जानकारी नहीं मिल पाती है। डी० के० चक्रवर्ती की पुस्तक में भी बहुत संक्षिप्त विवरण है। नगरीकरण के सम्बन्ध में ए० घोष की पुस्तक' में हर पहलुओं पर विचार करने का प्रयास किया गया है, लेकिन यहाँ भी पाटलिपुत्र के नगरीकरण पर विशेष चर्चा का अभाव है। लेकिन इन सारी पुस्तकों के अध्ययन से और पुरातत्व सम्बन्धी रिपोटों एवं विदेशी वृत्तांतों को मिलाने तथा सूक्ष्म मूल्यांकन करने पर एक ठोस दस्तावेज तैयार हो जाता है।


मैं शोध करने में जिन सामग्रियों का सहारा ले रहा हूँ, उनमें पुरातत्व सम्बन्धी रिपोटों के अलावा प्राचीन देशी साहित्य, विदेशी वृत्तांत आदि प्रमुख हैं। विदेशी वृत्तांतों में भी दो तरह के स्रोत हैं। एक स्रोत ऐसा है जो पूर्ण रूप से धर्मनिरपेक्ष है। इसमें मुख्य रूप से यूनानी विवरण है। दूसरा चीनी यात्रियों के विवरण हैं।" इसके साथ-साथ सेकेन्ड्री स्रोतों का भी सहारा लेना पड़ा है, जिनमें पाटलिपुत्र पर अब तक प्रकाशित पुस्तकें, शोध निबंध आदि शामिल हैं। जहाँ तक देशी साहित्यिक स्रोतों का सवाल है, इनमें भी कुछ स्रोत धर्म निरपेक्ष हैं तो कुछ धार्मिक हैं। धर्मनिरपेक्ष स्रोतों में कौटिल्य का अर्थशास्त्र' एक प्रमुख ग्रन्थ है। हालाँकि अर्थशास्त्र का काल विवादित है फिर भी यह अति महत्वपूर्ण स्रोत है। इसमें न तो पाटलिपुत्र के किसी शासक का नाम है, और न ही पाटलिपुत्र शहर की चर्चा है। 12क मुद्राराक्षस 13 नाटक में भी पाटलिपुत्र के विषय में आंशिक जानकारी ही मिल पाती है। इस ग्रंथ में नगर द्वारों का उल्लेख हुआ है। इसमें वर्णित है कि नगर के चतुर्दिक खड़े योद्धा आक्रमण के समय शत्रुओं पर टूट पड़ते हैं। नगर द्वार के सामने हाथियों का झुंड खड़ा रहता है, जो प्रांगण में घुसने का प्रयास करने वाले शत्रुओं को रौंद डालता है। इस नाटक में राजभवन के सुसज्जित द्वारों का उल्लेख किया गया है। कामसूत्र 14 में भी नगर जीवन का चित्रण हुआ है, यह चित्रण पाटलिपुत्र पर आधारित ज्ञात होता है, क्योंकि वात्सयायन पाटलिपुत्र के पास च्यवन ऋषि के आश्रम में रहते थे। यह स्थल सोन नदी के प्राचीन मार्ग पर अवस्थित है। कनिंघम की रिपोर्ट में सोनभद्र, क्याल, देवकुंड, रामपुर चाई, चिलबिल आदि जगहों को सोन का प्राचीन मार्ग बताया गया है। ऐतिहासिक काल में भी सोन नदी के मार्ग में परिवर्तन आते रहा है। बुद्ध काल में पहाड़ी के आंस-पास से सोन नदी गंगा नदी के समान्तर क्रम में बहते हुए फतुहा के नजदीक गंगा में मिलती थी। जब ह्वेनसांग भारत आये, उस समय यह नदी पश्चिमी पटना होते हुए गंगा नदी में मिलती थी। 1379 ई० तक सोन नदी बाँसघाट के आस-पास गंगा में मिलती रही। कनिंघम अपनी रिपोर्ट में सोन नदी के मार्ग को 12 मील पश्चिम बताते हैं। आज इस नदी का मार्ग लगभग 20 मील पश्चिम है, यद्यपि बुकानन अपनी रिपोर्ट में सोन नदी को पटना से 17 मील पश्चिम बताते हैं। बुकानन (1812 ई०) और कनिंघम के समय में 65 साल का अंतर है। कनिंघम और बुकानन, दोनों पुरातत्वविद् अलग-अलग जगहों से दूरी को मापते हैं। गुप्तकाल की रचना अमरकोश से ग्रामीण जीवन की जानकारी मिलती है। जहाँ तक शहर का सवाल है, इसे गाँव से काटकर नहीं देखा जा सकता है। शहर की आवश्यकताओं की पूर्ति गाँव से होती है, खासकर खाद्यान्न एवं अनेक उद्योग-धंधों के लिए कच्चे माल। राजशेखर की काव्यमीमांसा से यह जानकारी मिलती है कि पाटलिपुत्र में विद्वानों की एक मंडली थी जो ग्रंथकारों की कृतियों की परीक्षा लेती थी। कालिदास की मुख्य रचनाओं, जैसे अभिज्ञानशाकुंतलम, रघुवंशम, 17 कुमारसंभव तथा ऋतुसंहार' से भी नगर जीवन के बारे में जानकारी मिलती है। शूद्रक के मृक्षकटिकम् २० से भी इस नगर की जानकारी मिलती है।


वैदिकोत्तर काल के समाज की जानकारी के लिए धर्मसूत्र, गृहसूत्र और श्रौतसूत्र का सहारा लिया जाता है। वहीं मौर्योत्तर काल के सामाजिक जीवन के लिए मनुस्मृति और याज्ञवल्क्यस्मृति 22 का सहारा लिया जाता है। फिर गुप्तकालीन समाज के अध्ययन के लिए विष्णु, 23 नारद 24 और वृहस्पतिस्मृति 25 का सहारा लिया जाता है, जबकि गुप्तोत्तर काल के लिए पराशर और कात्यायन स्मृति का। विष्णु पुराण, वायुपुराण, 26 युगपुराण, 27 भागवतपुराण, मार्कण्डेयपुराण जैसे धार्मिक ग्रन्थों से भी इतिहास के तत्वों को प्राप्त किया जाता है।

 

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