प्रातःस्मरणीय (पूज्यपिताजी) स्वर्गीय महामहोपाध्याय १० श्री गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी जी के समालोचनात्मक लेखों का संग्रह 'प्रत्यालोचन' नामक प्रस्तुत पुस्तक में प्रकाशित किया जा रहा है। ये लेख विभिन्न अवसरों पर विभिन्न प्रसिद्ध पत्रिकाओं में प्रकाश्थित होकर अनेक आलोचना प्रत्यालोचनाओं के स्रोत बने थे। इनमें अनेक लेखों की वर्तमान में भी अनेक विद्वानों के द्वारा यत्र तत्र आलोचना प्रत्यालोचना प्रकाश में आती रहती है। इनके मुद्रण क्रम में यथासंभव विषय, समय आदि का ध्यान रखा गया है। विद्वान् पाठकों की सुविधा के लिए यथासंभव लेखों के स्रोत का संक्षेप इस प्रकार है-
प्रथम 'समालोचना का स्वरूप और उसकी उपादेयता' लेख 'हिन्दी साहित्य सम्मेलन वापिक विवरण', के एक प्राचीन अंक में प्रकाशित हुआ था। इसका प्रथम संकलनात्मक प्रकाशन श्रीचतुर्वेदीजो के प्रथम लेख संग्रह 'साहित्यिकनिबंध' में हुआ था।
द्वितीय 'बंदिक अन्वेषण' नामक लेख वाराणसी के सुप्रसिद्ध दैनिक पत्र 'आज' के एक 'साप्ताहिक विशेषांक' में प्रकाशित हुना था।
तृतीय लेख 'रामचरित को एक तिथिपत्री' प्रथमतः एक सुप्रसिद्ध हिन्दी विद्वान् के प्रकाशित लेख की आलोचना के रूप में 'दीपावली और भगवान् रामचन्द्र' इस शीर्षक से 'हिन्दू संसार' नामक पत्र के दोपावली विशेषांक में सन् १९३६ में प्रकाशित हुआ था। पुनः लेख रूप में इसका प्रकाशन कुछ परिवर्तनों के साथ महाविद्वान् नागेशभट्ट के द्वारा प्रर्दाशत 'रामचरित की एक तिथि पत्री' की समालोचना के रूप में 'रामचरित को एक तिथि पत्री' इस शीर्षक से 'आज' के दीपावली विशेषांक में हुआ। चतुर्थ लेख देहली से प्रकाशित होने वाले सुप्रसिद्ध हिन्दी साप्ताहिक पत्र 'साप्ताहिक- हिन्दुस्तान' के एक अंक में प्रकाशित हुआ ।
'कालिदास की समालोचनाए' शीर्षक लेख प्रयाग की सुप्रसिद्ध पत्रिका सरस्वती में छपा था। 'महामना मालवीयजी से विमर्श' नामक लेख साप्ताहिक 'सनातन धर्म' पत्रिका में काशी हिन्दू विश्व- विद्यालय, वाराणसी से छपा था ।
सप्तम लेख ऋषिकुल हरिद्वार से स्वयं श्रीचतुर्वेदीजी के द्वारा सम्पादित हिन्दी मासिक पत्र 'ब्रह्मचारी' में प्रकाशित हुआ ।
अष्टम लेख भी 'ब्रह्मचारी' पत्रिका के ही एक प्राचीन अंक में छपा था ।
वेदांत के सम्प्रदाय' शोर्षक लेख रामनगर, वाराणसी से स्व० श्रीमान् पं० पुरुषोत्तम शर्मा चतुर्वेदीजी के द्वारा सम्पादित हिन्दी त्रैमासिक 'विद्यालय पत्रिका' के एक अंक में छपा था।
'विमर्श का परामर्श' लेख भी उक्त पत्रिका के हो एक अंक में प्रकाशित था ।
एकादश 'हिन्दी का एक विकृत रूप' शीर्षक लेख प्रथमतः 'हिन्दी साहित्य सम्मेलन वार्षिक विवरण' के एक प्राचीन अंक में 'वर्तमान हिन्दी में संस्कृत शब्दों का ग्रहण' नामक विस्तृत लेख के रूप में प्रकाशित हुआ था। आगे पूर्वोक्त 'साहित्यिक निबंध' नामक संग्रह में उक्त विस्तृत लेख तीन लेखों के रूप में तीन शीर्षकों में प्रकाशित हुआ ।
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