आचार्य नलिन विलोचन शर्मा मेरी नजर में साहित्य की आधुनिक प्रवृत्तियों के जनक, प्रपद्यवाद के प्रवर्त्तक, संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी, फ्रेन्च इत्यादि भाषाओं के पंडित अपने समय के उद्भट विद्वान तथा एक महान् शिक्षक थे।
परन्तु पुस्तक के प्रणयन के लिए जब मूल आधार सामग्री की खोज शुरू की तो बहुत निराश हुई। उनकी कई पुस्तकें बाजार या पुस्तकालयों में भी उपलब्ध नहीं हैं। उनका अधिकांश साहित्य अभी भी पत्र-पत्रिकाओं में बिखरा पड़ा है। बहुत-सी रचनाएँ अब तक अप्रकाशित हैं। नलिन जी के जीवन और साहित्य से सम्बन्धित सामग्री का घोर अभाव है। कुछ कुछ पुस्तकालयों से तथा कुछ महानुभावों से अपेक्षित प्रयास करने पर, काफी दौड़-धूप करने पर काफी सामग्री मिली है।
प्रस्तुत पुस्तक पाँच अध्यायों में विभाजित है। प्रथम अध्याय में नलिन जी के व्यक्तित्व और कर्तृत्व का संक्षिप्त परिचय दिया गया है। इस अध्याय में उनके आलोचक और रचनाकार व्यक्तित्व के महत्त्व को रेखांकित करने के साथ-साथ उनकी प्रकाशित रचनाओं की विवरणी दी गयी है। यह विवरणी उनकी पुस्तकों में संकलित रचनाओं की तो है ही, पत्र-पत्रिकाओं में बिखरी पड़ी उन रचनाओं की भी है, जिनसे आज के हिन्दी पाठक का सीधा जुड़ाव नहीं रह पाया। सम्बन्धित सामाग्री का संकलन मैंने 'साहित्य पत्रिका' के 'नलिन स्मृति अंक' से किया है।
द्वितीय अध्याय में नलिन जी की कविताओं का विवेचन किया गया है। सभी जानते हैं कि उन्होंने 'प्रपद्यवाद' नाम से अपने दो सहयोगी मित्रों श्री केसरी कुमार और श्री नरेश के सहयोग से एक काव्य-आन्दोलन की शुरुआत की। प्रपद्यवाद को 'नकेनवाद' के नाम से जाना गया। प्रपद्यवादी कविताओं का जो संकलन 'नकेन के प्रपद्य' नाम से निकला, उसमें प्रयुक्त शब्द 'नकेन' आगे चलकर 'प्रपद्य का पर्याय' हो गया। 'नकेन' नलिन, केसरी और नरेश के प्रथमाक्षरों को मिलाकर बना। अज्ञेय के प्रयोगवाद का विरोध करते हुए प्रपद्यवादी कविता सामने आयी। नकेनवादियों ने अज्ञेय के प्रयोग को अपर्याप्त बतलाया और अपने को असली प्रयोगवादी माना नकेनवादियों ने प्रयोग को साधन नहीं बल्कि साध्य माना। प्रयोग द्वादश सूत्री नाम से उन्होंने प्रपद्यवाद का घोषणा-पत्र जारी किया और उन सूत्रों के आधार पर काव्य-रचना की। प्रपद्यवाद को भरपूर समर्थन साहित्य-संसार की ओर से कभी नहीं मिला। आगे चलकर इसे नयी कविता का ही एक रूप मान लिया गया। प्रपद्यवाद क्या है ? प्रपद्यवाद के भीतर नलिन विलोचन शर्मा की कविताओं का स्वरूप कैसा है ? कवि के रूप में नलिन जी कितने प्रासंगिक हैं ? इन्हीं सब प्रश्नों के उत्तर द्वितीय अध्याय में समाविष्ट हैं।
