वीं सदी की शुरुआत भारत 21 ारत में टीवी पत्रकारिता के 24 घंटे की धमक के साथ हुई। शुरुआत में 24 घंटे के न्यूज चैनल को यह कह कर खारिज किया जाने लगा कि न्यूज में भला चौबीसों घंटे क्या दिखाया जाएगा। पूरे दिन की खबर को कुछ मिनटों में अखबारों पर सरसरी निगाह दौराने के बाद अपनी दिनचर्या में व्यस्त होने वाले आमजन को आधे घंटे के बुलेटिन में दिनभर की खबरें देखने की आदत तो लग चुकी थी, लेकिन चौबीसों घंटे खबर! न्यूज चैनल आखिरकार, खबरों में ऐसा क्या दिखाएंगे जो आम लोगों को जोड़ कर रख सके ! लेकिन टीवी संपादकों ने क्राइम, "सेक्स" और क्रिकेट का ऐसा पैकेज तैयार करना शुरू कर दिया जिससे आम भारतीयों को मनोरंजन की खुराक भी न्यूज चैनलों से ही मिलनी शुरू हो गई। यह दौर 1988 में प्रणय राय द्वारा दूरदर्शन पर अपने प्रोडक्शन हाउस के द्वारा समाचार को नए कलेवर देने के शानदार प्रयोग से एकदम अलग था। अब किसी चीज के लिए कोई वक्त नहीं था। स्वयं प्रणय राय का एनडीटीवी भी बहुत बदल रहा था, 24 घंटे के रफ्तार को पकड़े रखने के लिए।
टेलीविजन पत्रकारिता की बाल्यावस्था में अखबारों की दुनिया से आए ऊर्जावान संपादक नित्य नए प्रयोगों में तल्लीन थे। उन्हें बहुत कुछ सीखना और सीखते ही नवीन पीढ़ी का गुरुवर भी बनना था। भारतीय टेलीविजन मीडिया बहुत जल्दबाजी में था। टेलीविजन पत्रकारिता की रफ्तार को देखकर प्रिंट के ज्यादातर मंझे हुए पत्रकार हांफने लगे। लिहाजा, पत्रकारिता के ठोस अनुभवी काबिल पत्रकार ने उस दौर से खुद को दूर कर लिया। परिणाम स्वरूप भारतीय टेलीविजन पत्रकारिता पर कम अनुभवी, लेकिन ऊर्जावान और बाजार से प्रभावित नई पीढ़ी का कब्जा हो गया। अखबार की दुनिया से पत्रकारिता की ट्रेनिंग लेकर आए पत्रकार टेलीविजन में यकायक निर्णायक भूमिका में आ गए। उनके अनुभव ने यह तय किया कि टेलीविजन के 21 इंच के पर्दे पर आम भारतीयों को सेक्स, क्राइम और क्रिकेट (टेलीविजन की भाषा में ट्रिपल C) देखना ही पसंद है। फिर टीवी के पर्दे पर खबरों के बदले यही ट्रिपल C बिकने लगा। खबर को बिकाऊ बनाने की रेस में 2004 तक टीवी मीडिया पर क्राइम रिपोर्टरों का बोलबाला हो गया। क्राइम की खबरों में सेक्स का तड़का, खबरों को मसालेदार बनाने लगा। बलात्कार व अपराध की कई खबरों को मसालेदार और बिकाऊ बनाने के चक्कर में टीवी पत्रकारिता ने कई निर्दोष जिंदगियां तबाह कर दीं।
2006 में भारतीय टीवी मीडिया के सबसे चर्चित क्राइम शो, जिसका मैं खुद महत्वपूर्ण हिस्सा था, वहां हमारे एक बेहद करीबी साथी रिपोर्टर की रिपोर्ट से परेशान होकर एक व्यक्ति ने आत्महत्या कर ली। रिपोर्ट देखकर अपनी जान गंवाने वाले अधेड़ पर अपनी ही भतीजी (साढू की बेटी) के साथ बलात्कार का आरोप लगाया गया था। खबर प्रसारित होने के बाद अभियुक्त ने आत्महत्या कर ली। माना गया कि खबर बदले के भाव से तैयार करवाई गई थी। इस हादसे ने हमारे साथी पत्रकार की नींद छीन ली। उसके अंदर पत्रकारिता का मानवीय पहलू जिंदा था, इसलिए वह बैचेन रहने लगा। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। लेकिन, ऐसी खबरें अकेले नहीं बनतीं। उसमें मसाला डालने के लिए एक टीम काम करती है, जो अक्सर इंसानी संवेदनाओं को ताक पर रखकर पूरी व्यावसायिक हो जाती हैं। बदलते दौर में टीवी पर क्राइम की खबरें पीछे जाने लगीं। जिस एनडीटीवी ने सबसे पहले आधे घंटे का अपना 'क्राइम शो' शुरू किया था उसी ने सबसे पहले 'क्राइम' शो बंद कर दिया। कई क्राइम रिपोर्टरों पर अंडरवर्ल्ड से ताल्लुकात के आरोप भी सामने आए। अंडरवर्ल्ड के डॉन दाऊद इब्राहिम की शारजाह क्रिकेट स्टेडियम में मौजूदगी के एक शॉट के अलावा जिस दाऊद की दूसरी तस्वीर आज तक तलाशी नहीं गई, उसके नाम पर तीन दशक तक न जाने कितनी खबरें बेच ली गई। मुंबई दंगे के बाद जिस दाऊद का दुनिया की किसी एजेंसी को कभी पता नहीं चला मानो वह दाऊद चुनिंदा भारतीय क्राइम रिपोर्टरों के पास हाजिरी लगाता था। फिर वह भारतीय टेलीविजन मीडिया के माध्यम से सीधे ड्राइंग रूम में घर-घर तक पहुंच जाता था। लेकिन, खुफिया एजेंसियों को इसकी कभी कोई भनक तक नहीं लगती थी!
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