प्राक्कथन
विचारों की भूमि पर जब चेतना जागती है, तब कोई युगधम् जन्म लेता है। यह पुस्तक 'एकात्म मानववाद' उसी युगधर्म की पुन उद्घोषणा है जो पण्डित दीनदयाल उपाध्याय जी ने भारतीय मनीषा को देकर एक विचार-क्रांति की नींव रखी थी। यह दर्शन केवल राजनीतिक, आर्थिक या सांस्कृतिक विमर्श नहीं है, बल्कि यह भारत की आत्मा से निकली वह पुकार है जो समग्र मानवता के कल्याण की दिशा दिखाती है परन्तु यह एक नया सवेरा था जिसके स्निग्ध आलोक को धीरे-धीरे फैलना था। यहाँ मेरा उद्देश्य केवल 'एकात्म मानववाद' के सिद्धान्तों की पुनरावृत्ति नहीं है, बल्कि इन्हें आज के संदर्भों में पुनः समझना और प्रस्तुत करना रहा है। यह सत्य है कि हम बड़ी तेजी से विकास कर रहे हैं, परन्तु उसी के साथ आवश्यक यह भी है कि हम अपनी संस्कृति, अपने मूल्यों और अपनी आत्मचेतना से सम्पृक्त रहें। पुस्तक में मैंने यथासंभव प्रयास किया है कि दीनदयाल जी के विचारों और एकात्म मानववाद की व्याख्याओं को सरल, सुस्पष्ट और आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत किया जाए। आज समय का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। इसलिए हमारा कर्तव्य है कि हम किसी पठनीय सामग्री को सरल, सुबोध, संक्षिप्त बना कर प्रस्तुत करें। यह पुस्तक उन सभी देशवासियों को समर्पित है जो भारत को केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक चेतना मानते हैं। साथ ही उन युवाओं को भी समर्पित है जिनके मन में कहीं-न-कहीं यह प्रश्न अवश्य उठता है कि 'क्या आधुनिकता और भारतीयता में कोई सामंजस्य संभव है?' उत्तर है- हाँ, और यही सामंजस्य एकात्म मानववाद की आत्मा है। अंत में, मैं उन सभी महापुरुषों को नमन करता हूँ जिन्होंने भारत को आत्मबोध के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। विशेष रूप से पण्डित दीनदयाल उपाध्याय जी को, जिनका यह अमर विचारदर्शन, आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना तब था। दृष्टि और विचार से ही परिवर्तन की दिशा तय होती है। यह पुस्तक उसी परिवर्तन की राह में एक विनम्र प्रयास है। यह केवल एक सैद्धान्तिक विवेचना नहीं, बल्कि नव चेतना का आह्वान है जो भारत के स्वधर्म, स्वसंस्कृति और स्वराज्य की पुनः प्रतिष्ठा के लिये चिन्ता और चिन्तन का एक विनम्न प्रयास है। एकात्म मानव दर्शन की आज सबसे अधिक आवश्यकता है। वस्तुतः वह किसी वाद से बँधा हुआ दर्शन नहीं है बल्कि भारतीय अस्मिता की आधुनिक व्याख्या है। इसमें जीवन के प्रत्येक पहलू - व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और सृष्टि - को एकसूत्र में बाँधकर न केवल भारत वरन् विश्व मानवता को एक ऐसी राह दिखाना है जिस पर उसका विश्वास टिके। इस पुस्तक के माध्यम से मैंने यह प्रयास किया है कि भारत के चिरन्तन चिंतन को आधुनिक भाषा और संदभों में सरल रूप में प्रस्तुत किया जाए। यह आवश्यक नहीं कि आप इसके सभी बिन्दुओं से सहमत हों, लेकिन आप उद्वेलित हो, नये ढंग से कुछ सोचें, विचारें, यह आवश्यक है।
लेखक परिचय
निशि रंजन तिवारी पिता स्व. डा. गिरिजा शंकर तिवारी माता स्व. श्रीमती मनोरमा तिवारी जन्म 30-05-1968 ग्राम-बनियईनी, पोस्ट-रनिहवों जिला-देवरिया (उ.प्र.) शिक्षा बी. ए., बी.एड. । सेवा प्रधानाध्यापक, जूनियर हाईस्कूल (25-11-1999 से 31-01-2023 तक) स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति । राजनैतिक यात्रा 1986 मे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के उम्मीदवार के रूप में छात्रसंघ महामंत्री, एस. डी. पी. जी कालेज, मठ लार, जनपद-देवरिया । परास्नातक प्रतिनिधि दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय गोरखपुर। 1988 में भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। 1988 से 1990 तक मण्डल अध्यक्ष- भाजयुमो, मण्डल-लार जनपद-देवरिया। 1990 से 1993 तक जिला महामंत्री भाजयुमो, देवरिया-कुशीनगर संयुक्त जनपद । 1993 से 1995 तक जिला महामंत्री-भाजयुमो, जनपद देवरिया। 1995 से 1997 तक नगर महामंत्री, भाजपा, देवरिया नगर। 1997 से 2000 तक जिला मंत्री, भाजपा, जनपद देवरिया। 2000 से 2003 तक जिला मंत्री, भाजपा, जनपद देवरिया। 2004 से 2007 तक जिला उपाध्यक्ष-भाजपा, जनपद देवरिया। 2007 में जिला सदस्यता प्रमुख, भाजपा, जनपद देवरिया। 2007 से 2010 तक जिला महामंत्री, भाजपा, जनपद देवरिया। 2009 में जिला सदस्यता प्रमुख, भाजपा, जनपद देवरिया। 2010 से 2012 तक जिला महामंत्री, भाजपा, जनपद देवरिया। 2002 के विधानसभा चुनाव में देवरिया विधानसभा का संयोजक। 2004 में संघ शिक्षा वर्ग प्रथम वर्ष प्रशिक्षित। 2015 में पंचायत चुनाव का संयोजक, भाजपा, जनपद देवरिया। 2017 के विधानसभा चुनाव में बरहज विधानसभा का प्रभारी, जनपद देवरिया। 2019 के लोकसभा चुनाव में बरहज विधानसभा का प्रभारी जनपद देवरिया। 2018 से 2020 तक सदस्य, प्रदेश कार्यसमिति, भाजपा, उत्तर प्रदेश। 2022 के विधानसभा चुनाव में जनपद गोरखपुर के खजनी विधानसभा.
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