नलिन जी प्रयोग को साध्य मानकर काव्य-रचना करनेवाले कवि के रूप में ख्यात हैं। लेकिन उनकी कहानियाँ भी चर्चा का विषय रही हैं। उनकी कहानियाँ 1940 ई० और 1960 ई० के बीच लिखी गयी। यह काल हिन्दी कहानी में अगर मनोवैज्ञानिक कहानी का है, तो प्रगतिवादी कहानी और नयी कहानी का भी है। कहानीकार के रूप में उन्हें किसी एक प्रवृत्ति के घेरे में नहीं बाँधा जा सकता है। उनकी कहानियों में अगर मनोवैज्ञानिक तत्त्व हैं तो यथार्थवादी तत्त्व भी हैं। इसलिए वे अपने ढंग के अकेले कहानीकार हैं। 'विष के दाँत', 'बरसाने की राधा', 'ये बीमार लोग' आदि उनकी ऐसी चर्चित और विशिष्ट कहानियाँ हैं जो उनको एक समर्थ कहानीकार के रूप में, प्रतिष्ठित करती हैं। प्रस्तुत शोध-पुस्तक के तृतीय अध्याय में नलिन जी की कहानी का विवेचन और विश्लेषण किया गया है।एक किए
साहित्य का इतिहास-दर्शन क्या है? हिन्दी में साहित्येतिहास-दर्शन की अवधारणा कैसी है? साहित्य के इतिहास-दर्शन के विषय में विचार करते हुए नलिन जी के निष्कर्ष क्या हैं? इन सब प्रश्नों को ध्यान में रखकर चतुर्थ अध्याय में नलिन जी के साहित्येतिहास दर्शन संबंधी विचारों को निबद्ध किया गया है। जिन दिनों साहित्येतिहास की दर्शन संबंधी अवधारणा विकसित नहीं हुई थी, उन दिनों नलिन जी ने 'साहित्य का इतिहास-दर्शन' नामक पुस्तक की रचना कर 'एक ऐतिहासिक दर्शन' नामक पुस्तक की रचना कर एक ऐतिहासिक काम किया। यह अध्याय लिखते हुए जहाँ हिन्दी साहित्येतिहास-लेखन की परम्परा का दिग्दर्शन कराया गया है, वहीं नलिन जी की पुस्तक के निष्कर्षों को भी केन्द्र में रखा गया है।
आचार्य नलिन विलोचन शर्मा एक सफल संपादक भी थे। 'साहित्य', 'दृष्टिकोण' और 'कविता' जैसी पत्रिकाओं का संपादन करके उन्होंने एक जीवन्त साहित्यिक परिवेश का निर्माण किया था। साथ ही नये लेखकों को आगे लाने में भी उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। पत्रिकाओं के अतिरिक्त अनेक पुस्तकों के संपादक के रूप में भी नलिन जी की संपादन-कला के दर्शन होते हैं। एक संपादक के रूप में वह किस नैतिकता का पालन करते थे? उनके संपादकीय आदर्श क्या थे? इन प्रश्नों को ध्यान में रखते हुए 'पंचम अध्याय' में उनके संपादक रूप की चर्चा की गयी है। साथ ही आलोचक के रूप में उनकी जो मान्यता थी, उसकी भी छानवीन प्रस्तुत अध्याय में की गयी है।
यथागति मैंने अर्चना स्वरूप, पुण्यश्लोक आचार्य नलिन जी के प्रति मात्र अपनी प्रणति निवेदित की है। सुधी विद्वान् इसे इसी परिप्रेक्ष्य में देखने की कृपा करेंगे।
आज बहुत आसानी से किसी आलोचक को 'रूपवादी' या 'यथार्थवादी' कह दिया जाता है। लेकिन उनकी समीक्षा पद्धति को देखने से ज्ञात होता है कि उन्हें आसानी से किसी खेमे में नहीं रखा जा सकता। उनके प्रिय कथाकार प्रेमचन्द हैं तो जैनेन्द्र भी हैं। वे निराला को पसन्द करते हैं लेकिन प्रयोगवादी अज्ञेय को नहीं। इसलिए किसी विशेष स्कूल का आलोचक न मानकर उन्हें अपने ही स्कूल का आलोचक मानना चाहिए, मुझे ऐसा लगता है।
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