लेखक परिचय
दिलीप जाखड़ का जन्म श्री गंगानगर (राजस्थान) में वर्ष 1963 में हुआ। उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग में शिक्षा प्राप्त करके मार्केटिंग बोर्ड में सेवायें दी। राजस्थान पुलिस में उन्होंने व्यावहारिक दृष्टिकोण से चुनौतियों का सामना करते हुए विश्वसनीय सेवायें दीं। भारत-पाकिस्तान बॉर्डर के संवेदनशील इलाकों में तस्करी व सीमा पार घुसपैठ पर प्रभावी नियंत्रण किया। कई मामलों में तस्करी करके लाये गये 366 सोने के बिस्कुट व 7.70 क्विंटल चांदी सहित तस्करों को गिरफ्तार किया। भारी मात्रा में पाकिस्तान से भारत में लाये गये हथियारों के चार तस्करों की गिरफ्तारी में उनकी सशक्त भूमिका रही। राजस्थान व मध्यप्रदेश के सीमावर्ती बारां जिले में मादक पदार्थों की तस्करी के विरुद्ध उन्होंने व्यापक अभियान किया। कुल 28 मामलों में भारी मात्रा में अफीम, स्मैक फैक्ट्री व हथियारों सहित तस्करों को गिरफ्तार किया। मानव-बलि, लूट और अन्य अपराधों की पतारसी और कानून-व्यवस्था बनाये रखने में उन्होंने सफलतापूर्वक कार्य किये। उन्होंने कंजर जनजाति के अनेक लोगों को अपराध छुड़वा कर समाज की मुख्यधारा में शामिल किया। भ्रष्टाचार जैसी सामाजिक बुराई के विरुद्ध अभियान के लिए उन्हें रेड एण्ड व्हाइट ब्रेवरी अवार्ड दिया गया। महामहिम राज्यपाल, राजस्थान सरकार द्वारा योग्यता पुरस्कार व महामहिम राष्ट्रपति महोदय, भारत सरकार द्वारा पुलिस मैडल से उन्हें सम्मानित किया गया है। 'मानवाधिकार और पुलिस संगठन' और 'मानवाधिकार' के चुनौतिपूर्ण विषय पर उनकी दो उपयोगी पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं। इनके लिए गृह मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार व विधि एवं न्याय मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा राज पुरस्कार से उन्हें सम्मानित किया गया है। नेशनल पुलिस एकेडमी हैदराबाद, सेंट्रल डिटेक्टिव ट्रेनिंग स्कूल कोलकाता और क्वीन्सलैंड पुलिस एकेडमी, आस्ट्रेलिया में उन्होंने गहन प्रशिक्षण प्राप्त किये हैं। भारत व पाकिस्तान के अधिकारियों की बॉर्डर फ्लैग मीटिंग व गोल्ड कॉस्ट पुलिस के साथ संयुक्त अभ्यास जैसे अंतर्राष्ट्रीय अनुभव उन्हें प्राप्त हैं। पुलिस व जनता के बीच संपर्क के क्षेत्र में उन्होंने उल्लेखनीय कार्य किया है। समाज के लिए उपयोगी अन्य बहुआयामी कर्तव्यों का उन्होंने कर्तव्यनिष्ठा से पालन किया है। आजकल वे भारतीय पुलिस सेवा (I.P.S.) अधिकारी के रूप में कमांडेंट, आर.ए.सी., जोधपुर में सेवायें दे रहे हैं।
पुस्तक परिचय
हमारे पूर्वज सभ्य होने से पहले पशुओं के साथ उन्हीं की तरह जीवन जीते थे। सभ्यता के साथ प्रकृति और स्थिति पर विजय पाने का संकल्प जोर पकड़ने लगा। दूसरी तरफ, यह विचार भी प्रभावी होने लगा कि भाग्य के लिखे को तो भोगना ही पड़ेगा। ईसा ने पाप क्षमा और कृष्ण ने कर्मयोग का आह्वान जरूर किया, लेकिन कर्म के दंड भोगने का भय हम पर हावी रहा। कम्युनिस्ट लोगों ने क्रांति करके भेदभाव मिटाने की कोशिशें कीं। अमीरों से संपत्ति छीन ली गयी, पर गरीबों के दिल में अमीरी के प्रति घृणा भर दी गयी। शोषित और गरीब लोगों का अमीर बनना संभव नहीं हुआ। क्या असंभव में कोई संभावना छुपी होती है, जिसे तलाश करके हम उसे संभव बना सकें ? क्या पतित का उद्धार होना संभव है ? हमारे जीवन की बुनियाद इस विश्वास पर टिकी होती है कि जीवन और जगत का स्वभाव कैसा है! एक अनार और सौ बीमार की बुनियाद को सच मानें, तो छीनझपट, संघर्ष और दुख ही जीवन है। कुछ राहबरों ने जीवन और जगत को दुख बताया। हालांकि यह विश्वास सच नहीं था, पर विश्वास की शक्ति के कारण यह फलीभूत हो गया। अगर एक अनार के कुछ दाने बो दें, तो कई पौधे उगेंगे। इस तरह, सौ बीमारों के लिए हजारों अनार मिल सकेंगे। रचना धर्म की बुनियाद पर टिके जीवन और जगत में प्रचुरता और अनंत आपूर्ति मिलने लगेगी। हर रोज उठते ही हमारे सामने दो रास्ते होते हैं। या तो हम जाग कर भी सपने देखते रहें या उठ कर सपनों को संभव बनाने का प्रयास करें। जैसे बीज में पचासों फुट ऊंचा पेड़ छिपा होता है, वैसे ही हमारे जीन कोड में जीवन वृक्ष छिपा होता है, जो फलने-फूलने का इंतजार कर रहा है। नकारात्मक सोच सिर्फ विफलता और बुराई पर ध्यान केंद्रित रखती है। सकारात्मक सोच बुराई से बचते रहकर लाभ पर टिकी रहती है। संभववादी सोच बुराई में भी संभावना की तलाश करती है और कांटों का भी सम्मान करती है, क्योंकि वे फूलों की रक्षा करते हैं। जहर से ही सांप काटने की दवा बनती है। गरीबी सफलता को असंभव बना देती है, लेकिन सही उपाय करने पर गरीबी को भी असंभव बनाया जा सकता है। सिर्फ एक पुस्तक होने की बजाय, यह एक विचारधारा है। छिपी हुई संभावनाओं को संभव बनाने की विधियां इसमें बतायी गयी हैं। कई संभवकर्ता लोगों के सच्चे उदाहरण भी दिये गये हैं। संभवकारी अभ्यासों को हर कोई अपना कर संभवकर्ता बन सकता है। संभववाद व्यक्ति से लेकर परिवार, समाज, देश और दुनियाभर के लिए अपनाया जा सकता है। अंतिम अध्याय में संभवशास्त्र (Possibology) की बुनियाद रखी गयी है। साधनों की छीनझपट में उलझे रहने की बजाय, नये साधनों की रचना को संभव बनाना ही हमारा मूल मंतव्य है।
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