अभिनय की अपेक्षा लेखन कला के माध्यम से पाठकों का मनोरंजन करना अपेक्षाकृत कठिन है। किन्तु वयोवृद्ध एवं लेखन-साधनारत बाबू भगवती प्रसाद सिंह जी 'शूर' ने अपने 'रचना विनोद' के माध्यम से इस तथ्य को कुछ शिथिल कर दिया है। लेखक ने इस ग्रन्थ में पाठकों के विनोद के लिए बड़े ही सुन्दर आधारों को ग्रहण किया है। इसमें व्यंग्यात्मक एवं रसप्लुत रचनाओं के साथ-साथ संस्कृत से हिन्दी, अंग्रेजी से हिन्दी और हिन्दी से अंग्रेजी में अन्दित एवं कलात्मक रचनाओं को भी स्थान दिया है। इसके अतिरिक्त ललित एवं चुभती हुई शायरियाँ, मनोरम ऋतु-चित्रण, हिन्दुस्तानी संगीत-शैली में स्वरचित अंग्रेजी गीतों की स्वरलिपियाँ आदि इस पुस्तक के कुछ ऐसे तथ्य हैं जो विनोद प्रदान करने के साथ-साथ हिन्दी में नवीन प्रयोगधारी होने का भी श्रेय प्राप्त करते हैं।
इस पुस्तक की चादिक उपयोगिता को देखते हुए आशा है कि पाठक शीघ्र ही इसे आदर देंगे। इसके साथ ही भगवान से भी श्री 'शूर' जी को और भी शक्ति प्रदान करने के लिए विनय प्रार्थना है; ताकि हिन्दी-साहित्य को कुछ और नवीन-प्रयोगात्मक रचनाएँ वे प्रदान कर सकें ।
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